Monday, 9 December 2019

हैदराबाद में आरोपियों के एनकाउंटर किये जाने पर

  हैदराबाद में आरोपियों के एनकाउंटर किये जाने पर

    हैदराबाद में डॉक्टर महिला के साथ यौन हिंसा ,हत्या करने फिर जल देने के आरोपी 4 मज़दूर पृष्ठभूमि के नौजवान बताए गए थे। पुलिस ने इन्हें जल्द ही कथित अपराधियों को गिरफ्तार कर लिया था। 
   गिरफ्तारी के बाद फिर मामला कोर्ट में चलता वहां पुलिस को साबित करना था कि जिन्हें पुलिस ने पकड़ा है वे वही अपराधी हैं जिन्होंने यौन हिंसा व हत्या की फिर जला दिया।
  इस क्रूर शर्मनाक बर्बर आपराधिक घटना से समाज में आक्रोश था। लेकिन चंद रोज़ गुजरते ही सुबह सुबह सीन रीक्रिएट करने की आड़ में इनका एकाउंटर कर दिया। मीडिया व भीड़ के जरिये इसे खूब प्रचारित किया।  जिस पुलिस पर समाज में वैसे ही कोई भरोसा नहीं है उसके खिलाफ एक आक्रोश है वह अचानक हीरो बन गयी। उस पर फूल बरसाए गए।
     पुलिस की यह कार्यवाही समाज में आम लोगों की पिछड़ी चेतना को हवा देने के अलावा फासीवादी बढ़ते फासीवादी रुझाम को आगे बढ़ाता हैं।
     आरोपी मज़दूर थे। न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से यह साबित होता कि वह अपराधी थे या नहीं । यदि अपराधी साबित होते तो प्रावधानों के मुताबिक सजा मिलती।
   आम जनमानस में यह धारणा कि आम तौर पर अपराधी बच जाते हैं। अपराधियों को आम तौर पर सजा नहीं होती है। यह बात सही है कि इस होता है। लेकिन आम तौर पर ऐसा इसलिए भी होता है कि अपराधी रसूखदार घरों से सम्बंधित होती है जबकि पीड़ित तुलनात्मक तौर पर कमजोर। ऐसा होने की एक वजह यह भी है कि पुलिस लापरवाह, भ्रष्ट व महिला विरोधी होती है यानी वह पुरुष प्रधान मानसिकता से ही प्रस्थान करती हैं। यही न्यायपालिका में होता है। कोर्ट में असुरक्षा, गवाह के बतौर असुरक्षा। जिसके दबाव, तनाव के चलते पीड़ित पीछे जाट जाता है या फिर साबित करना बहुत मुश्किल हो जाता है।अपराधी छूट जाता है।
    इस वजह से भी अपराधियों को तत्काल सजा देने की प्रवृति जन्म लेती है। इसी की आड़ में पुलिस ने एकाउंटर कर दिया।
    यदि अपराधी दबंग व रसूखदार परिवारों1 से होते तो पुलिस उन्हें सलाम ठोकती उन पर लगे आरोपों को कमजोर कर देती कोर्ट में चार्जेशीट दाखिल बहुत देर के करती । जांचपड़ताल इस ढंग से करती कि सबूत नष्ट हो जाएं।
     इस बात की भी संभावना है कि असल अपराधी कोई और हों और पुलिस ने उन्हें बचाने व केस को खत्म कर देने के लिए एकाउंटर कर दिया हो। 
 

    
 
 

