Tuesday, 19 February 2019

मोदी के 5 साल : देश किधर जा रहा है ?

अभियान:
       मोदी के 5 साल : देश किधर जा रहा है ?

     क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, परिवर्तनकामी छात्र संगठन, इन्कलाबी मज़दूर केंद्र व प्रगतिशील महिला एकता केंद्र द्वारा मोदी सरकार के 5 सालों के दौरान लागू की गई मज़दूर विरोधी, छोटे-मझोले किसान व आम मेहनतकशजन विरोधी नीतियों को बेनकाब करने हेतु एक अभियान उत्तराखंड,उत्तरप्रदेश, दिल्ली व हरियाणा के कुछ अलग अलग हिस्सों में चलाया।
       इस अभियान हेतु एक पुस्तिका जारी की गई जिसका शीर्षक था : मोदी के 5 साल-देश किधर जा रहा है ? इसके अलावा व्यापक अभियान के लिए एक पर्चा भी जारी किया गया जिसका शीर्षक था: बहुरूपिये रूप धर कर छलें इससे पहले उन्हें सबक सीखा दो !
     पुस्तिका में मोदी के 5 साल में अर्थव्यवस्था की खस्ता हालत, मज़दूर विरोधी फैसलों मसलन श्रम कानूनों व ट्रेड यूनियन को ध्वस्त करने वाले बदलाव, छोटे मझोले किसान विरोधी फैसलों, महिलाओं-दलितों-अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमलों जनवाद विरोधी कदमों, मोदी सरकार की साम्राज्यवादपरस्ती आदि कदमों को बेनकाब किया गया है।
     15 जनवरी से 15 के बीच यह अभियान चलाया गया। अभियान में अवाम के अलग अलग हिस्सों से व्यापक बातचित हुई। अभियान दलित व अल्पसंख्यक आबादी के बीच भी चलाया गया। अभियान में यह महसूस किया गया कि मोदी की छवि एक हद तक धूमिल हुई है।
      दलितों व अल्पसंख्यकों के बीच स्वाभाविक था कि संघ परिवार व मोदी सरकार की घृणित रुझान के चलते आक्रोश होता। मोदी भक्त मीडिया व संघी प्रचार को छोड़ दिया जाय तो अभियान में यह साफ दिखा कि जनता अलग अलग हिस्सों जे बीच कम या ज्यादा रूप में मोदी सरकार के खिलाफ एक गुस्सा या नाराज़गी है मज़दूर वर्ग के लिये तो वैसे भी यह समझना मुश्किल नहीं है कि 'प्रधान सेवक' उनका नहीं लम्पट पूंजी का सेवक है।

