Monday, 30 September 2019

जम्मू कश्मीर का भारत में विलय तथ्यों के आईने में

जम्मू कश्मीर का भारत में विलय तथ्यों के आईने में

 
        डोमिनियन देश के रूप में भारत व पाकिस्तान को आज़ादी हासिल होते वक़्त भारत स्वतंत्रता अधिनयम में यह प्रावधान तय था कि जो रियासतें अलग रहना चाहती हैं वह अलग रह सकती हैं और जो अपना विलय भारत या पाकिस्तान जिस डोमिनियन स्टेट में करना चाहती है वह विलय कर सकती है। आज़ादी से पहले जम्मू कश्मीर कई रियासतों की तरह एक अलग रियासत थी। जम्मू कश्मीर के राजा तब हरी सिंह थे। अंग्रेजी हुकूमत के दौर में यहां भी प्रजा सभा ( विधान सभा) का गठन किया गया था तब केवल 10 % सम्पति वाले लोगों को ही वोट देने का अधिकार था जैसे कि बाकि भारत में था। जिसमें 33 चुने हुए प्रतिनिधि तथा 42 प्रतिनिधि नॉमिनेट होने थे।
       जम्मू कश्मीर के राजा हरी सिंह व प्रधानमंत्री राम चन्द्र काक आज़ाद जम्मू - कश्मीर के पक्षधर थे वे भारत में विलय के पक्ष में नहीं थे। जबकि शेख अब्दुल्ला पाकिस्तान से विलय के धुर विरोधी थे वह राजशाही के भी खिलाफ थे एक लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर बनाई जाने वाली सरकार के पक्षधर थे। भारत के साथ स्वायत्तता के साथ रहने के पक्षधर थे।  1930-32 में शेख अब्दुल्ला की अगुवाई में ऑल जम्मू कश्मीर मुस्लिम कान्फ्रेंस बनी जो 1939 में नेशनल कॉन्फ्रेंस हो गई। यह एक अलग धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के लिए आन्दोलन कर रही थी। इस आंदोलन में सभी धर्म व जाति के लोग थे। यह एक सशक्त आंदोलन था। पंडित सुदामा सिद्धा , प्रेम नाथ बजाज, सरदार बुध सिंह आदि ने नेशनल कॉन्फ्रेंस का राष्ट्रीय मांग पत्र का ड्राफ्ट तैयार किया। यह आंदोलन राजशाही के खिलाफ भी था । मई 1946 में शेख अब्दुल्ला की अगुवाई में नेशनल कांफ्रेंस ने 'कश्मीर छोड़ो ' का आंदोलन  शुरू हो गया । यह आंदोलन राजशाही के खिलाफ भी था। राजशाही ने शेख अब्दुला समेत कइयों को गिरफ्तार कर लिया। फिर 29 सितम्बर 1947 को छोड़ा गया। इस रिहाई में भारत सरकार की  भूमिका रही थी।
       जब भारत व पाकिस्तान आज़ाद हो गये थे। जम्मू कश्मीर की स्थिति  स्वतंत्र रियासत ( मुल्क ) की तरह थी। हरि सिंह ( जम्मू कश्मीर ) की  पाकिस्तान के साथ स्टैंडस्टिल ( कुछ वक्त तक रुके रहने  ) समझौता हुआ था। ।  मगर पाकिस्तान की कबायली सेना ने 22 अक्टूबर 1947 में जम्मू कश्मीर पर हमला कर दिया तब राजा हरी सिंह ने गवर्नर लॉर्ड माउंटबेटेन के लिए पत्र लिखकर आर्मी की मदद मांगी व विलय के दस्तावेज दिए।  गवर्नर जनरल माउंटबेटेन ने विलय के दस्तावेज को स्वीकार कर लिया इस प्रकार 26 अक्टूबर 1947 को समझौता हुआ। आर्मी भेजने का तय हुआ। चूंकि शेख अब्दुल्ला धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारत के साथ रहने के पक्षधर थे । अब इस स्थिति में जबकि हरी सिंह ने भारत में विलय के लिए बात शुरू कर दी तब गवर्नर माउंटबेटेन ने राजा हरी सिंह को अंतरिम सरकार का गठन करने तथा शेख अब्दुल्ला को प्रधानमंत्री बनाने को कहा । माउंटबेटेन द्वारा कहा गया कि विलय की प्रक्रिया में रियासतों में  किसी प्रकार के विवाद होने पर वहां की जनता द्वारा ही इस पर (विलय) फ़ैसला लिया जाएगा। 
        पाकिस्तानी हमले से निपटने के लिए शेख अब्दुल्ला की अगुवाई में आपातकालीन प्रशासन का गठन किया गया। शेख अबदुल्ला द्वारा एक मिलिशिया ( स्वयं सेवक सेना ) का गठन किया गया जिसने पाकिस्तानी की कबायली सेना से निपटना शुरू कर दिया। बाद में भारत की सेना भी  यहां पहुंच गई। 
        17 मार्च 1948 को शेख अब्दुल्ला प्रधानमंत्री बने जबकि हरी सिंह के बेटे कर्ण सिंह को 'सदर -ए -रियासत ' बने। भारत व जम्मू कश्मीर के बीच समझौते में तय हुआ कि रक्षा, मुद्रा , संचार, विदेश नीति के मामले केंद्र की सरकार यानी भारत के पास रहेंगे, बाकी शेष मामले जम्मू कश्मीर की सरकार तय करेगी इसकी अपनी संविधान सभा होगी, इसका अलग झंडा व अलग प्रधानमंत्री होगा। संविधान सभा को ही बाकी सारे अधिकार होंगे। यह भी समझौता था कि जम्मू कश्मीर का वह हिस्सा जो पाकिस्तान ने कब्जा लिया था उसे भारत सरकार कश्मीर की सरकार को वापस दिलाएगी। 1951 में जम्मूकश्मीर में सार्विक मताधिकार के आधार पर संविधान सभा के लिए चुनाव हुए।
         जम्मू कश्मीर के विलय की इस विशेष स्थिति के चलते अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा दिया गया। अनु 370 उसी समझौते का परिणाम था जो कि जम्मू कश्मीर व भारत के बीच हुआ था। अनु. 370 में साफ दर्ज था कि राष्ट्रपति कोई भी आदेश संविधान सभा की सहमति के बाद कर सकते हैं। समझौते के हिसाब से शेख अब्दुल्ला को जम्मू कश्मीर का प्रधानमंत्री बनाया गया। आर एस एस धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के लिए शेख अब्दुल्ला द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन का धुर विरोधी था तथा राजशाही के समर्थन में था इसलिए शुरुवात में यह जम्मू कश्मीर के स्वतंत्र देश के बतौर रहने के राजा हरी सिंह के फैसले का पक्षधर था भारत से विलय के पक्ष में नहीं था। मगर बाद में जब परिस्थितियां बदल गयी तब यह भारत में इसके पूर्ण विलय की बात करने लगा। इसने यहां नवम्बर 1947 में चुनाव में प्रजा परिषद नाम की  पार्टी खड़ी करके चुनाव में भागीदारी करनी शुरू कर दी । प्रजा परिषद का 1963 में जनसंघ में विलय हो गया।  