Sunday, 8 December 2019

रांची, सम्भल, हैदराबाद व दिल्ली में हुई यौन हिंसा व हत्या पर

रांची, सम्भल, हैदराबाद व दिल्ली में हुई यौन हिंसा व हत्या पर

                अभी अभी कुछ दिनों के भीतर ही रांची, सम्भल, दिल्ली और हैदराबाद में यौन हिंसा हुई है हैदराबाद व दिल्ली में महिला के साथ यौन हिंसा के बाद उनकी हत्या भी कर दी गई। हैदराबाद में 27 वर्षीया जानवरों  की डॉक्टर से चार लोगों ने बलात्कार किया हत्या करने के बाद पेट्रोल डालकर जला दिया। राँची में लड़की का सरेआम किडनेप कर उसके साथ यौन हिंसा की गई। सम्भल में भी एक लड़की के साथ यौन हिंसा के बाद जला दिया गया! लड़की अभी के अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रही है। जबकि दिल्ली में 55 वर्षीया महिला के साथ यौन हिंसा के बाद हत्या कर दी गई। हकीकत तो यही है कि एसी ही कई घटनाएं इस बीच और भी हुई होंगी ! जो न तो अखबारों की खबरें बन पाती है ना ही पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज होती हैं इसलिए उनकी खबर किसी को नहीं हो पाती।
     साल 2017 में ही महिलाओं के अपराध(बलात्कार) के 32559 आंकड़े दर्ज किए गए। इनमें से 93.1 प्रतिशत मामलों में आरोपी करीबी लोग ही थे। महिलाओं के खिलाफ अपराध की ये घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। यौन हिंसा व हत्या कर देने की घटनाएं केवल घर से बाहर ही नहीं होती बल्कि घरों पर भी होती हैं। इन्हें अंजाम देने वाले अजनबी ही नहीं होते हैं बल्कि  बेहद करीबी लोग भी होते हैं। जो सोचते हैं कि पुलिस व फौज से सुरक्षा मिल जाएगी। उन्हें 'रामपुर तिराहा कांड' को याद रखना चाहिए ! जब 26 साल पहले 2 अक्टूबर को  'अलग उत्तराखंड' के लिए बसों में भर कर स्त्री व पुरुष प्रदर्शन के लिए दिल्ली जा रहे थे तब पुलिस ने क्या क्या जुल्म महिलाओं पर ढाए थे। यही हाल कश्मीर से लेकर मणिपुर व आदिवासी इलाकों में आंदोलनों में महिलाओं के साथ होता है।
  जो सोचते है कि 'कम कपड़े पहनने' से या रात को बाहर घूमने पर ही यह सब होता है तो उन्हें अपनी सोच दुरुस्त करनी होगी। क्योंकि छोटी मासूम बच्चियों से लेकर 80 साल तक की बुजुर्ग महिलाओं के साथ भी यह हो रहा है। यह घर के अंदर भी बहुत हो रहा है।
      इस अपराध के खिलाफ जुमले तो बहुत उछाले गए थे ! दावे भी बहुत किये गए थे ! मगर हश्र हमारे सामने है। 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' ! 'बहुत हुआ महिलाओं पर अत्याचार-अबकि बार भाजपा सरकार' जैसे नारे  'हिन्दू फ़ासीवादियों ने उछाले ! नतीजा क्या हुआ ? घटनाएं कम तो नहीं हुई और ज्यादा बढ़ गई ! और हुआ ठीक बिल्कुल उल्टा ! महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के आरोपी ही अब मोदी -योगी की सरकार में मंत्री बन गए और अपने पापों से मुक्त होकर 'संत' बन गए ! कुलदीप सेंगर, चिन्मयानंद जैसों  का नाम अब कौन है जो नहीं जानता ! बात केवल इन 'हिन्दू फासीवादी' ताकतों की ही नही है कांग्रेस, सपा, बसपा सभी के यही हाल हैं। सभी यौन हिंसा में लिप्त अपनी पार्टी के आदमी का अंत तक बचाव करते हैं। जब आलम ऐसा हो तो कोई कैसे उम्मीद कर ले कि महिलाओं के खिलाफ होते अपराध कम हो जाएंगे । बल्कि होगा तो इसका उल्टा ही। 'जैसे नेता- वैसी जनता' वाली ही बात होगी। अपराध तो बढ़ते ही जायेंगे।
