Friday, 2 September 2022

दलित जगदीश चंद्र हत्या मामले में लापरवाही बरतने वाले पुलिसकर्मियों पर मुकदमा दर्ज कर गिरफ्तार करो

  
       उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा जिले  के सल्ट विधान सभा क्षेत्र से सवर्ण लड़की से प्रेम विवाह करने वाले दलित जगदीश चंद्र की लड़की के परिजनों ने हत्या कर दी।हत्यारों को गिरफ्तार कर लिया गया है। यदि पुलिस अधिकारियों व कर्मियों ने इस मामले में भारी लापरवाही नहीं की होती तो आज जगदीश चंद्र जिंदा होते। 
       सवर्ण लड़की द्वारा पुलिस अधिकारियों को अपने पति जगदीश और खुद की सुरक्षा के लिए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के लिए प्रार्थना पत्र भेजा गया था। मगर अधिकारियों के स्तर से कोई सुरक्षा नहीं दी गयी। और भारी लापरवाही बरती गई।
       इस बीच सवर्ण लड़की के परिजनों को मौका मिल गया। फिर नतीजा जगदीश चंद्र की हत्या के रूप में सामने आया। यह घटना घोर निंदनीय और घृणित है। 
        यह घटना दिखाती है कि जातिवाद का जहर आज भी विशेषकर सवर्ण समुदाय के एक हिस्से के दिमाग में रचा बसा है। जिसका नतीजा इस तरह की ऑनर किलिंग के रूप में सामने आया है।
      अब हत्यारे परिजनों की गिरफ्तारी हो चुकी है मगर जिन पुलिसकर्मियों और अधिकारियों पर सुरक्षा का कार्यभार था उन्होंने इस मामले में भारी लापरवाही की है या वे खुद भी इसी सवर्ण मानसिकता के शिकार रहे हैं।         इसलिये जरूरी है कि इनके खिलाफ भी कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाय। ये भी हत्या के लिए परोक्ष तौर पर जिम्मेदार है। यदि पुलिसकर्मियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होती है तब यह अन्य जगह भी लापरवाही ना बरतने का संदेश देगा। इस तरह की ऑनर किलिंग की घटनाओं पर कुछ हद तक रोक लगेगी। 
      इसी के साथ ही 'हिंदू राष्ट्र' का नारा देने वाले संघी और भाजपाई भी इस तरह की घटनाओं के लिए परोक्ष तौर पर जिम्मेदार हैं। इनका ' हिंदू राष्ट्र' का साफ मतलब ही है दलित और महिलाएं हिंदू राजाओं महाराजाओं के राज में भयानक उत्पीड़ित थी आज फिर से बड़े स्तर पर उत्पीड़ित होंगे। ये उत्पीड़ित होने वाले गरीब मेहनतकश या आम जनसमुदाय के हिस्से ही होंगे।
      जब से ये हिंदू राष्ट्र का नारा देने वाले लोग सत्ता पर आए हैं सवर्ण समुदाय से उन लोगों के हौंसले बुलंद हो गए हैं जो सवर्ण हिंदू मानसिकता से ग्रसित हैं।  और इसके नतीजे के बतौर आम दलितों और महिलाओं पर अत्याचार बढ़ गए हैं। इसलिये जरूरी है कि इनका, इनके  हिंदू राष्ट्र के विचारों का विरोध किया जाय।
    