इस दौर में यानी 1948 भारत सरकार इस मामले को संयुक्त राष्ट्र संघ में भी ले गई खुद नेहरू की ओर से इस मामले पर जनमत संग्रह का प्रस्ताव भी रखा गया क्योंकि उस समय उन्हें यह भारत के फेवर में पक्ष में जाता लग रहा था शेख अब्दुला ने संयुक्त राष्ट्र संघ में इस पक्ष में जोरदार दलील भी दी। पाकिस्तान ने तब इसका विरोध किया।  बाद में भारत जनमत संग्रह से पीछे हट गया। 1951 के संविधान सभा के कश्मीर में हुए चुनावों को ही भारत सरकार जनमत संग्रह के रूप में प्रस्तुत कर रही थी।
          1952 में जम्मू कश्मीर की अर्थव्यवस्था भारत के साथ पूरी तरह शेख अब्दुल्ला ने एकीकृत कर दी थी अब व्यापार व लोगो की आवाजाही पर जो पाबंदी थी भारत व कश्मीर के बीच वह हट गई। इस दौर में राजशाही खत्म कर दी गई । इस दौर में भारत सरकार पर आरोप लगे कि उसकी मंशा कुछ और ही थी कि वह इस समझौते को बेहद कमजोर या खत्म कर देना चाहती थी।
          इन आरोपों के बीच ही अचानक 'कश्मीर षड्यंत्र' के फर्जी आरोप में   1953  में प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला सहित 22 लोगो को गिरफ्तार कर लिया गया व जेल में डाल दिया गया। आरोप यह लगाया गया कि शेख अब्दुल्ला आजाद कश्मीर के लिए पाकिस्तान के साथ मिलकर साजिश रच रहे है। 11 सालों तक शेख अब्दुल्ला को जेल में रखा गया।   मिर्जा अफ़ज़ल बेग को 1954 के नवम्बर माह में रिहा कर दिया गया। जी एम हमदानी के साथ मिर्जा बेग ने 'जनमत संग्रह मंच' बनाया इसकी मांग सँयुक्त राष्ट्र संघ की निगरानी में जनमत संग्रह के जरिये जम्मू कश्मीर की जनता के आत्मनिर्णय के अधिकार ( जनता को अपने राज्य या देश की राजनीति आदि को तय करने का अधिकार ) की थी। इसका समर्थन 'कश्मीर राजनीतिक कान्फ्रेंस' 'कश्मीर जनतांत्रिक यूनियन ' तथा प्रजा सोशलिस्ट पार्टी' (जय प्रकाश नारायण व आचार्य नरेंद्र देव आदि की) ने भी किया।
दूसरी ओर शेख अब्दुल्ला आदि को तब जेल से  छोड़ा गया जब वह और उनकी पार्टी ने एक प्रकार से समर्पण कर दिया। 1964 में इनकी रिहाई हुई और जिन फर्जी मुकदमों पर 1953 में इनकी गिरफ्तारी हुई थी उन्हीं को अप्रेल 1964 में रहस्यमय तरीके से भारत सरकार ने वापस ले लिया। इस बीच 1954 में राष्ट्रपति के आदेश से 35 A जोड़ा गया था कहा जाता है कि यह पहले से ही कश्मीर में भिन्न रूप में था। 1956 में संविधान सभा भंग कर दी गई इसने 1956 में संविधान (जम्मू कश्मीर का) बनाया तथा इसमें अब  जम्मू कश्मीर को भारत का हिस्सा बताया गया।  संयुक्त राष्ट्र संघ ने संविधान सभा के 1951 के चुनाव को जनमतसंग्रह का विकल्प मानने से इंकार कर दिया। 1957 में इसकी जगह विधान सभा बना दी गई। बाद के समय में सदर-ए-रियासत तथा प्रधानमंत्री का पद खत्म कर दिया गया। इसकी जगह राज्यपाल व मुख्यमंत्री हो गया। दूसरी ओर जम्मू कश्मीर की सरकार को वायदे के मुताबिक वह हिस्सा जिसे पाकिस्तान ने कब्जा लिया था कभी वापस नही दिलाया गया यह पाकिस्तान के पास है इसे पाक अधिकृत कश्मीर कहा जाता है।
        यह आरोप है कि इसके बाद फिर भारत सरकार लगातार ही समझौते को और ज्यादा कमजोर करते गई। 1956-57 में जम्मू कश्मीर को भारत का हिस्सा घोषित कर दिया गया। बाद में राष्ट्रपति के आदेश से तथा विधान सभा को अपने हिसाब से ढालकर कई आदेशों के जरिये देश के तमाम कानून वहां लागू करा दिए गए ।1956 से 1994 के बीच  राष्ट्रपति के 47 निर्देश जम्मू कश्मीर के संबंध में जारी हुए लगभग 97 में से 94  संघीय विषय केंद्र सरकार के जरिये वहां लागू हो गए जो कि संविधान के 395 अनुच्छेदों में से 260 अनुच्छेद समेट लेती थी । 1965-66 में अनु 356 व 357 को लागू कर दिया गया। ये तथ्य साफ दिखाते है कि भारत सरकार पर जम्मूकश्मीर को छल बल से अपने में मिला लेने के आरोप हवाई नहीं थे। दूसरी ओर नेशनल कॉन्फ्रेंस की अवसरवादी व कमजोर भूमिका के चलते तथा भारत सरकार के विलय के प्रति रुख के चलते अलग आज़ाद धर्मनिरपेक्ष जम्मू कश्मीरी राष्ट्र के लिए जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट की अगुवाई में एक संघर्ष खड़ा हो गया था।  यह समूचे जम्मू कश्मीर यानी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को अपने दायरे में समेट लेता था । यह आंदोलन व्यापक होता गया। इसकी शुरुवात तो 65 से ही हो गई थी मगर यह संगठन 1977 में बना। यहीं से फिर इस आंदोलन को कमजोर करने के लिए आतंकवाद को पैदा करने पालने पोसने के आरोप भी सरकार पर लगे । भारत व पाकिस्तान दोनो की इसमें भूमिका होने के आरोप लगे। दोनो के अपने अपने निहित स्वार्थ थे। फिर आतंकवाद को खत्म करने के नाम पर भारी मात्रा में फौज की तैनाती वहां कर दी गई । चप्पे चप्पे पर फौजी जवान खड़े हो गए। इसे टाडा तथा पब्लिक सेफ्टी बिल व सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून के तहत दमन के लिए जो कुछ भी सम्भव हो वह करने की छूट दी गई । पिछले 45 सालों से जम्मू कश्मीर की अवाम संगीनों के साये में जी रही है । इनके जरिए सीधे सीधे केंद्र सरकार ही यहां शासन कर रही थी। 'विधान सभा भंग कर देना' 'राष्ट्रपति शासन लगा देना' यह सामान्य बन गया।  दूसरी ओर जे के एल एफ तो कुछ सालों बाद बहुत कमजोर हो गया। मगर आतंकवाद व अलगाववाद बढ़ता गया। एक प्रतिक्रियावादी आंदोलन भी इस दौर में पैदा हो गया या पैदा कर दिया गया जो इस्लामिक कट्टरपंथी आंदोलन था यह जम्मू कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाये जाने की वकालत करता था ।