      फिर सवाल यही बनता है कि किया क्या जाय ? क्या अपराधियों को फांसी देने से अपराध कम हो जाएंगे ? महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध की  वजह यह भी है कि जिन घटनाओं में अपराधी रसूखदार पैंसे वाले होते हैं आम तौर पर इनका कुछ भी नहीं बिगड़ता ! पूरा समाज पुरुषवादी सोच, सामंती सोच से ग्रसित है जहां महिलाओं की बराबरी, बराबर के अधिकार के सवाल को ही गलत माना जाता है ! तमाम पाबंदियां महिलाओं पर ही थोपी जाती हैं उसी को परिवार की इज्जत के नाम पर सब सहना पड़ता है जबकि पुरुष के मामले में ठीक उलटा है। यौन हिंसा को अंजाम देने वालों अपराधियों को केवल 'लड़कों की गलती' कहकर छोड़ देने की बातें होती हैं जबकि लड़कियों के मोबाइल, मॉडर्न कपड़ों से लेकर घर से निकलने पर तक पाबंदी लगा देने की बातें होती हैं !
   जहां तक फांसी देकर अपराध खत्म करने का सवाल है यह नामुमकिन हैं ! यह समाज के बुनियादी ढांचे की गड़बड़ी को सही नही कर सकता जिसके चलते अपराधी पैदा होते हैं ! 30-40 साल पहले रंगा-बिल्ला को यौन हिंसा व हत्या के मामले में भी फांसी देने की बात हुई ! दोनों को फांसी दी भी गयी। उसके बाद भी कुछ मामलों में फांसी दी गई ! मगर नतीजा क्या हुआ ?
कोई भी समाज महिलाओं को असुरक्षित स्थिति में रखकर खुद सुरक्षित नहीं रह सकता ! महिलाओं की बेहतर स्थिति बराबरी व सम्मान ही किसी समाज की बेहतरी का मापदंड होता है।
इसलिए जरूरी है कि हर प्रकार की सामन्ती पुरुषवादी सोच के खिलाफ खड़ा हुआ जाय ! महिलाओं के बराबरी के अधिकार व सम्मान के पक्ष में खड़ा हुआ जाय ! इसे न केवल बाहर किया जाय बल्कि अपने-अपने घरों में भी किया जाय। महिलाओं पर होने वाले हर प्रकार के अपराध व जुल्म के खिलाफ आवाज उठाई जाय !
   यही नहीं ! जरूरत है कि समाज के बुनियादी ढांचे को बदलने के लिए संघर्ष किया जाय। आज समाज में हर जगह पूंजी, पैसा व बाज़ार छाया हुआ है ! इस पूंजी का मंत्र है - मुनाफा और मुनाफा ! पूंजी के इस राज में इंसान , इंसानियत का कोई मोल नहीं है ! पूंजी के इस राज में एक ओर बेरोजगारों की भारी फौज है तो दूसरी तरफ गरीबी भुखमरी के चलते वैश्यावृत्ति करती लाखों महिलाएं ! यहां मुनाफे की हवस में एक ओर अफीम,स्मेक आदि नशे का कारोबार होता है तो दूसरी ओर सेक्स, हिंसा पर बनने वाली व पोर्न फिल्मों का कारोबार ! इसका नतीजा होता है कि यह सब कुछ मिलजुलकर समाज में ऐसे इंसानों को पैदा करता है जो यौन हिंसा व हत्याओं को अंजाम देते हैं। इसलिये इस व्यवस्था के रहते ऐसे अपराधों से मुक्ति नामुमकिन है। आमूलचूल परिवर्तन के बिना मुक्ति सम्भव नहीं है। समाजवाद ही इनका हल है।