Tuesday, 23 August 2022

बिल्किस बानो की बलात्कारियों की रिहाई के विरोध में


     बिल्किस बानो के बलात्कारियों और उसके परिवार के 7 लोगों समेत 3 साल की मासूम बच्ची का कत्ल कर देने के अपराध में 11 लोगों को आजीवन की कारावास की सजा हुई थी।
        मगर ठीक 15 अगस्त 2022 को जब लालकिले से प्रधानमंत्री मोदी तमाम दावे कर रहे थे और आजादी के अमृत महोत्सव का जिक्र कर रहे थे ठीक उसी दिन बिल्किस बानो के अपराधियों को गुजरात सरकार द्वारा माफीनामा देकर रिहा कर दिया गया। जिस कमेटी ने इन अपराधियों की रिहाई की संस्तुति दी उसमें भाजपा से जुड़े 5 लोग थे। 
      मामला यहीं तक सीमित नहीं रहा अपराधियों को जिन पर जघन्य हत्या और बलात्कार के मुकदमे दर्ज थे उन्हें मिठाई खिलाई गयी और इनका फूल मालाओं से स्वागत किया गया।
          मोदी और मोदी सरकार ने इस रिहाई के खिलाफ एक शब्द बजी अभी तक नहीं बोला है। इसका अर्थ साफ है कि यह सब ऊपर के इशारे पर हुआ है।
        इस तरह अब खुलेआम एक बलात्कारियों और हत्यारे लोगों के पक्ष में भाजपा दृढ़तापूर्वक खड़ी हुई है। भाजपा, गुजरात सरकार और मोदी तथा इनकी केंद्र सरकार ने एक धर्मविशेष के खिलाफ अपराध करने को प्रोत्साहित किया है। साथ ही साथ महिलाओं की स्थिति को, उनके संघर्षों करने के साहस को, अपने अपराधियों को चुनौती देने और दंडित करवाने की चाहत को कमजोर किया है।
         मामला एक तरह से केवल एक धर्म विशेष तक सीमित नहीं रहेगा। यह ध्रुवीकरण की  फासीवादी राजनीति को आगे बढ़ाने का घटिया प्रयास है। यह एक तरह से भाजपा और संघी लम्पट तत्वों को किसी भी आम महिला के साथ हिंसा और अपराध करने को उत्साहित करने और बढ़ावा देने वाला कृत्य है। इसलिये जरूरी है कि इसके खिलाफ संघर्ष किया जाय। तथा एकजुट होकर रिहा किये गए बलात्कारियों और हत्यारे तत्वों की रिहाई को रद्द करने और इन्हें दंडित किये जाने के एकजुट होकर आवाज बुलंद की जय।
    