        साफ है कि कोई भी जम्मुकश्मीर के आत्मनिर्णय के अधिकार का पक्षधर नही था। जम्मू कश्मीर की अवाम क्या चाहती है उसकी इच्छा आकांक्षा क्या है इससे किसी को कोई सरोकार न था। दोनो ही देशों के शासक इसे निगलने को तैयार थे। दोनों के लिए मात्र यह जमीन का टुकड़ा था मात्र एक बाजार था, प्राकृतिक संसाधन था व इसका इनके लिए एक भूरणनीतिक महत्व था। इनके बीच इसी को लेकर तीखे अंतर्विरोध भी थे। इसी को "राष्टवाद" की चाशनी में लपेट कर परोसा जाता है। साम्प्रदायिक उन्माद का खेल खेला जाता है।
         इस प्रकार देखा जाय तो जो समझौते जम्मू कश्मीर व भारत के बीच हुए थे। उन समझौते को बेहद कमजोर कर दिया गया।  370 के तहत जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिया गया मगर संविधान में इसे अस्थायी उपबन्ध के बतौर रखा गया था। हालाकि अनु 370 को हटाने के लिए राष्ट्रपति का आदेश तथा कश्मीर की संविधान सभा की सहमति जरूरी थी। लेकिन संविधान सभा तो 1956 में ही भंग हो गई । अब मौजूदा दौर में मोदी शाह की सरकार ने राष्ट्रपति के जरिये एक गैजेट नोटिफिकेशन जारी करवाया और 370 को खत्म करने का आदेश कर दिया। फिर इस पर तीन बिल लाकर भाजपा ने राज्य सभा व लोक सभा में इसे पास करवा लिया। 370 का खत्म किया जाना खुलेआम प्रक्रिया का उल्लंघन था। जम्मू कश्मीर की संविधान सभा की सहमति के बिना यह फैसला नहीं लिया जा सकता था जो कि अब वज़ूद में है नहीं। यदि संविधान सभा को विधान सभा माना जाय तो भी इस वक़्त कश्मीर में राष्ट्रपति शासन था विधान सभा भंग थी। राज्यपाल तो चुना हुआ प्रतिनिधि होता नही वह केंद्र सरकार का प्रतिनिधि होता है उसकी सहमति के कोई मायने नही। इस प्रकार मोदी-शाह की सरकार ने जम्मू कश्मीर की अवाम को बिना विश्वास में लिए अपने फासीवादी अंदाज में संविधान सभा या विधान सभा के माध्यम से नहीं बल्कि भारी मात्रा में वहां फौज भेजकर सारे जनवादी अधिकार छीनकर, कर्फ़्यू  जैसी स्थिति पैदा करके, एक प्रकार से जम्मू कश्मीर के नागरिकों व चुने हुए कई नेताओं को बंधक बनाकर राष्ट्रपति के आदेश को सीधे संसद में अपने बहुमत के जरिये पास करवाकर लागू करने की ओर बढ़ चुकी है यही नहीं इसके दो टुकड़े करके केंद्र शासित क्षेत्र में बदल देने का प्रावधान भी किया गया है। इस प्रकार शासक वर्ग ने जम्मू कश्मीर का भारत में पूरी तरह विलय करने की अपनी कुत्सित मंशा को 1948-52 से धीरे धीरे 70 सालों में मुकम्मल कर लिया। यह कहना ज्यादा सही होगा कि कांग्रेस ने 60 सालों में विशेष राज्य के दर्जे को इतना कमजोर कर दिया था कि मोदी शाह की भाजपा के लिए 370 को खत्म करना बेहद आसान हो गया। हालांकि कोर्ट में मामला गया है वह इसी आधार या तर्क पर है कि मोदी शाह सरकार की पूरी प्रक्रिया असंवैधानिक है क्योंकि इसमें विधान सभा से भी कोई सहमति  नही हुई है। कोर्ट का रुख क्या होगा यह आने वाला वक़्त ही बताएगा। जो भी हो। यह ध्रुवीकरण के लिए खतरनाक हथियार का काम और ज्यादा करेगा। साथ ही कश्मीरी अवाम के कष्ट दुख दर्द कई गुना और बढ़ जाएंगे।
          भाजपा व संघ परिवार के द्वारा ऐसे समय में जबकि अर्थव्यवस्था की मंदी की ओर बढ़ने, 45 साल में सबसे ज्यादा बेरोजगारी होने, उद्योगों की सेल में भारी गिरावट तथा बड़े पैमाने पर मज़दूरों की छटनी तथा विनिवेशीकरण व कर्मचारियों की छंटनी की खबर के बीच यह फासीवादी एजेंडा सचेतन चला गया कदम है। यह यहीं पर रुकने वाला नहीं है। यह अर्थव्यवस्था के संकट व जनसंघर्षों से निपटने का खतरनाक रास्ता है इस बात की संभावना है कि अमेरिकी साम्राज्यवादी  तथा इजरायल के साथ और ज्यादा सटने व उनके समर्थन से यह दांव चला गया हो।  इसमें चीन व पाकिस्तानी शासक भी इसे यूं नहीं जाने देंगे। अमेरिकी शासक इसके जरिये भारतीय शासकों को दबाव में लेने का काम करेंगे भले ही अभी वह समर्थक हों । इसी ढंग से रूसी साम्राज्यवादी भी। इसीलिए यह मुद्दा लंबे वक्त के लिए जनता को अंधराष्ट्रवादी उन्माद में धकेकने का जरिया बनेगा। शासक वर्ग के लिए यह बहुत फायदे की चीज है  विशेषकर जब अर्थब्यवस्था मंदी की ओर बढ़ रही हो। यह तात्कालिक तौर पर जनता के संघर्षों को कमजोर करने का जरिया भी है। संघ परिवार इसके जरिये अपने 'एक देश- एक झंडा- एक विधान' को पूरा करके खुद को "राष्ट्रवादी' के बतौर प्रचारित करने में कामयाब है जो कि अन्धराष्ट्रवाद के सिवाय कुछ नहीं है। अब यह अपने चरम आतंकी तानाशाही (फासीवाद) कायम करने की ओर बढ़ेगा। फिर जो कश्मीर में हो रहा है वह देशव्यापी हो जाएगा जिसके निशाने पर मज़दूर मेहनतकश अवाम होगी।