     

Thursday, 21 November 2019

क्रालोस के 7वें सम्मेलन द्वारा पारित प्रस्ताव

                         
   क्रालोस के 7वें सम्मेलन द्वारा पारित प्रस्ताव
            
     1- मोदी सरकार द्वारा पारित वेज लेवर कोड बिल 2019 के खिलाफ
   
         मेदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरूआत से ही श्रम कानूनों में तेजी से बदलाव करते हुए मजदूर वर्ग पर व्यापक हमला बोल दिया है।
    इन बदलावों के तहत 44 केन्द्रीय व 110 राज्य स्तरीय श्रम कानूनों को खत्म कर इन्हें 4 श्रम संहिताओं (लेवर कोड) में बदला जाना है। इन प्रस्तावित चार संहिताओं में वेज लेवर कोड के अलावा तीन संहिताएं-व्यावसायिक संरक्षा एवं कार्य परिस्थितियों से संबंधित संहिता, औद्योगिक संबंध से संबंधित संहिता तथा सामाजिक सुरक्षा एवं सामाजिक कल्याण से संम्बधित संहिता है।
       वेज लेवर कोड बिल 2019 को लोक सभा व राज्य सभा से पास कराके सरकार ने राष्ट्रपति की मंजूरी भी ले ली है। इस बिल में मजदूरी भुगतान अधिनियम 1936, न्यूनतम मजदूरी कानून 1948, बोनस भुगतान अधिनियम 1965 तथा समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 को समाहित कर दिया गया है। इस बिल में पूर्व के सेक्टर के आधार पर निर्धारित न्यूनतम मजदूरी के प्रावधान को हटाकर केवल कुशलता और भू-स्थिति के आधार पर न्यूनतम वेतन निर्धारित किया जाएगा। रेलवे, खनन, तेल कुओं के लिए केन्द्र सरकार व अन्य क्षेत्रों के लिए राज्य सरकारें मजदूरी तय करेंगी। इसके अतिरिक्त केन्द्र सरकार केन्द्रीय स्तर पर न्यूनतम मजदूरी घोषित करेगी। 
     नये कानून के तहत सरकार केन्द्रीय सलाहकार बोर्ड व राज्य सलाहकार बोर्ड गठित करेगी। जिनमें मालिकों व मजदूरों /कर्मचारियों के समान संख्या में प्रतिनिधि तथा कुछ स्वतंत्र व्यक्ति व राज्यों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। इस बिल के पास होने के बाद सरकार अप्रेंटिस करने वालों को पहले ही मज़दूर की श्रेणी से बाहर कर चुकी है अब राष्ट्रीय स्तर पर 178 रूपये न्यूनतम मजदूरी (फ्लोर वेज) घोषित करके मजदूर विरोधी परिणाम दिखाने शुरू कर दिये है।
    वर्तमान मोदी सरकार ने पूंजीपति वर्ग के 100 दिन वाले एक्शन प्लान पर आगे बढ़ते हुए अपनी ही संसदीय समिति के प्रस्तावों को भी दरकिनार करते हुए वेज लेवर कोड बिल पास कर दिया। लोक सभा व राज्य सभा से इस बिल का पास हो जाना संसद में बैठी राजनीतिक पार्टियों के घोर पूंजीवादी चरित्र को दिखाता है।
      अपने पिछले कार्याकाल में मोदी सरकार नीम व एफ टी ई सरीखे प्राबधान लागू कर पूंजीपति को भारी मात्रा में ट्रेनी मज़दूरों के रूप में कुशल श्रमिकों की भर्ती की छूट दे चुकी है। स्थायी रोजगार पर हमला बोलना शुरू किया जा चुका है। भविष्य में जिन 3 अन्य कोड बिलों को पारित किया प्रस्तावित है इनके तहत ट्रेड यूनियन गठित करना कठिन बनाना, मालिकों को 300 मज़दूरों तक के उद्यमों मैं छटनी की खुली छूट , हड़ताल हेतु पूर्व नोटिस की समय सीमा बढ़ाने व गैरकानूनी हड़ताल पर भारी जुर्माने व जेल सरीखे प्रावधान लागू किये जाने हैं। इसके साथ ही लेबर इंस्पेक्टरों की भूमिका को कमजोर किया जा रहा है।
    देश के मजदूर वर्ग ने अपने संघर्षों व अकूत कुर्बानियों से एक समय में ढेरों अधिकार हासिल किये और इन्हीं संघर्षों के दम पर ही सरकारों को मजदूर अधिकारों की सुरक्षा हेतु कानून बनाने को मजबूर होना पड़ा। आज जब मजदूर आन्दोलन काफी कमजोर है और मजदूर वर्ग का बड़ा हिस्सा पूंजीवादी/सुधारवादी पार्टियों के पीछे लामबंद है। तो ऐसे में पूंजीपति वर्ग की सरकारें एक-एक करके मजदूर विरोधी फैसले ले रही हैं तथा श्रम कानूनों को पूंजीपति वर्ग के हित में बदल रही हैं। आज जब पूंजीवादी व्यवस्था चौतरफा संकटों का शिकार है, देश में फासीवादी शक्तियां सत्ता के शीर्ष पर बैठी हैं। ऐसे में वे संकट का सारा बोझ मजदूरों/मेहनतकशों पर डाल रही हैं।
    मजदूर आन्दोलन की कमजोरी और इसकी ताकत के बिखरे होने का फायदा उठाकर शासक मजदूर अधिकारों को रौंद रहे हैं और तेजी से मजदूर विरोधी बिल पास कर रहे हैं। राज्य व केन्द्र स्तर के सलाहकार बोर्ड बनाकर मजदूरों की समझौते की क्षमता को कमजोर करने का षडयंत्र किया जा रहा है। इन बोर्डो में पूंजीपति वर्ग व उसके चाटुकारों और फासीवादियों को बैठाकर मजदूरों/कर्मचारियों को डराने धमकाने की संभावना ज्यादा है।
    लेकिन इतिहास गवाह है कि दुनिया भर की व्यापक मजदूर आबादी कभी भी इन बुर्जुआ कानूनों की मोहताज नहीं रही है। मजदूर वर्ग जब अपनी पूरी ताकत व एकजुटता के साथ मैदान में आएगा तो इन पूंजीवादी फासीवादी शासकों को पीछे हटने पर मजबूर करेगा और अपने हित में बने कानूनों व जनवादी अधिकारों की रक्षा भी करेगा और उनका विस्तार भी करेगा।
    क्रालोस का यह सातवां सम्मेलन मोदी सरकार द्वारा श्रम कानूनों में किये जा रहे मजदूर विरोधी बदलावों तथा वेज लेवर कोड बिल 2019 का पुरजोर विरोध करता है। श्रम अधिकारों की हिफाजत के लिये  देशभर में होने वाले मजदूर/कर्मचारी संघर्षों का समर्थन करता है तथा मजदूर वर्ग के चलने वाले व्यापक संघर्षों में कंधे से कंधा मिलाकर चलने का संकल्प व्यक्त करता है।