Friday, 15 April 2022

जलियावाला बाग हत्याकांड के शहीदों की स्मृति में

       जलियावाला बाग हत्याकांड के शहीदों की स्मृति में

         जलियांवाला बाग कांड के शहीदों की स्मृति में  जलियांवाला बाग हत्याकांड आजादी के आंदोलन की बहुत बड़ी घटना है। 13 अप्रैल 1919 के दिन 'हिंदू-मुस्लिम-सिक्ख जनता' एकजुट होकर जलियांवाला बाग में सभा कर रही थी। ये हज़ारों लोग निहत्थे थे। इन्हें घेरकर अंग्रेज सरकार ने गोलियां चलवा दी। जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए और घायल हो गए थे।
       जनता के संघर्ष को कुचलने की यह भयानक कोशिश थी। मगर संघर्ष थमा नहीं। जोर-शोर से आगे बढ़ गया। जनता आज़ादी के लिए सड़कों पर उमड़ पड़ी। भगतसिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफ़ाक़, बिस्मिल, उधम सिंह जैसे क्रांतिकारी पैदा हुए। फिर वह वक्त करीब आया जब देश आजाद हो गया।
       जलियांवालाबाग हत्याकांड हमें बर्बर अंग्रेजी राज की याद दिलाता है। भारत की जनता और संसाधनों की अंग्रेज शासकों द्वारा होने वाली क्रूर लूट-खसोट की याद दिलाता है। ब्रिटिश साम्राज्यवाद की दुनिया भर के गुलाम देशों की जनता के कत्लेआम की याद दिलाता है।
    जलियांवालाबाग हत्याकांड हमें उन काले कानूनों की याद दिलाता है जिन्हें खत्म करवाने के संघर्ष में सैकड़ों लोग 13 अप्रेल 1919 को शहीद हो गए थे।
      जलियांवाला हत्याकांड भारत की जनता की नग्न लूट-खसोट, शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ हुए कई संघर्ष में एक कड़ी थी।
     इसमें एक ओर कोल विद्रोह, संथाल विद्रोह, भील विद्रोह, मुंडा विद्रोह के रूप में आदिवासियों के संघर्ष थे। दूसरी ओर अंग्रेज सरकार और इनके एजेंट जमींदारों और सूदखोरों की भयानक लूट खसोट के खिलाफ किसान संघर्ष थे। नील, पाबना, मोपला, कूका आदि किसानों के विद्रोह थे। बाद में मजदूर भी यूनियन बनाकर  पूंजीपतियों और अंग्रेज सरकार की लूट के खिलाफ जुझारू संघर्ष करने लगे।
    इन संघर्षों में भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम भी था। इसमें किसान, सैनिक और कई राजा-रजवाड़े एकजुट होकर आज़ादी के लिए लड़े थे।
       अंग्रेज साम्राज्यवादियों की भयंकर लूट-खसोट से भारत के करोड़ों दस्तकार खासकर जुलाहे तबाह-बर्बाद हो गए और मारे गए ; भारत में बड़े-बड़े अकाल पड़े जिसमें 3 करोड़ से ज्यादा आबादी मारी गई। लाखों लोग अंग्रेजों से मुक्ति की लड़ाई लड़ते हुए मारे गए।
      इसी तरह की लूट-खसोट और हत्याएं  साम्राज्यवादी देश दुनिया भर में कर रहे थे। इसी के चलते दुनिया में बड़ी उथल-पुथल होने लगी।
       1910-20 का दौर दुनिया में बड़े उथल-पुथल का था। दुनिया के गरीब देशों की लूट-खसोट और इनके बंटवारे की होड़ में इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, अमेरिका जैसे ताकतवर मुल्कों के बीच पहला विश्व युद्ध हुआ। इस युद्ध के खर्चे का बोझ भी इन्होंने गुलाम देशों की जनता के कंधों पर लाद दिया।
     अंग्रेज सरकार ने देश में जनता की लूट-खसोट खूब बढ़ा दी। जनता के क्रांतिकारी संघर्षों को कुचलने के लिए अंग्रेज सरकार ने रॉलेट एक्ट (काला कानून) बना दिया।