Wednesday, 17 July 2019

बजट: जूता सूंघाकर मूर्च्छा तोड़ने कीकोशिश

 बजट: जूता सूंघाकर मूर्च्छा तोड़ने कीकोशिश


बजट के दिन अजब-गजब नजारा था। संसद में वित्तमंत्री के बजट भाषण पर देश के प्रधानमंत्री मेज थपथपा रहे थे और शेयर बाजार में निवेशक अपनी छाती पीट रहे थे। अखबारों में बजट की भूरि-भूरि प्रशंसा और चैनलों में बजट की वाह-वाही के बीच आम आदमी पेट्रोल-डीजल के दाम में हुयी वृद्धि के बीच समझ नहीं पा रहा था कि बजट कैसा है।

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट भाषण से स्पष्ट कर दिया कि वह पूर्व वित्तमंत्रियों अरुण जेटली और पी चिदम्बरम से किसी मामले में कम नहीं हैं। शेरों-शायरी, उपमायें और किस्म-किस्म के बिम्बों से कैसे आम लोगां की आंखों में धूल झोंकी जाती है, उन्होंने इसका अच्छा उदाहरण पेश किया। और जो कसर बची थी उसे अगले दिन अखबारों ने पूरा कर दिया। ‘नारी तू नारायणी’ जैसे जुमले उछालकर बता दिया कि वह मोदी सरकार की काबिल मंत्रियों में है।

सच भले ही यह हो कि देश में कृषि क्षेत्र में तेज िंगरावट हो, औद्योगिक क्षेत्र मंदी की चपेट में हो पर मोदी सरकार यह सब्ज बाग दिखाती है कि 2024 तक भारत की अर्थव्यस्था 5 ट्रिलियन डालर की हो जायेगी। यानी आज की लगभग दुगुनी। और जब इस हवाबाजी की आलोचना शुरू हुयी तो आलोचकों की जुबान चुप कराने के लिए कहा गया कि वे ‘‘पेशेवर निराशावादी’’ हैं। और आलोचक पलटकर यह नहीं कह सके कि आप ‘‘पेशेवर लफ्फाजी’’ हैं और वित्तमंत्री ने आपकी शागिर्दी में यह हुनर बहुत जल्दी हासिल कर लिया है। वे भी अच्छी लफ्फाज बन गयी हैं।

सच भले ही यह है कि राजस्व घाटा बढ़ रहा है, निर्यात नीचे गिर रहा है। पूंजी निर्माण की दर निम्न है पर मोदी सरकार का दावा है कि भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। यह दीगर बात है मोदी सरकार के मंत्रियों और संघ-भाजपा के सूरमाओं के अलावा हर कोई इसका उल्टा महसूस करता हो। नामी गिरामी अर्थशास्त्रियों, पूंजीपतियों के अलावा सामान्य मजदूर भी महसूस करते हैं कि हालात ठीक नहीं है। आंकड़े बता रहे हैं कि बेरोजगारी चरम पर है, क्रय शक्ति घट गयी है, व्यापार ठण्डा है। आमदनी गिर गयी है।

यह सरकार राष्ट्रवाद की बात बहुत करती है। पर इस बजट में वित्तमंत्री के हाथ में कटोरा पकड़ने का पूरा जुगाड़ है। सरकार अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिये विदेशों से कर्ज लेगी। यह कर्ज इसलिये लिया जायेगा ताकि भारत के भीतर कर्ज लेने वालों को दिक्कत न हो। क्योंकि सरकार के देश के भीतर से कर्ज लेने से देश के भीतर कर्ज वालों को दिक्कत होती है। ब्याज की दरें चढ़ जाती हैं। क्या गजब का तर्क है। सच्चाई यह है कि सरकार ने देश के भीतर की संस्थाओं का ढंग से दोहन कर लिया है और उसे और निचोड़ने की सम्भावना कम है। और सबसे बड़ी बात विदेशी संस्थाओं से ऋण से मतलब सरकार रामबाण औषधि समझती है। विदेशी संस्थाओं से ऋण से मतलब होता है कि सरकार की बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के लिये धन की उपलब्धता बने और उन कम्पनियों को यहां से मुनाफा कमाने का मौका मिले जो इस वक्त मंदी के दौर से गुजर रही हैं। फायदा देशी-विदेशी पूंजीपतियों और वित्तीय संस्थाओं का होगा पर कर्ज का मूल और सूद भारत के मजदूर-मेहनतकश चुकायेंगे। भारत को कर्ज जाल में फंसाना, क्या बढ़िया राष्ट्रवाद है।

यह राष्ट्रवाद तब-तब मजबूत होता है जब-जब विदेशी कम्पनियां इस देश में निवेश करती हैं। और लूट-लूट कर मोटा मुनाफा ले जाती हैं। यह राष्ट्रवाद बताता है कि लुटेरे फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों की हथियार कम्पनी का राफेल लड़ाकू विमान देश की सुरक्षा के लिए कितना जरूरी है। और यह राष्ट्रवाद बताता है कि यह भी बहुत जरूरी है कि भारत के सैन्य अड्डों, बन्दरगाहों में अमेरिकी साम्राज्यवादियों की सेना घूमा करे। इस बजट में हथियारों की खरीद-फरोख्त आसानी से रूस, अमेरिका, फ्रांस जैसे लुटेरों साम्राज्यवादियों की कम्पनियों से हो सके इसका बड़ा प्रबंध किया गया है। इतने अनोखे ढंग से शायद ही कभी कोई देश इतिहास में मजबूत और सशक्त हुआ हो। पर भारत के राष्ट्रवादियों की हर बात अनोखी है। ऐतिहासिक है।