      2-- दमनकारी कानूनों व इनमें संशोधन के विरोध में

 
     मोदी सरकार द्वारा दूसरी बार सत्ता ग्रहण के 100 दिन के भीतर दमनकारी गैर कानूनी गतिविधिययां रोकथाम कानून(यू.ए.पी.ए.) को और ज्यादा मारक बनाने के लिए जुलाई 2019 में संशोधित किया गया। अभी तक इसके तहत किसी संगठन को आतंकी घोषित किया जाता था अब नए संशोधन के पश्चात किसी व्यक्ति को ही आतंकी घोषित किया जा सकता है। पहले इसकी जांच पुलिस अधिकारी करते थे। अब जांच राष्ट्रीय जांच एजेन्सी(एन.आई.ए.) कर सकती है। इसमें आरोपित व्यक्ति की संपत्ति की जब्ती का प्रावधान किया गया है। जांच प्रक्रिया के लिए एन.आई.ए. के इंस्पैक्टर स्तर के अधिकारी को सक्षम बनाया गया है। संपत्ति जब्ती को पुरानी प्रक्रिया को सरल कर एन.आई.ए. की डी.जी.पी./ए.सी.पी. की अनुमति की व्यवस्था की गई है।
      अब यह व्यवस्था की गई है इसी के साथ राष्ट्रीय जांच एजेंसी कानून में संशोधन कर उसे और मारक बनाया जा रहा है डी एन ए तकनीक(उपयोग एवं अनुपयोग) नियंत्रण बिल के जरिये व्यापक डी एन ए एकत्र करने की साजिश रची जा रही है जो लोगों के निजता के अधिकार का खुला उल्लंघन है जहां एक ओर सरकार दमनकारी कानूनों को और मारक बना रही है वहीं जनवादी हकों से जुड़े कानूनों मसलन सूचना अधिकार कानून, मानव अधिकारों की सुरक्षा कानून में फेरबदल कर इन्हें कमजोर किया जा रहा है।
     दमनकारी कानूनों का काला इतिहास रहा है। जनता के जनवादी अधिकारों को स्वर देने वाले संगठन इसके शिकार बनते रहे हैं। कांग्रेस सरकार के दौर में  आतंकवाद के नाम पर खतरनाक कुख्यात टाडा ( आतंकवाद व विध्वंसात्मक गतिविधि निरोधात्मक कानून )  बना जबकि बाजपेयी की भाजपा सरकार ने( एन डी ए) आतंकवाद निरोधक कानून(पोटा) बनाया था इनकी मार से भारी संख्या में निर्दोष लोग प्रताडि़त रहे। इन कानूनों को बाद में रद्द किया गया मगर यूपीए सरकार ने इनके कई खतरनाक प्रावधानों को बाद में पुराने काले कानून यू.ए.पी.ए. में संशोधित कर शामिल कर दिए।
       अब मोदी सरकार इसे और ज्यादा संहारक बनाने में सक्रीय हुई है और इसने दमनकारी संशोधन पास कर दिये हैं। पूंजीवादी न्याय व्यवस्था दोषारोपण और दंड के लिए निश्चित प्रक्रिया, बचाव का अवसर, साक्ष्य-प्रमाण की अनिवार्यता की बात करती है। किंतु दमनकारी कानून इस धारणा को दर किनार करते हैं खत्म करते हैं। यहां न्याय प्रक्रिया की जगह घेरेबंदी कर शिकार करने के चलते आरोपी के बचाव के अवसर समाप्त कर दिए जाते हैं। विरोधी को केवल शक के आधार पर ही गिरफ्तार कर अपराधी साबित करने के साथ उसी पर खुद को निर्दोष साबित करने जिम्मेदारी डाल दी जाती है।  मनोबल गिर जाने के नाम पर सुरक्षा अमले को विशेषाधिकार दिये जाते हैं। आरोपी को अधिकारविहीनता में डाल दिया जाता है।
       निकट अतीत में आतंकवाद के आरोप से प्रताडि़त मुस्लिमों को तथा 'टाडा' में फंसाये गए हज़ारों  लोगों को वर्षों की यातना के बाद दोषमुक्ति मिली, यह कानूनों के घोर दुरूपयोग को बताता है। दूसरी ओर आतंक, हत्या में लिप्त हिंदूवादी संगठनों के मुकदमे वापस करने की सरकारों की कार्यवाही कानन के पक्षपाती प्रयोग को उजागर करता है।
         शासक वर्ग सामाजिक समस्याओं को हल करने में अक्षम है। जनता के असंतोष की आवाज का दमन करने के लिए वह काले कानूनों का सहारा  लेता है। वर्तमान में दमनकारी कानूनों को और कठोर बनाया जाना फासीवाद की ओर उन्मुख सरकार के कदमों का ही एक हिस्सा है। इसके निशाने पर हर वह व्यक्ति है जो फासीवादी परियोजना का विरोधी है। गहराते आर्थिक संकट से त्रस्त जनता के आक्रोश से शासक वर्ग फासीवादी ताकतों के सहारे निपटना चाहता है।
क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन का यह सम्मेलन दमनकारी कानूनों का विरोध करता है।  यू.ए.पी.ए. में संशोधन रदद करने की मांग करता है। जनता से आह्वान करता है कि अपने जनवादी अधिकारों के लिए संगठित हों।   
 3--  अंधराष्ट्रवादी युद्धोन्माद के विरूद्ध प्रस्ताव
   