         इस काले कानून से अंग्रेज सरकार अब किसी को भी केवल शक जताकर 'आतंकवादी ठहरा' सकती थी, बिना सुनवाई के 2 साल तक जेल में बंद कर सकती थी।
      इसके विरोध में ही  'जलियांवाला बाग' में 20 हज़ार से ज्यादा लोग सभा कर रहे थे। जिन पर अंग्रेज सरकार ने गोलियां चलवाई।
          जलियावाला बाग हत्याकांड के शहीदों ने अंग्रेजों की 'फूट डालो- राज करो' की नीति को पीछे धकेल दिया था। 
1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भी 'हिंदू-मुस्लिम' एकजुट होकर आज़ादी के लिए लड़े थे। इस संग्राम के लोगों ने अपना नेता  'बहादुर शाह जफर' को चुना था। इस संग्राम ने अंग्रेज सरकार को हिला दिया था।  
       अब अंग्रेज सरकार ने धर्म को हथियार बनाया। इस हथियार से 'हिंदू-मुस्लिम'  जनता को बांटने व आपस में लड़ाने का काम किया। धार्मिक कट्टरपंथी संगठनों को पाला पोसा। इतिहास तो पहले से ही अंग्रेजों ने इस ढंग से लिखा था कि अलग-अलग धर्म की जनता आपस में लड़े और मर-कटे। इस तरह अंग्रेज सरकार, जमींदार, पूंजीपति और सूदखोर मजे से लूट-खसोट करते रहते। इनका राज लंबे समय तक बने रहता।
       मगर ऐसा हुआ नहीं। एक तरफ दुनिया में साम्राज्यवादी लूट खसोट थी। उस दौर में पहला विश्व युद्ध हो रहा था। युध्द निपटते-निपटते रूस में मजदूर, किसान और मेहनतकश जनता ने क्रांति कर दी थी। पूंजीपतियों और जमींदारों से सत्ता छीन ली थी। अब जनता शासक बन गई। इसने शोषण-उत्पीड़न पर पाबंदी लगा दी। रोजगार की गारंटी की। मुफ्त शिक्षा और इलाज की व्यवस्था की। श्रम करना (मेहनत) हर स्वस्थ नागरिक के लिए अनिवार्य कर दिया।
        जनता के इस राज ने दुनिया भर की जनता को ताकत दी। मजदूर मेहनतकश जनता ने अपने-अपने देशों में भी यही सब करने के लिए संघर्ष शुरू कर दिये। कुछ देशों में ही जनता सफल हुई। मगर 40-50 साल बाद फिर से साजिश रचकर पूंजीपति शासक बन गए। जनता का राज खत्म हो गया।
       उस दौर में ज्यादातर देशों में देशी पूंजीपति, जमींदार जनता के संघर्षों पर सवार होकर सत्ता पर पहुंच गए। यही भारत में भी हुआ। देश आजाद हो गया। मगर यह जनता का राज नहीं था। यह पूंजीपतियों का राज था। सरकार और पार्टियां पूंजीपतियों की थी। जनता को इस सरकार को चुनने की आज़ादी भर थी। 
        यही वजह है कि 70 साल पहले जो वायदे थे, नारे थे, वही आज भी हैं। गरीबी हटाने की, रोजगार देने की बात हुई; महंगाई कम करने, महिलाओं को सुरक्षा देने, सबको सस्ता इलाज, सस्ती शिक्षा की और अधिकारों की बातें हुई। 
        आज बेरोजगारी के क्या हाल हैं? महंगाई कितनी है ? महिलाओं की सुरक्षा के क्या हाल हैं, सस्ती शिक्षा और इलाज की क्या व्यवस्था है ?   
       आज़ादी के बाद एक दौर में जनता को संघर्षो से जो थोड़ा बहुत हासिल हुआ भी था। वह सब भी पिछले 30 सालों से छीना जा रहा है। यह नयी आर्थिक नीति (निजीकरण-उदारीकरण की नीति) के जरिये हो रहा है।
      इन नीतियों से अंबानी, अडानी, टाटा बिड़ला जैसे कॉरपोरेट पूंजीपति की दौलत को बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। आम जनता की लूट खसोट को बेतहाशा बढ़ रही हैं। अमीरी और गरीबी के बीच खाई ज्यादा गहरी होती जा रही है।