आतंकी हमले और अंधराष्ट्रवाद

आतंकी हमले और अंधराष्ट्रवाद    
      पुलवामा में मेहनतकशों के 42 बेटे कथित आतंकी हमले में मारे गये हैं यह बेहद दुःखद व निन्दनीय है। यह हमला आत्मघाती दस्ते के द्वारा अंजाम दिया गया। अब तस्वीर साफ होती जा रही है कि संभावित हमले की की खुफिया जानकारी होने के बावजूद सुरक्षा में भारी लापरवाही बरती गई या फिर हमले को हो जाने दिया गया।
      अब इस हमले के बाद मोदी और शाह की जोड़ी इसके जरिये चुनावों में अंधराष्ट्रवाद व युद्ध का उन्माद पैदा कर रहे है । कुछ समय से इनके बुझे हुए चेहरों में घृणित मुस्कान तैरती साफ देखी जा सकती है ये अपना चुनाव प्रचार अंधाधुंध तरीके से न केवल जारी रखे हुए हैं बल्कि सर्वदलीय बैठक जो इस आतंकी हमले के बाद रखी गई थी देश के पी एम ने इसमें उपस्थित रहना भी जरूरी न समझा वो चुनाव प्रचार  में निकल गए गृह मंत्री को बिठाकर। दूसरी ओर गोदी मीडिया अपने चैनल व अखबार पर तो संघ परिवार के लम्पट संगठन सड़कों पर युद्धोन्माद व अंधराष्ट्रवादी उन्माद पैदा कर रहे हैं। ये एक ओर पाकिस्तान को ललकार रहे हैं तो दूसरी तरफ संघी लम्पट कश्मीरी लोगों देहरादून से लेकर अन्य शहरों में हमलावर है उन्हें खदेड़ रहे हैं। अब यह इनके लिए 'वोटों की फसल' तैयार करने का जरिया बन गया है साथ ही बेरोजगारी, भ्रष्टाचार जैसे तमाम सवालों को पीछे धकेलने का औजार भी।
         ये सवाल करने को तैयार नहीं कि नोटबंदी के जरिये  कथित आतंकवाद की कमर तोड़ देने वाल दावों का क्या हुआ। ये यह बताने को तैयार नहीं कि जब एक तरफ उन्हें इतनी नफरत पाकिस्तान से है तो फिर क्यों मोदी के दौर में भारत पाक के बीच व्यापार साल दर साल बढ़ता रहा। निर्यात 1920 मिलियन डॉलर तो आयात 488 मिलियन डॉलर हो गया। क्यों फिर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का बेटा पाकिस्तान के नागरिक के साथ मिलकर कम्पनी चला रहे है ? आदि आदि।
       एक तरफ युद्द की ललकार दूसरी तरफ खरबो का व्यापार ! यही स्थिति पाकिस्तानी शासकों की है।
      आज़ादी के बाद दोनों ही देशों के पूँजीवादी शासकों ने कश्मीर को लेकर जो नीति बनाई और फिर बाद में एक दूसरे देशों को अस्थिर करने अपने घृणित हितों के अनुरूप एक दूसरे के मुल्कों में हस्तक्षेप करते रहे है। साथ ही अपने अपने देशों में दोनों देशों के शासक अपनी अपनी मेहनतकश जनता के दिलों में एक दूसरे के खिलाफ नफरत का बीजारोपण कर इसे आगे बढ़ाते गए हैं। यह अंधराष्ट्रवादी उन्माद  शासकों के लिए बड़े काम की चीज बन जाती है। सत्ताधारी पार्टी फिर सत्ता पर अपनी गिरफ़्त बनाये रखने के लिए भी इसका इस्तेमाल करती हैं।
         इन बातों के साथ साथ यह भी बात है कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद 'कश्मीर समस्या' पर कश्मीरी अवाम को अलगाव में डालने, क्रूर दमन तथा  साम्प्रदायिक उन्माद का जो घृणित खेल खेला गया उसने समस्या को विकराल बना दिया है। इन सब चीजों या कारणों से स्थिति बेहद जटिल बन गयी है। पिछले एक साल में आतंकी हमले बढ़ते गए हैं। पुलवामा की ही तरह का हमला लम्बे समय के बाद होने की बात कही जा रही है।
       इसलिए भारत व पाकिस्तानी पूँजीवादी शासकों की घृणित मंसूबों व नीतियों, अंतर्विरोधों के चलते हस्तक्षेप व इसके लिए पालित पोषित या फिर प्रतिक्रिया में उपजे कथित आतंकी संगठनों के हमलों में या फिर छद्म युद्धों में मेहनतकशों के बेटे ही मारे जाते हैं। ऐसा दोनों ही जगहों में होता है। इसलिए जरूरी है युद्धों व कथित आतंकी संगठनों को पैदा करने वाले पूँजीवादी निजाम को ध्वस्त किया जाय ।

Tuesday, 12 February 2019

जहरीली शराब से हुई मौतों के जिम्मेदार शासक ही हैं !

जहरीली शराब से हुई मौतों के जिम्मेदार शासक ही हैं !