अपने पिछले कार्यकाल में मोदी सरकार ने अर्थिक सुधारों को जो गति दी, नोट बंदी की और जी.एस.टी. को लागू किया उसका नतीजा यह निकला कि देश के छोटे-मझौले उत्पादक यानी मुख्य तौर पर किसान, दस्तकार और छोटे व्यापारी और कारोबारी बरबाद होते गये। बरबादी को ये लोग महसूस न करें इसके लिये इन्हें राष्ट्रवाद का रासायनिक घोल पिलाया गया था पर फिर भी असर कहीं बीच में खत्म न हो जाये इसके लिये कुछ अन्य तरीके भी ईजाद किये गये। मसलन जब देश में एक तरफ कृषि व डीजल गैस आदि पर दी जाने वाली सब्सिडी व कर राहत खत्म कर दी गयी तो दूसरी तरफ प्रति वर्ष 6000रु किसानों की सहायता की घोषणा की गयी। यह राशि बरबाद होते किसानों को झूठा दिलासा देना है। ऐसा ही इस बजट में छोटे व्यापारियों को पेंशन देने की घोषणा के जरिये किया गया है। छोटे व्यापारी बड़ी-बड़ी रिटेल कम्पनियांं (ऑनलाइन सामान बेचने वाली, अमेजन फिलिप कार्ट कम्पनियां) की मार से बरबाद होते जा रहे हैं। बरबादी के शिकारों के लिये एक मामूली सी पेंशन। और उस पेंशन का भविष्य क्या होगा कोई नहीं जानता। ऐसी ही फर्जी पेंशन योजना चुनाव के ठीक पहले मजदूरों के लिए भी घोषित की गयी थी।

भारत को 5 ट्रिलियन डालर (343 लाख करोड़ रुपये) की अर्थव्यवस्था बनाने के लिये इस सरकार की अर्थिक नीतियां वही हैं जो पिछले तीन दशकों से चल रही हैं। निजीकरण के जरिये यह सरकार अपने राजस्व घाटे को पाटना चाहती है। रेलवे, एअर इण्डिया का निजीकरण इसके एजेण्डे पर है। साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का विनिवेशीकरण और उनकी भू सम्पत्ति को रियल स्टेट की लुटेरू कम्पनियों को देकर यह पैसा कमाना चाहती है। रेलवे का निजीकरण पूरी दुनिया में कहीं भी आसान नहीं रहा है। यहां तक कि ब्रिटेन और फ्रांस में भी नहीं। पर मोदी सरकार की ऐसी घोषणायें, इरादे अर्थिक संकट से जूझती अर्थव्यवस्था में जान फूंकने में अब तक नाकाम रहे हैं। 2007-08 के बाद का दुनिया का ही नहीं भारत का इतिहास भी ऐसा ही है।

बाजार के लुटेरे निवेशकों की स्थिति यह है कि वे कोई भी रुकावट अपने मुनाफे में नहीं चाहते। वित्त मंत्री की कम्पनियों पर कुछ मामूली टैक्स की घोषणा का बाजार की भारी गिरावट द्वारा प्रति उत्तर दिया जायेगा, यह अनुमान उस्ताद और शागिर्द दोनों को नहीं था। बाजार की लुढ़कन ने बता दिया कि बजट लुटेरों को रास नहीं आया। लुटेरों की खिदमत करने वाले अब क्या तरीका उन्हें खुश करने का निकालेंगे। यह कोई भी समझ सकता है। जो बात उन्हें पसन्द नहीं हैं उस काम को मत करो। बजट को दुरुस्त करो।

पर सरकार की दिक्कत यह है कि वह अपने राजस्व को कैसे बढ़ाये। मजदूरों, किसानों और अन्य मेहनतकशों को कितना लूटें। भारत के प्राकृतिक संसाधनों की कितनी बोली लगायें। यह काम तो तेजी और तेजी से कर रही है पर बात बन नहीं रही हैं।

असल में पूरी दुनिया की स्थिति यही है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का संकट ऐसा है कि वह उन उन्नत शिखरों को भी छू रहा है जो अब तक महफूज थे। उनको भी अपने लपेटे में ले रहा है जो उसे महफूज करने के धन्धे में लगे थे। कई सरकारें कर्ज जाल में फंस गयी हैं। 

यह बजट भारतीय अर्थव्यवस्था की मूर्छा को तोड़ने की वैसी ही हरकत है जैसे कोई मिर्गी के मरीज को जूता सुंघाता है। और उम्मीद पालता है कि वह इससे ठीक हो जायेगा। खुदा न खास्ता मरीज की मूर्छा जूता सूंघने से टूट भी जाये पर इससे उसका रोग नहीं जाता है।