       सरकारों ने इन पूंजीपतियों पर लगने वाले संपत्ति कर को खत्म कर दिया। कॉरपोरेट टैक्स को बहुत कम कर दिया। जनता पर टैक्स का भारी बोझ लाद दिया है। जनता पर खर्च होने वाले बजट को भी पूंजीपतियों पर लुटाया है।    
       सरकारी नौकरियों में भर्ती पर रोक है या संविदा (ठेके) पर भर्ती हैं। सरकार खुद सरकारी विभागों में भोजन माता, आशा वर्कर आदि से बेगारी करवा रही है।
        इसीलिए मार्च 2020 से नवंबर 2021 के बीच देश के इन पूंजीपतियों की दौलत 30 लाख करोड़ रुपये बढ़ गयी। जबकि लॉकडाउन के चलते 12 करोड़ लोगों का रोजगार चौपट हो गया। करोड़ों  आबादी गरीबी में धकेल दी गयी।
        जिस जनता ने आज़ादी के संघर्ष में कुर्बानियां दी; आज़ादी के बाद देश के निर्माण में अपना खून पसीना बहाया, आज वही कंगाल हैं मोहताज हैं। यह अब सम्मानजनक नागरिक नहीं बल्कि 'लाभार्थी' है। इनके अधिकार को सरकार ने खैरात बना दिया है।
       'निजीकरण-उदारीकरण' की नीतियों के मामले में भाजपा, कांग्रेस, सपा, आम आदमी पार्टी, बसपा आदि सभी एकजुट हैं। सभी इन नीतियों को अपने-अपने तरीके से लागू करती हैं। ये सभी पार्टियां भ्रष्ट हैं। जनविरोधी हैं।
         आज इन्हीं नीतियों को दुनिया में हर देश की सरकार अपनी जनता पर थोप रही है। ये नीतियां इंग्लैंड, अमेरिका, फ्रांस, रूस, जर्मनी जैसे लुटेरे (साम्राज्यवादी) देशों के शासकों ने थोपी हैं। हर देश के शासक पूंजीपति भी इन नीतियों के पक्ष में हैं। देशी-विदेशी शासक मिलजुलकर लूट खसोट मचा रहे हैं। हिस्सा बांट रहे हैं।
         ये साम्राज्यवादी देश दुनिया की लूट-खसोट के लिए तो एकजुट हैं मगर लूट-खसोट में किसकी कितनी हिस्सेदारी हो, इसके लिए आपस में इनमें झगड़े हैं, टकराहटें हैं। युक्रेन पर हमला इसी टकराहट के कारण हैं। आने वाले समय में टकराहटें ज्यादा तीखी होंगी।
          हमारे शासक जानते हैं इनकी यह लूट-खसोट जनता को तबाह-बर्बाद करेगी, कंगाल कर देगी। जिस तेज गति से महंगाई और बेरोजगारी बढ़ रही है कभी भी जनता का सैलाब सड़कों पर उमड़ सकता है। किसान एक साल तक संघर्ष में डटे रहे थे। बेरोजगारों ने पटना, इलाहाबाद में उग्र प्रदर्शन किए थे।
        जनता के संघर्षों को कमजोर करने के लिए ही इनके पास 'हिंदू-मुस्लिम' की जहरीली राजनीति है। ये एक धर्म को दूसरे धर्म के लिए खतरा बता रहे हैं। धर्म के नाम पर हथियार उठाने की अपील कर रहे हैं।
        आम जनता जो किसान हैं, मजदूर हैं, बेरोजगार हैं,  छोटे दुकानदार और छोटे कारोबारी हैं इनकी आवाज को ये धर्म की आड़ में खामोश   कर देना चाहते हैं। ये 'हिंदू-मुस्लिम' के नाम पर 'अमीर और गरीब',  'पूंजीपति और मजदूर', 'शोषक पूंजीपति और मेहनतकश जनता' के बीच के असली बंटवारे पर पर्दा डाल देना चाहते हैं।  
       जलियांवाला बाग के शहीदों को ऐसे वक्त में याद करना बेहद जरूरी है। इन शहीदों  ने अंग्रेजों की चाल को समझ लिया था। इसलिये 'हिंदू-मुस्लिम-सिक्ख' जनता सभी एकजुट और एकजान होकर लड़ सके।