          देश का शासक वर्ग अंधराष्ट्रवादी युद्धोन्माद फैलाकर करोड़ों लोगों को उनके बुनियादी हितों के विपरीत खड़ा कर देने की जनविरोधी परियोजना को परवान चढ़ाने में सक्रीय है। पुलवामा आतंकी वारदात हो, सेना की जवाबी कार्यवाही जिसे सर्जीकल स्ट्राइक कहा गया, का प्रचारात्मक कोलाहल हों या फिर सरहदी छिटपुट घटनाओं से लेकर विदेशी मंचों में आतंकवाद के सवाल पर चर्चा हो, या सामरिक साजों-सामान की खरीदारी हो ! हर मसले को युद्ध की सरगर्मी की तरह फैलाना, उन्मादी प्रचार का रूप देकर जनता के मनो-मस्तिष्क में हावी करना शासकों की सचेत कार्यवाही रही है। घर में घुसकर मारने, बदला लेने, सबक सिखाने, परमाणु हमले की पहल न करने की शर्त की परवाह न करने, पाक अधिकृत कश्मीर हथियाने जैसी उत्तेजक बयानबाजियां उछाली जाती रही हैं। सवाल उठाने वालों को देशद्रोही घोषित करने, दुश्मन का पक्षधर बताने की बयानबाजियां भी उछाली जाती रही हैं। बयान सत्ता शीर्ष से प्रचारित होते ही संचार माध्यमों, अखबारों की सनसनी वाले शीर्षकों के साथ सरगर्म बहसें, टी.वी चैनलों की गलाफाड़ बहसें इसे गुंजायमान करती रही हैं। सत्ताधारी पार्टी कारकूनों- छुटभैयों की उत्तेजक, उकसावे की भाषा इसे ज्यादा मारक बनाती रही है।
         अंधराष्ट्रवादी युद्धोन्माद के माहौल को खड़ा कर मोदी व भाजपा दूसरी बार सत्ता पर पहुंच गए । अब दूसरे कार्यकाल में मोदी सरकार इस युद्धोन्मादी माहौल को स्थायी रूप से लगातार कायम करने के लिए प्रयासरत रही है इस माहौल की आड़ में सरकार के लिए जनविरोधी कदमों को उठाना आसान हो जाता रहा है। कश्मीर में धारा 370 व अनु 35 ए को निष्प्रभावी बनाने असम में एन आर सी लागू करने से लेकर श्रम कानूनों में मज़दूर विरोधी बदलाव, सार्वजनिक संस्थानों के निजीकरण सरीखे कई कदम इस माहौल की आड़ में सरकार उठा चुकी है।
       मोदी सरकार द्वारा कायम किये जा रहे युद्धोन्माद के निशाने पर पाकिस्तान है। सरकार पाकिस्तान को सबसे बड़ा शत्रु प्रचारित करती रही है। कहने की बात नही है कि पाकिस्तान की सरकार  ही इसी तरह का युद्धोन्माद अपने देश में भारत के खिलाफ भड़काती रही है। दोनों देशों की सरकारें इस युद्धोन्मादी माहौल को कायम कर जनता का ध्यान बुनियादी मुद्दों से हटाने में जुटी रही हैं इस माहौल को लगातार कायम रखने के लिए सीमा पर कुछ सैनिक की निरन्तर बलि चढ़ाने से भी इन्हें कोई गुरेज नहीं है। इस माहौल की आड़ में सरकारें 'मज़बूत सरकार' 'मज़बूत राष्ट्र' सेना के मनोबल को न गिरने देने व निरन्तर सैन्यीकरण को जायज ठहराती रही है। इसी की आड़ में सरकारें हर विरोधी स्वर को राष्ट्र विरोधी करार देती रही है। खाने की बात नहीं है कि अंधराष्ट्रवाद व युद्धोन्माद संघ भाजपा के फ़ासीवादी अभियान के दो महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।
        भारत व पाकिस्तान के मज़दूर मेहनतकशों के हित एक से हैं दोनों देशों के बीच किसी भी तरह के युद्ध या युद्ध के माहौल का खामियाजा दोनों देशों  की मेहनतकश जनता को उठाना पड़ता है। ऐसे में इस युद्धोन्माद का विरोध जरूरी है।
       क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन का यह सम्मेलन अंधराष्ट्रवादी युद्धोन्माद को बंद करने की मांग करता है। व्यापक मेहनतकश आबादी का आह्वान करता है कि वे अपने जनवादी अधिकारों की रक्षा के लिए सजग हों और संगठित हों।