       उत्तराखण्ड के रुड़की, यू पी के सहारनपुर व कुशीनगर में अब तक जहरीली शराब के चलते 100 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। हर बार की तरह फिर असल अपराधियों, शराब के अवैध कारोबारियों को बचाने का खेल खेला जा रहा है।   
       जहरीली शराब से होने वाली मौतों का मामला पहली दफा नहीं है। 2015 में मुंबई में गरीब बस्ती में 100 से ज्यादा लोग की मौत हुई थी। गुजरात में 2009 में 136 लोगों की जबकि 1987 में 200 लोगों की मौत हुई थी। पश्चिम बंगाल में 2011 में 170 लोग जहरीली शराब के चलते मर गए। कर्नाटक में 1981 में 308 लोग लोगों की मौत जहरीली शराब के चलते हो गई।       हर बार मरने वाले गरीब व मेहनतकश लोग ही होते हैं। सहारनपुर  व रुड़की में हुई मौतों में भी सभी गरीब मज़दूर मेहनतकश लोग ही हैं।
    शराब के अवैध कारोबारी बेहद सस्ती मिथाइल अल्कोहल(जहरीली शराब) का इस्तेमाल  करते हैं  या फिर गुड़ व शीरा को शराब बनाने के लिए  इसे जल्द सड़ाने के लिए इसमें रसायन का इस्तेमाल करते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि इसमें एथिल एल्कोहॉल(शराब) के साथ साथ मिथाइल एल्कोहॉल ज्यादा मात्रा में बन जाता है।  यह बहुत सस्ती बनती है। गरीब बस्तियों में इसी की सप्लाई कर दी जाती है। इसके अलावा भी कई बार जानकारी न होने के चलते गलत प्रक्रिया से किण्वन  (सड़ाने) के चलते शराब में मिथाइल एल्कोहॉल भी बन जाता है।
      मिथाइल एल्कोहल की थोड़ी मात्रा भी शरीर के घातक होती है इसे पीने के कुछ घंटों बाद आँखों की रोशनी चले जाती है और अंततः मौत हो जाती है। हालांकि जल्द उपचार मिलने पर एंटीडोट से बचाया भी जा सकता है।
शराब के अवैध कारोबार का पूरा का पूरा एक नेटवर्क बनता है इसमें आबकारी विभाग से लेकर पुलिस अधिकारी, शराब के अवैध कारोबारी व विधायक तक संलिप्त मिलेंगे। यह सस्ती व घटिया मिलावटी शराब गरीब मेहनतकशों तक पहुँचती है और इनके लिए जानलेवा साबित होती है।
इन मौतों के लिए यह मौजूदा व्यवस्था जिम्मेदार हैं शासक वर्ग जिम्मेदार है। मज़दूर मेहनतकश जन को शासकों व इनकी व्यवस्था ने कंगाल दरिद्र बना दिया है कि ये हर बेहतर चीज से महरूम हैं। सबसे ज्यादा घटिया निकृष्ट कोटि की चीज ही इन्हें मयस्सर है। खान पान से लेकर रहन सहन तक या फिर इलाज, यातायात व मनोरंजन के साधन ! किसी भी चीज को उठा कर देख लीजिए ! सबसे खराब गुणवत्ता वाली चीज का उपभोग करते ये गरीब मज़दूर मेहनकश जन मिलेंगे। यही स्थिति शराब के सम्बन्ध में भी सच है। सस्ती घटिया जानलेवा शराब ही इन्हें मिलती है।
जिंदगी की हताशा, निराशा, कुंठा व क्षोभ जो इस सिस्टम से पैदा होता है यह इन्हें नशाखोरी की ओर धकेलता है।
 शासक वर्ग के पास शराब को महंगा करने या फिर शराबबंदी करने के अलावा 'नशाखोरी' का कोई इलाज नहीं है। इन दोनों  कदमों का ही नतीजा भी होता है कि अवैध शराब का कारोबार का मार्केट छलांग लगाने लगता है। साथ ही बड़े स्तर पर कच्ची शराब भी बनने लगती है। यहीं फिर जहरीली शराब की संभावना बन जाती है। यह घटिया व सस्ती शराब गरीब बस्तियों तक पहुंचती है इसका नतीजा सहारनपुर रुड़की जैसी घटना में होता है। पूँजीवाद के रहते मज़दूर मेहनतकशों की ज़िंदगी इसी तरह रहनी है।