       आइये ! जलियांवाला बाग के शहीदों की राह चलें। अपने अधिकारों के लिए आवाज बुलंद करें।

Tuesday, 22 March 2022

भगत सिंह शहादत दिवस पर

भगत सिंह शहादत दिवस पर

          23 मार्च भगत सिंह का शहादत का दिन है। 1931 में इसी दिन अंग्रेजों ने उन्हें फांसी दी थी। इसी दिन राजगुरु और सुखदेव को फांसी हुई थी। ये सभी शहीद हो गए मगर हमारी यादों में आज भी ज़िंदा हैं।
         भगत सिंह को हम क्यों याद करते हैं ? क्यों भगत सिंह का नाम शहीदों में सबसे ऊपर है ? क्यों भगत सिंह को भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश की आम जनता याद करती है ? भगत सिंह के विचारों में ऐसा क्या था कि वह आम जनता के दिलों में बसते हैं?
        शहीद भगत सिंह के पास एक विचार था, एक दृष्टि थी। भगत सिंह मजदूरों, किसानों की राजनीति करते थे। वह आम जनता की लूट-खसोट के विरोधी थे। शहीद भगत सिंह ऐसा समाज चाहते थे जहां हर चीज की मालिक आम जनता हो। समाज की जरूरत के हिसाब से हर चीज पैदा हो। हर किसी के लिए रोज़गार, इलाज, पढ़ाई की गारंटी हो।
       शहीद भगत सिंह को आम जनता की  मेहनत की लूट-खसोट मचाने वाले देशी-विदेशी पूंजीपतियों और जमींदारों से नफरत थी।
        दूसरे देश को गुलाम बनाने वाले विदेशी शासकों से भगत सिंह को नफरत थी। मेहनतकश जनता का राज समाजवाद लाना ही भगत सिंह का मकसद था। इसी के लिए उन्होंने संघर्ष किया।
     इसीलिए ये लुटेरे अंग्रेज, देशी-विदेशी पूंजीपति और जमींदार इन विचारों से डरते थे। आज के शासक भी इसीलिए भगत सिंह के विचारों से डरते हैं। ये जानते हैं भगत सिंह के विचारों पर जिस दिन जनता खड़ी होगी, उस दिन इनकी लूट खसोट खत्म हो जाएगी।
         भगत सिंह को हिंदू-मुस्लिम जनता के बीच फूट डालने वालों व जनता की एकता को कमजोर करने वालों से नफरत थी। अंग्रेज़ सरकार और पूंजीपति इन संगठनों को पालते पोसते थे। इनकी नीति थी - आम जनता के बीच "फूट डालो" और "राज करो"।
        'हिंदू कट्टरपंथी' संगठन मुस्लिमों के खिलाफ नफरत पैदा करते थे जबकि 'मुस्लिम कट्टरपंथी' संगठन हिंदुओं के खिलाफ नफरत पैदा करते थे। इस तरह आज़ादी का आंदोलन कमजोर पड़ जाता था, लूट खसोट के खिलाफ संघर्ष आगे कमजोर पड़ जाता था। इस जहरीली राजनीति के खिलाफ भगत सिंह ने लेख लिखा 'साम्प्रदायिक दंगे और इनका इलाज'।
          यही वजह है भगत सिंह को हर जगह की जनता याद करती है। कई लोग और संगठन उनके विचारों को याद करते हैं उस पर चलते हैं। भगत सिंह की इसी साख का कुछ संगठन, पार्टियां इस्तेमाल करती हैं। वे भगत सिंह की फ़ोटो तो जरूर लगाते हैं मगर काम हिटलर-मुसोलिनी वाला करते हैं।
       आज जो राष्ट्रवाद की बात करते हैं संस्कृति की बात करते हैं हिंदू धर्म पर खतरे की बात करते हैं उन्हें आज़ादी से नफरत है बराबरी से नफरत है। ये पूंजीपतियों के नंगे सेवक हैं। जब भगत सिंह जैसे नौजवान देश के लिए कुर्बान हो रहे थे तब ये फर्जी राष्ट्रवादी अंग्रेजों, जमींदारों के हित साध रहे थे।