        4-  फासीवादी हमलों के विरूद्ध प्रस्ताव
   
        आज पूरी दुनिया विश्व आर्थिक संकट  की चपेट में है। इस कारण दुनिया के कारपोरेट पूंजीपति व बड़े पूंजीपति दक्षिण पंथी और फांसीवादी पार्टियों को पहले से ही कहीं ज्यादा समर्थन-संसाधन दे रहे हैं ताकि ये प्रतिगामी ताकतें इस आर्थिक संकट का पूरा बोझ मेहनतकश जनता पर डाल दें और इससे उत्पन्न आक्रोश को आतंकी तानाशाही पूर्ण कदमों से कुचल दें।
    भारत में भी हिन्दु  फासीवादी संगठन आर.एस.एस. के आनुषांगिक संगठन भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन सरकार में है। आर.एस.एस. जिस हिन्दुत्व की बात करता है। वह पुरुष प्रधानता, सामन्ती मूल्यों व सवर्ण वर्चस्व से लैस है। जो अल्पसंख्यकों दलितों महिलाओं को दोयम दर्जे की स्थिति में धकेल देना चाहता है। इस सरकार का नया शासन काल कहीं ज्यादा खतरनाक तेवरों के साथ आम जनता मुख्यतः अल्पसंख्यकों दलित समुदायों व जनवादी लोगों पर हमला कर रहा है। खाने -पहनने से लेकर पढ़ने-लिखने तक पर भांति-भांति की पाबंदिया लगाई जा रही हैं। लोग किसके साथ रहें क्या सोचें जैसी नितान्त निजी चीजों को भी डिक्टेट करने के प्रयास हो रहे है।
         बीते 6 वर्षों के इंजे शासन काल में भीड़ हिंसा के जरिये अल्पसंख्यको ओर हमले बोलना, प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की हत्या , विरोध की हर आवाज को देशद्रोही करार देना अधिकाधिक बढ़ता गया है संघी मंडली आज राज्य की संस्थाओं से लेकर न्यायालयों तक में घुसपैठ कर चुकी है । न्यायालय से लेकर सेनाध्यक्ष तक संघी जुबान बोल रहे हैं। एक के बाद एक काले कानूनों को और दमनकारी बनाया जा रहा है। तो नाममात्र के जनवादी अधिकारों को भी  छीना जा रहा है।
        अयोध्या में राम मंदिर के सम्बन्धन में अदालती फैसला हो या कश्मीर में धारा 370 निष्प्रभावी बनाने का सरकारी कदम ये सब संघ भाजपा के कुत्सित एजेंडे को आगे बढ़ाने वाले कदम हैं। कॉरपोरेट पूंजीपति वर्ग के सहयोग समर्थन से संघ भाजपा तेज़ी से अपने फ़ासीवादी अभियान पर आगे बढ़ रही हैं। एक ओर वह मज़दूरों मेहनतकशों पर निर्मम हमले बोल रही हैं। पूंजी को मनमानी लूट की खुली छूट दे रहे है यो दूसरी ओर नकली दुश्मन , नकली मुद्दे पैदा कर लोगों को गुमराह कर रही है। अपने राजनीतिक विरोधियों को किनारे लगा रही है  साम्प्रदायिक उन्माद, राष्ट्रवादी उन्ममद खड़ा कर खुद को सबसे बड़ा देश भक्त करार दे रही है। शिक्षा संस्कृति से लेकर खान पान तक सबको वह फ़ासीवादी रंग में रही है।
     फासिवाद एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग की खुली नग्न आतंकी तानाशाही होता है। संघ भाजपा भारत को तेज़ी से फ़ासीवाद की ओर धकेल रही है इसके निशाने पर मज़दूर मेहनतकश, अल्पसंख्यक, दलित, छात्र नौजवान महिलाओं समेत व्यापक जनता है। इस फासीवादी राक्षश का मुकाबला भ्रष्ट पूंजीवादी दल व उनका चुनावी जोड़ तय लर सकता। क्रांतिकारी, प्रगतिशील ताकतों के नेतृत्व में बना व्यपक मोर्चा ही फासीवाद को चुनौती दे सकता है।
      क्रालोस का  यह सम्मेलन फासीवादी ताकतों द्वारा मेहनतकश जनता के विभिन्न हिस्सों मसलन अल्पसंख्यकों, दलितों, महिलाओं, जनवादी संस्थाओं व लोगों इत्यादि पर होने वाले हमलों का पुरजोर विरोध करता है। यह सम्मेलन अपने सदस्यों, शुभेच्छुओं का आह्वान करता है कि वे फासीवादी ताकतों द्वारा मेहनतकश जनता पर होने वाले हमलों का विरोध करने के साथ साथ जनता के बीच जाकर इनकी घृणा व खौफ फैलाने वाली राजनीति का भंडाफोड़ करे एवं फासीवादी आंदोलन के बरक्स मेहनतकश जनता को वर्गीय चेतना पर आधारित जनवादी आन्दोलन को खड़ा करने के लिए अपना योगदान दें।
            