Wednesday, 29 May 2019

आम चुनाव 2019 , भाजपा की जीत और इसके मायने

आम चुनाव 2019 , भाजपा की जीत और इसके मायने
      2019 के चुनाव ने अन्ततः मोदी शाह की भाजपा को फिर बहुमत से सत्ता पर पहुंचा दिया है।  इस जीत से मोदी भक्त मीडिया पूरी तरह उन्मादग्रस्त है  अब इन्होंने खुलेआम घोषित कर दिया है कि उन्हें मोदी मीडिया होने पर गर्व है। इस जीत को भी इन्होंने प्रचण्ड बहुमत करार दिया है। हकीकत क्या है ?
       हकीकत यह है कि इस बार कुल वोट प्रतिशत 67 .11 % रहा। पिछली दफा भाजपा को कुल वोटों का 31 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे इस बार यह आंकड़ा 37.4 प्रतिशत पहुंचा है । दोनों ही बार मतो के हिसाब से यह अल्पमत की सरकार है । यह भारतीय पूंजीवादी संसदीय प्रणाली के एफ टी टी पी प्रणाली का कमाल है कि इतने कम प्रतिशत (37 %) के वावजूद यह पार्टी कुल सीटों का 56 प्रतिशत सीट हासिल कर ले गई । जबकि कांग्रेस का वोट प्रतिशत अभी भी लगभग 20 है सीटों के लिहाज से इसे केवल 10 प्रतिशत सीट हासिल हुई । बहुजन समाज पार्टी को भी वोट प्रतिशत लगभग 20 % हासिल हुआ लेकिन सीट मिली 10 यानी कि कुल सीटों का मात्र 1.8 प्रतिशत।
       इस जीत को मीडिया द्वारा मोदी के व्यक्तितव का करिश्मा बताया जा रहा है कहा जा रहा है कि मोदी है तो कुछ भी मुमकिन है । लेकिन हकीकत ठीक इनके उलट है । अगर मीडिया सभी पूंजीवादी पार्टियों व इनके नेताओं के प्रति निष्पक्ष रहकर काम करता और मोदी के भाषणों व अन्य बातों को उसी तरह रखता जैसे कि राहुल से लेकर अन्य के मसले पर किया गया तो वास्तव में होता यह कि मोदी कभी भी यहां नही पहुंचते जिस मुकाम पर आज वह हैं। लेकिन ऐसा होना मुमकिन नही है यह पूंजीवाद की अपनी गति, दौर व संकटो पर निर्भर करता है । आज के दौर में साफ है एकाधिकारी पूंजी की पहली व मुख्य पसदं मोदी हैं फासीवादी ताकतें है धुर दक्षिणपंथी लोग है। यह दुनिया भर के लिए भी सच है। इसीलिए इनके द्वारा संचालित मीडिया मोदी मोदी धुन में नाच रहा है। यह अपने मत को जनमत में बदल रहा है।
           इस चीज को केजरीवाल के उदाहरण से ढंग से समझा जा सकता है जब इस पूंजी द्वारा केजरीवाल को आगे करना था तो केजरीवाल हीरो थे नायक थे लेकिन जब मोदी को इस पूंजी द्वारा प्रमोट व प्रोजेक्ट किया गया तो देखते ही देखते केजरीवाल को नायक से जोकर ( उपहास का पात्र) बना दिया गया।
         इसलिए मोदी की अगुवाई में फासीवादी ताकतों की यह जीत एकाधिकारी पूंजी के सामज पर पूरे वर्चस्व को दिखाता है । यह कहना ज्यादा  सही होगा कि  एकाधिकारी पूंजी के मालिकों ने अपनी इच्छा व आकांछा को अंततः जनादेश में बदलवा ही दिया है ! उनकी इच्छा थी मोदी की अगुवाई में फासीवादी गिरोह सत्ता पर बैठे ! इसके लिए तमाम प्रपंच रचे गए ! अरबों खरबो रुपया पानी की तरह बहाया गया ! 'मोदी नही तो कौन' की धारणा बनाई गई । पुलवामा के जरिये, अंधराष्ट्रवाद का उन्माद खड़ा किया गया । आतंकवाद व देश की सुरक्षा के लिए मोदी मात्र के ही सक्षम होने के बतौर प्रचार किया गया। साध्वी प्रज्ञा के जरिये उग्र हिंदुत्व व भगवा आतंक के रूप में ध्रुवीकरण किया गया। किसानों , बेरोजगारों को जाल में  फांसने के लिए 6000 रुपये देने , धड़ाधड़ पोस्ट निकालने का काम ऐसे ही अन्य कृत्य किये गए। चुनाव के बीच इंटरव्यू देना ऐसे ढेरों प्रपंच  नाटक किये गए।बहुत सी चीजें साफ दीखी थी जो इनके द्वारा अपनी जीत को हासिल करने को की गई। चुनाव आचार संहिता की जमकर धज्जियां उड़ाई गई।
        इनकी इस जीत में षडयंत्र से इंकार नहीं किया जा सकता ! ऐसा इसलिए की ऐसा माहौल जमीन पर नहीं दिखा। यही अधिकांश का मानना भी था। कुछ चीज़ें साफ दिखी थी कुछ चीजें अंदरूनी स्तर पर की गई है जिनकी कभी कभार चर्चा भी हुई है जैसे फरीदाबाद में भाजपा पोलिंग एजेंट द्वारा महिलाओं के भी वोट खुद ही कमल पर डाल देना, चुनाव के पहले दिन पैंसे बटवाकर व अंगुलियों पर निशान लगवा देना ताकि इनके नाम पर अगले दिन खुद ही अपनी पसंद का बटन दबा दिया जाय, ई वी एम की उन इलाकों में खराबी जहां विरोधी वोटर हों ! फर्जी वोटिंग! आदि आदि ! इनमें से कुछ अन्य पार्टियां भी कर सकती हैं व करती है मगर उनके लिए स्कोप बहुत ही कम है। चूंकि इसका कोई सटीक आंकड़ा नहीं होता लेकिन ये नतीजों को उलट पलट सकता है।
 चुनाव आयोग का जहां तक सवाल है वह तो पूरी तरह से मोदी के पक्ष में काम करता रहा। मीडिया का 90 प्रतिशत हिस्सा मोदी का प्रचार चेनल बन गया। चुनावों में इस मीडिया हर जगह मोदी ही मोदी था बाकि तो यहां से गायब थे।  इस तथ्य को भी नही भुलाया जा सकता कि इनकी अगुवाई में समाज एक फासीवादी आंदोलन मौजूद है यह ताकतवर स्थिति में मौजूद है ! आर एस एस का अपना पूरा सांगठनिक नेटवर्क मोदी के पीछे खड़ा था।
       यह बात बिल्कुल साफ थी कि धुर प्रतिक्रियावादी एकाधिकारी पूंजी की टॉप प्राथमिकता मोदी व इनका फासीवादी गिरोह था व है ! तब यह कैसे मुमकिन होता कि जब यह पूंजी 2014 रच चुकी हो तब 2019 न रच पाती ।
जहां तक कांग्रेस का सवाल है वह वैसे भी देश के एकाधिकारी पूंजी की ही सबसे पुरानी पार्टी है। फिलहाल इसकी जरूरत इस पूंजी के मालिकों को नहीं है। इसीलिये एकाधिकारी पूंजी द्वारा बहुत कम फण्ड ही इसे दिया गया।
        यह चुनाव अपने आप में अभूतपूर्व था यह इंदिरा के गरीबी हटाओ नारे से भी अलग था। यह चुनाव फासीवादी ताकतों द्वारा आने विशुद्ध रूप में अपने फासीवादी एजेंडे पर लड़ा गया था जो अब चुनाव जीत कर अपनी वैधता व वैधानिकता भी ग्रहण कर चुका है इस मायने में यह 2014 के के चुनाव से भी भिन्न है। यह स्थिति निश्चित तौर पर अभूतपूर्व ढंग से देश के मज़दूर वर्ग, जनवाद पसन्द लोग जनपक्षधर लोगो , मेहनतकशजन, आम दलितों मुस्लिमों व महिलाओं के लिए खतरनाक है।
         इस चुनाव में विपक्ष कमजोर था अपने अंतर्विरोधों से ग्रस्त था। यह खुद भ्रष्टाचार में सना हुआ है जनविरोधी व दमनकारी है। जनता को देने के लिए इनके पास कुछ नही है ये उन्हीं नई आर्थिक नीतियों की पैरोकार है व इन्हें लागू कर रही है जिन्हें कांग्रेस व भाजपा लागू कर रही है जिनसे अवाम तबाह बर्बाद हो रही है। तब स्वाभाविक सवाल है कि जनता इनको अपने विकल्प के रूप में कैसे देखती। एक तरफ विकल्पहीनता और दूसरी तरफ कमजोर व बिखरा विपक्ष के चलते भी मोदी की सत्ता में वापसी होने की संभावना थी।
       वैसे भी कॉरपोरेट घरानों तथा कांग्रेस व भाजपा की लम्बे समय से यह ख्वाहिश रही है कि देश में सिर्फ दो पार्टिया हो एक भाजपा दूसरी कांग्रेस। राजनीतिक तौर पर स्थिति ऐसी बनाने की कोशिश भी चल रही है।
          वामपंथी तथा ढेर सारे संगठन व लोग चुनाव के जरिये फासीवादी ताकतों को सत्ता से बाहर करना चाहते थे ! जहां तक सी पी आई व सी पी एम का सवाल है इनकी स्थिति और ज्यादा खराब हुई है अब इनकी कुल 5 सीटें रह गयी है। अन्य पार्टियों की तरह ये भी जनता के लिए विकल्प नहीं बनते। जहां तक जनता के लिए विकल्प का सवाल है इसमें कोई भी पार्टी जनता के लिए विकल्प नही बनती।  इसीलिए कभी सांपनाथ तो कभी नागनाथ वाली बनी हुई है। साथ ही यह भी सच है कि फासीवादी ताकतों के सत्ता में रहने से हालात ज्यादा भयावह होंगे।
        यदि फासीवादी ताकतें सत्ता से बाहर होती या कमजोर हो जाती ! यह केवल उसी सूरत होता में जब एकाधिकारी पूंजी के मालिक ऐसा चाहते तथा अपनी पुरानी वफादार पार्टी कांग्रेस को लाना चाहते! अन्यथा तो केवल और केवल फासीवाद विरोधी सशक्त क्रांतिकारी आंदोलन ही इसे अब जमींदोज कर सकता है।