Saturday, 5 January 2019

आगरा व पौड़ी में लड़कियों के खिलाफ घृणित हिंसा




आगरा व पौड़ी में लड़कियों के खिलाफ घृणित हिंसा

       इस साल महिलाओं व बच्चियों पर हिंसक यौन अपराध के मामले काफी बढ़ गए है। साल 2012 में दिसंबर माह में ही दिल्ली में निर्भया कांड हुआ था। तब इस घटना के विरोध में देश उबल पड़ा था। दिल्ली में तब कांग्रेस की सरकार थी। तब निर्भया कांड पर सड़कों पर उमड़ पड़े लोगों पर लाठियां चली थी और मेट्रो बंद कर दी गई थी।
        2012 के बाद तब से अब तक दरिया में बहुत पानी बह चुका है। सरकार बदल गयी। नेता बदल गये ! पार्टी बदल गयी और नारे भी बदल गए। यही नही नारे अब जुमलों (मजाक) में बदल गए हैं। मोदी सरकार ने कहा 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ'। लेकिन साल दर साल महिलाओं पर हिंसक हमले बढ़ते गए। इन्होंने नारा दिया 'बहुत हुआ महिलाओं पर अत्याचार-अबकी बार भाजपा सरकार'। यू पी में भी उत्तराखंड में भी इन्हीं की हुकूमत कायम हो गयी। सरकार बनने के बाद हुआ ठीक उलटा !
          महिलाओं पर अत्याचार, हिंसक यौन हमले न रुकने थे न रुके ! न कम होने थे न कम हुए। हुआ तो यह कि इन हिंसक अपराधों व यौन हिंसा के मामले काफी बढ़ गए। 2018 के तीन माह में ही यू पी में तकरीबन 76 हज़ार मामले महिलाओं के ख़िलाफ़ हुए हैं जबकि साल 2016 में साल भर में इनकी संख्या लगभग 49 हज़ार थी। उत्तराखण्ड की शांत पहाड़ियों में भी अब ये घटनाएं बढ़ गई। पूरे देश की बात कहें तो ये अपराध काफी बढ़े हैं।
        कोई कैसे ये उम्मीद करे कि ये अपराध कम हों। जब बिहार के 'संरक्षण गृह' में मासूम बच्चियों से यौन हिंसा करने वाले ही सरकार में शामिल हों। यानी अपराधी ही राजनेता हों ! मंत्री हों। जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद इन अपराधियों की गिरफ्तारी न हो रही हो। तब कोई उम्मीद क्यों करे, कैसे करे ?
       कोई कैसे ये कहे कि कुछ गरीब व कमजोर अपराधियों को फांसी पर लटका देने से ये अपराध रुक जाएंगे ? जबकि हमने देखा है कि उन्नाव व कठुआ में सरकार के मंत्री ही अपराधियों के पक्ष में खड़े हो गए , इन्हें बचाने के लिए आंदोलन करने लगे। आलम यह है कि उन्नाव (उत्तर प्रदेश) की लड़की पर उल्टे मुकदमे ठोंक दिए गए हैं।
       साफ है सरकारों का अपराधियों को ये संरक्षण अपराध को रोकने वाला नहीं बल्कि बढ़ाने वाला है। अपराधियों के पक्ष में , बचाव में मंत्रियों व पार्टी का आंदोलन करना कहीं से भी महिलाओं व बच्चियों की सुरक्षा को नही बढ़ाता है बल्कि यह अपराधियों को प्रोत्साहित करता है उनके होंसले बढ़ाता है और फिर ये अपनी बारी में अन्य महिलाओं व बच्चियों को अपना शिकार बनाते हैं।
      जो लोग , जो पार्टी और जो नेता दिन रात महिलाओं के खिलाफ जहर उगलते रहते हैं जो महिलाओं की बराबरी के विरोधी हों ! जिन्हें महिलाओं पर बढ़ती यौन हिंसा की वजह 'महिलाओं के कपड़ो' में नज़र आती हो, देर तक घूमने; ज्यादा बात करने में नज़र आती हो। ये बहुत मक्कारी से भी अपराधियों के अपराध पर पर्दा डाल रहे हैं और अपराध को बढ़ावा दे रहे हैं।
      कोई उत्तराखण्ड आंदोलन को कैसे भुला सकता है ? जब रामपुर तिराहा कांड रचा गया ! जिसमें  महिलाओं के साथ यौन हिंसा करने वाली उत्तर प्रदेश की 'पुलिस' ही थी। इन पुलिस वालों का, पुलिस अधिकारियों का , डी.एम  व डी आई जी का क्या बिगड़ा ? भाजपा व कांग्रेस की सरकार ने 'उत्तराखंड की आन्दोलनकारी महिलाओं' के साथ यौन हिंसा करने वाले लोगो को सजा दिलाना तो दूर मामले को कमजोर करते जाने का काम किया व इन्हें बचाने का काम किया।

अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम

  अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम        अंततः अमेरिकी साम्राज्यवादियों को फिलहाल पीछे हटना ...