         अब देश को आज़ाद हुए 75 साल हो चुके। क्या भगत सिंह ने जैसा समाज चाहा था, यह वैसा ही समाज है? नहीं। क्या आज समाज में हिंदू मुस्लिम जनता के बीच गहरी खाई नहीं पैदा कर दी गयी हैं ? क्या दूसरे धर्म का 'काल्पनिक और फर्जी खतरा' इन संगठनों और पार्टियों ने हम जनता के दिमाग में नहीं बिठाया है? व्हाट्स एप्, फेसबुक, अफवाहों व तरह तरह से झूठे, आधे अधूरे सत्य और  मनगढ़न्त बातों से जहर दिमाग में ठूंसा जा रहा है।
      शहीद भगत सिंह अपने जमाने में काले कानूनों के खिलाफ लड़े थे। 1928 में अंग्रेज सरकार 'ट्रेड डिस्प्यूट बिल' लायी। इससे अंग्रेज फैक्ट्रियों में मजदूरों की हड़ताल को खत्म कर देना चाहते थे । आज़ादी के आंदोलन को खत्म करने के लिए 'पब्लिक सेफ्टी बिल' (कानून) लायी। किसी भी हड़ताल को गैरकानूनी बताकर कुचलना आसान था। किसी को केवल शक होने पर बिना मुकदमे के जेल में डाला जा सकता था।
         इन काले कानूनों के विरोध में ही भगत सिंह ने असेंबली में बम विस्फोट किया। ताकि बहरों को आवाज सुनाई जा सके। अंग्रेज सरकार और पूंजीपतियों व जमींदारों की नज़र में भगत सिंह आतंकवादी थे, देशविरोधी थे। इसीलिए भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी हुई।
आज़ादी के बाद क्या हाल हैं? राष्ट्र या देश के नाम पर जनता के खिलाफ कानून बनते हैं। आतंकवाद के नाम पर काले कानून बनते हैं। आज यू.ए.पी.ए., राजद्रोह, पब्लिक सेफ्टी कानून, रासुका, एस्मा जैसे काले कानूनों की भरमार है।
        इन काले कानूनों का इस्तेमाल जनता के खिलाफ ही होता है। टाडा में 97 प्रतिशत बेगुनाह लोगों को फंसाया गया। यही हाल राजद्रोह, यू.ए.पी.ए. और रासुका का है।  
         जब भी कर्मचारी हड़ताल पर आते हैं इसे रोकने के लिए सरकार एस्मा (आवश्यक सेवा अनुरक्षण कानून) लगा देती है।
        आम जनता के पक्ष में आवाज उठाने वालों को अधिकतर लोगों को इन काले कानूनों में फर्जी मुकदमे लगाकर फंसाया जाता है। हज़ारों बेकसूर लोग जेलों में सड़ाये जा रहे हैं। आज जो कोई भी मोदी सरकार की पोल खोलते हैं या अपनी मांगों पर आंदोलन करते हैं वही देश विरोधी हैं, अरबन नक्सल हैं, आतंकवादी हैं।
         मोदी सरकार घोर मजदूर कर्मचारी विरोधी श्रम कानून भी बना चुकी है। ये इसे अब पूरी तरह से लागू करने वाले हैं। अब काम के घंटे 12 हो गए हैं। हड़ताल करना बेहद मुश्किल है। फैक्ट्री मालिकों को मेहनत की लूट की खुली छूट है।
         इनके राज में सरकारी नौकरियों में भर्तियां ही बेहद कम हो गयी हैं। अधिकांश भर्तियां ठेके के भरोसे हैं। अब मोदी सरकार यू.पी.एस.सी. और विश्विद्यालयों में भी अपनी मनमर्जी के हिसाब से शिक्षकों की भर्ती सीधे करेगी। पढ़े-लिखे नौजवान जो सरकारी नौकरी उम्मीद में दिन-रात मेहनत करते थे, उनकी उम्मीदें बिल्कुल मुरझा गयी हैं।
         आज हालत क्या है। एक तरफ भयानक बेरोजगारी है, दूसरी तरफ ऊंची महंगाई है। इलाज कराना बेहद मुश्किल है। पढाई काफी महंगी है। हर चीज पर टैक्स बढ़ाकर इन्होंने महंगाई बहुत बढ़ा दी है। इधर रोजगार का कोई भरोसा नहीं।