Thursday, 18 April 2019

जलियावाला बाग शहादत के 100 वें साल पर

     जलियावाला बाग शहादत के 100 वें साल पर

       जलियावाला बाग हत्याकांड के शहीदों को याद  करो ! समाजवाद की राह चलो !

 

       जलियावाला बाग हत्याकांड का यह 100 वां साल है। अंग्रेज सरकार ने क्रांतिकारी संघर्षो को कुचलने के लिए काला दमनकारी कानून' रौलेट एक्ट बनाया था। इसके विरोध में 13 अप्रेल 1919 को' जलियावाला बाग में सभा हो रही थी। सभा करते हज़ारों लोगों पर अंग्रेज सरकार ने गोलियां चलवा दी जिसमें हज़ार से ज्यादा लोग शहीद हो गए। हज़ारों घायल हो गए।
        इस शहीदी दिवस को हम ऐसे मौके पर याद कर रहे हैं जब कि देश में 'आम चुनाव' हो रहे हैं ! इन चुनावों में हम जनता को बताया जाता है कि यहां सबसे बड़ा 'लोकतंत्र' है, कि चुनाव 'महापर्व' है, कि जनता जिसे चाहे- जिस पार्टी को चाहे जिताये, कि वोट डालना नागरिकों की जिम्मेदारी व अधिकार है। 'वोट के अधिकार' पर इतनी "चिंता", इतने विज्ञापन और इतना प्रचार !! मगर  बात जब 'रोज़गार के अधिकार' की हो, 'शिक्षा के अधिकार' की हो, 'इलाज के अधिकार' की हो या फिर 'धरना-प्रदर्शन-विरोध' कर सकने व 'असहमति जताने' 'सवाल करने' के अधिकार की बात हो ! तब जवाब 'लाठीयां-मुकदमे और जेल' होती है।
     चुनाव पर एक दिन वोट डलवाकर फिर रात दिन इन्हीं नागरिकों के अधिकारों पर, सुविधाओं पर डाका डाला जाता है। दिन रात की हाड़ तोड़ मेहनत की जो कमाई होती है उसे हड़पने की स्कीम बनती हैं। फिर अधिकारों के लिए संघर्ष की बात हो या सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने की बात या फिर सरकार और चुने हुए नेताओं की आलोचना बात हो सब कुछ 'देशद्रोह' हो जाता है
       इन स्थितियों में  हम नागरिक जो कि मज़दूर है मेहनतकश है जिनकी तादाद करोड़ों में है यह सवाल हमारे सामने है कि हम इस कथित 'लोकतंत्र' को, इस 'चुनाव' को अपना कैसे और क्यों माने ? इस 'लोकतंत्र' में उनके लिए क्या है ? 70 सालों में इस 'लोकतंत्र' ने हमें क्या दिया ? हम देखते हैं कि जब भी हम अपनी मांगों के लिए आंदोलन करते हैं तो हम पर लाठियां बरसती हैं फर्जी मुकदमे लगते हैं जेलों में सड़ाया जाता है। कानून हमारी मेहनत की लूट के लिए बनाए व बदले जा रहे हैं। सरकार किसी भी पार्टी की हो ! यह बढ़ता ही चला जाता है । ऐसा क्यों ?
      यही सवाल बदले रूप में जैसे तैसे पढाई लिखाई करके नौकरी की तलाश में इधर उधर भटकते करोड़ों नौजवान का है। जैसे तैसे पढाई करते छात्रों का है। मेहनतकश किसानों का है जिन पर तब लाठी गोली चलती है जब वे उपज के वाजिब दाम  के लिए सड़कों पर आते हैं । यही सवाल अपनी जमीन से उजाड़े जा रहे करोड़ों आदिवासियों के सामने है जिनकी जमीन टाटा-एस्सार-मित्तल-जिंदल-अम्बानी जैसे बड़े बड़े पूंजीपतियों को सौपीं जा रही है।
      सचमुच बात यही है कि टाटा बिड़ला एस्सार अम्बानी अडानी जैसे बड़े बड़े पूंजी के मालिक ही देश के मालिक हैं ये 'लोकतंत्र', ये 'चुनाव' इन्हीं का तंत्र है प्रपंच  है । सरकार इन्हीं की, राजनीतिक पार्टियां इन्हीं की! सब कुछ इन्हीं का है। वो संसाधन जो नाम के लिए तो जनता के हैं मगर इसके मालिक भी यही हैं। यही संसाधनों की लूट खसोट मचाते हैं। मेहनतकश जनता की लूट व शोषण के दम पर ये मालामाल होते जाते है। इनकी राजनीतिक पार्टियां और  नेता भी मालामाल होते जाते हैं।
      मेहनतकश जनता को तो यहां इतना ही अधिकार है कि वह पूंजीपतियों की इन पार्टियों में से किसी एक को चुन ले। यह चुन लें अगले 5 सालों में इन पूंजीपतियों की कौन सी पार्टी हम पर डंडा चलाएगी। इस पूँजीवादी व्यवस्था में चुनाव का केवल यही अर्थ है।
       जब देश अंग्रेजों का गुलाम था । शासक अंग्रेज थे तब जलियावाला बाग हत्याकांड रचे गए। इससे आज़ादी की लड़ाई रुकी नहीं। नए जोश से आज़ादी का संघर्ष आगे बढ़ता गया। भगत सिंह, अशफ़ाक़ उल्ला, राजगुरु जैसे नायक पैदा हुए। ये वो दौर था जब मज़दूर मेहनतकशों की दुनिया समाजवादी सोवियत रूस में जगमगा रही थी। यह मज़दूर मेहनतकशों का समाजवादी देश ही था। जो दुनिया की अवाम को गुलामी के खिलाफ उठ खड़े होने व समाजवाद की राह दिखा रहा था । देश दुनिया में चले ऐसे संघर्षो से देश आज़ाद तो हुआ। मगर सत्ता पर  जनता  के प्रतिनिधियों के बजाय   देशी लूटेरे  पूंजीपति व जमींदार काबिज हो गए। हमारी गुलामी बदले रूप में बरकरार रही।