          देश जनता का है। करोड़ो-करोड़ जनता ने इसे अपने मेहनत और खून-पसीने से इसे सींचा है। इस भारत का निर्माण किया है। मगर यही जनता हर चीज के लिए मोहताज हैं। इस जनता के बेटे-बेटियों के लिए ठेके की नौकरियां हैं या फिर पकोड़ा तलने का रोजगार।
         2020 के सख्त लॉकडाउन और इसके बाद जब हर घंटे 2 लाख लोगों का रोजगार चौपट हो रहा था तब अंबानी हर घंटे में 90 करोड़ रुपये कमा रहा था।
         मोदी जी और इनकी सरकार कॉरपोरेट मालिकों की सबसे अच्छी चौकीदार है, सबसे बढ़िया सेवक है। इसीलिए इनकी पार्टी भी सबसे ज्यादा अमीर पार्टी है।
        कॉरपोरेट बिड़ला वाली वोडाफोन-आईडिया कंपनी घाटे में चल रही थी। इस पर लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज था। मोदी सरकार ने जनता के पैसों से (सरकारी खजाने से) इसकी भरपाई कर दी। सबसे ज्यादा हिस्सेदारी इसमें अब सरकार की है मगर सरकार इसकी मालिक नहीं ।
       इस तरह कॉरपोरेट घराने मोदी राज में खूब तरक्की कर रहे हैं। मोदी जी के परम मित्र अडानी और अंबानी दुनिया की टॉप पूंजीपतियों की लिस्ट में आ चुके हैं । टाटा को एयर इंडिया कौड़ी के मोल हासिल हो गयी है। फिर मोदी जी 'महान' क्यों ना हों !
       ये मुट्ठी भर कॉरपोरेट घराने ही असली शासक हैं यही हर संसाधनों के मालिक हैं। यही देश के मालिक हैं। सरकार इनकी मुट्ठी में है। ये जिसकी चाहें उसकी सरकार बना दें। राहुल, केजरीवाल, अखिलेश आदि सभी इनके सेवक हैं
        यही कॉरपोरेट घराने अपने मुनाफे की हवस में समाज को गहरी खाई की ओर धकेलते जा रहे हैं। इन्होंने करोड़ों-करोड़ आम जनता के अधिकारों पर डांका डाला है,  इनकी मेहनत को हड़पा है और इन्हें कंगाली में धकेला है। इन्होंने जनता के अधिकार को 'खैरात' बना दिया है। आम नागरिकों को कंगाल करके 'लाभार्थी' बना दिया है।
          यही हिंदू-मुस्लिम की ज़हरीली राजनीति को आम जनता के दिमाग में डलवाने वाले असली गुनाहगार हैं। 'फूट डालो-राज करो', यही इनकी नीति है।
          इस सबके बावजूद बेरोजगार रोजगार के लिए सड़कों पर उमड़ आ रहे हैं। किसान साल भर तक सड़कों पर डटे रहे। सी ए ए, एन आर सी के विरोध में देश भर में संघर्ष हुए हैं। इसी संघर्ष से ये डरते हैं। इसे कमजोर करने के लिए ही 'हिंदू मुस्लिम' की जहरीली राजनीति आम जनता में ठूंस रहे हैं।
         क्या शहीद भगत सिंह ने ऐसे ही समाज का ख्वाब देखा था? क्या भगत सिंह का 'समाजवाद' यही है ? नहीं। यह लंपट पूंजीवाद है। यह टाटा-बिड़ला, अडानी-अंबानी का राज है।
आइये ! शहीद भगत सिंह के रास्ते पर बढ़ने का संकल्प लें। संघर्षों के रास्ते पर बढ़ें। यही आम जनता की तमाम तकलीफों से मुक्ति का रास्ता है

अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम

  अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम        अंततः अमेरिकी साम्राज्यवादियों को फिलहाल पीछे हटना ...