        जैसा कि शहीद भगत सिंह ने कहा था- "गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेजों के सत्ता पर आने से जनता के जीवन में विशेष फर्क नहीं पड़ने वाला" .... " जब तक एक इंसान द्वारा दूसरे इंसान का और एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का शोषण समाप्त नहीं कर दिया जाता तब तक ..शान्ति .. की सारी बातें महज ढोंग के सिवाय और कुछ भी नहीं हैं।" .... " जब तक सारा सामाजिक ढाँचा बदला नहीं जाता और उसके स्थान पर समाजवादी समाज स्थापित नहीं होता, हम महसूस करते हैं कि सारी दुनिया एक तबाह कर देने वाले प्रलय-संकट में है"। गुजरे 70 साल बताते हैं कि शहीद भगत सिंह की ये बातें हर तरह से सही हैं।
       इन गुजरे 70 सालों में कई जलियावाला बाग हत्याकांड रचे गए हैं। तेलंगाना किसान आंदोलन से लेकर उत्तराखण्ड आंदोलन तक और कश्मीर से लेकर मणिपुर मिजोरम तक। दिल्ली, देहरादून, लखनऊ, पटना से कलकत्ता तक राजधानियों में जब भी छात्र, बेरोजगार, संविदा कर्मचारी आदि आंदोलन प्रदर्शन करते हैं तो उन पर लाठियां बरसती हैं। कांग्रेस की सरकार हो चाहे भाजपा की या फिर किसी अन्य की 'लाठी-गोली' चलाने में सभी आगे हैं। लाठी गोली से हमारा मुंह बंद कराने के लिए कई 'रौलेट एक्ट' जैसे कई दमनकारी कानून ये बना चुके हैं। अफस्फा, यू के पी ए, टाडा, मीसा आदि तो चंद नाम हैं । दमन का तंत्र हर बीतते दिन के साथ और मज़बूत होता जा रहा है । आधार के जरिए हर नागरिक की निगरानी की जा रही है। अंग्रेजों की तरह हमारे लुटेरे शासक सोचते हैं कि दमन के कानून से जनता के संघर्ष को रोक देंगे। वे भूल जाते हैं अंग्रेज जलियावाला बाग हत्याकांड कर जनसंघर्ष को नहीं रोक सके तो इनकी क्या बिसात है।
        इन स्थितियों में जलियावाला बाग शहादत हमें प्रेरित करती है राह दिखाती है। जलियावाला बाग शहादत 'आज़ादी' के लिए, अपने अधिकारों के लिए संघर्ष का प्रतीक है गुलामी को न बर्दाश्त करने व इससे नफरत करने का प्रतीक है। यह साम्राज्यवाद के खिलाफ जुझारू संघर्ष का प्रतीक है।
       मगर आज देखिए ! आज 'आज़ादी' की बात करना गुनाह है "देशद्रोह" है। 'गुलामी' 'जी हुजूरी'   आज 'आदर्श' बताए जा रहे हैं।  'सरकार से सवाल करना', 'सरकार की नीतियों को गलत बताना' अपराध है देशद्रोह है ! साम्राज्यवादी अमेरिका के आगे पीछे दूम हिलाना 'राष्ट्रवाद' है ! कमजोर व गरीब देशों को डराना धमकाना जबकि ताकतवर व साम्राज्यवादी देशों के पैरों में लोट पोट हो जाना 'राष्ट्रवाद' है ! यही आज के 'राष्ट्रवादियों' का चरित्र है।
        मोदी सरकार ने अपने आका 'अम्बानी-अडानी' को खुश कर दिया है। आज़ादी से पहले ये "राष्ट्रवादी" अंग्रेजों के सेवा में दंगे करवाते थे आज 'अडानी-अम्बानी व अमेरिका' के सेवक हैं। इनके राज में जनता ज्यादा तबाह-बर्बाद हुई है। मेहनतकश दलितों-मुस्लिमों पर हमले बढ़े हैं। महिलाओं पर यौन हिंसा बढ़ी है। इनके राज में साम्प्रदायिक वैमनस्य बढ़ा है मज़दूर मेहनतकशों के हकों पर हमला बढ़ा है।       
      आज 'हिन्दू फासीवाद' यानी आतंकी तानाशाही का खतरा हमारे बिल्कुल करीब है।  देश को जालिम हिटलर के दौर में पंहुचाने की कोशिश हो रही है।
    ऐसे हालात में जरूरी है कि जलियावाला बाग हत्याकांड के शहीदों को याद किया जाय, उनसे सीखा जाय। इन शहीदों ने हिन्दू-मुस्लिम-सिख का भेद भुलाकर मेहनत-मज़दूरी करने वालों की एकजुटता की मिसाल कायम की।आज़ादी के आंदोलन को आगे बढ़ाया।  इसलिए आज यह जरूरी है कि शहीद भगत सिंह के बताए रास्ते पर हम आगे बढ़ें। केवल और केवल समाजवाद में गई जलियावाला बाग सरीखे हत्याकांड न घटने की गारंटी दी जा सकती है। मेहनतकश जनता को सारे अधिकार मिल सकते हैं। इसलिए आइये ! पूंजीवाद के नाश और समाजवाद की स्थापना के लिए संघर्ष तेज करें ।

अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम

  अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम        अंततः अमेरिकी साम्राज्यवादियों को फिलहाल पीछे हटना ...