                   5-   जम्मू-कश्मीर के सम्बन्ध में
            
    जम्मू कश्मीर के सम्बन्ध में 5 अगस्त को राष्ट्रपति के माध्यम से गैजेट नोटिफिकेशन जारी कर मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 व धारा 35 ए को निष्प्रभावी कर दिया। तत्काल बाद ही संसद में जम्मूकश्मीर को दो केंद्रशासित प्रदेशों में बांटने का बिल भी पास करवा लिया।
            जम्मू कश्मीर के सम्बन्ध में यह कदम उठाने से कुछ वक्त पहले आतंकवादी घटना होने के बहाने की आड़ में कई हज़ार अर्धसैनिक बलों की तैनाती कर जम्मूकश्मीर की अवाम को नज़रबन्द कर दिया गया तथा कश्मीर को एक प्रकार के यातना कैम्प में बदल दिया गया। फिर 5 अगस्त को धारा 370 को खत्म किये जाने का राष्ट्रपति का आदेश जारी हो गया।
           इस प्रकार से जम्मू कश्मीर को भारत में छल बल से विलय करने का जो कदम आज़ादी के बाद नेहरू की कांग्रेस सरकार द्वारा उठाया गया था वह मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में अपने मुकाम पर पहुँच गया।
            यह ऐतिहासिक तथ्य है कि भारत व जम्मूकश्मीर के शासकों के बीच विलय के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण समझौता हुआ था जिसके मुताबिक जम्मूकश्मीर का अपना संविधान, झंडा व प्रधानमंत्री होना था  जबकि भारत को केवल 4 मसलों रक्षा, मुद्रा, संचार व विदेश नीति को तय करने का अधिकार था। जम्मूकश्मीर के सम्बन्ध में अंतिम फैसला जनमतसंग्रह से ही तय होना था। अनु 370 इसी की अभिव्यक्ति थी। अगस्त 1953 के बाद ही नेहरू सरकार द्वारा भारत विरोधी षड्यंत्र रचने के फर्जी मुकदमे लगाकर जम्मूकश्मीर के शेखब्दुलाह समेत लगभग दो दर्जन लोगों को गिरफ्तार कर जेल डाल दिया गया तथा जम्मूकश्मीर के भारत में छल बल से विलय की प्रक्रिया शुरू हो गई। बाद के काल में यानी पिछले 30-40 सालों से जम्मूकश्मीर की अवाम फौजी संगीनों के साये में जी रही है। इस प्रकार देखा जाय तो साफ है कि अनु 370 को व्यवहार में पहले ही कांग्रेस सरकार के दौर में खत्म किया जा चुका था और फिर मोदी सरकार ने इस सम्बन्ध में जो भ्रम की स्थिति थी अनु 370 को खत्म करके उसे भी पूरी तरह खत्म कर दिया। मोदी सरकार ने इसके लिए संवैधानिक प्रक्रिया की भी खुलेआम धज्जियां उड़ाई। इसने राज्यपाल की राज्य सरकार के रूप में व्याख्या कर मनमाने व फासीवादी तौर तरीकों से 370 को खत्म कर दिया।
            जम्मूकश्मीर की अवाम शुरुआत से ही स्थिति को समझती है वह भारत सरकार द्वारा उठाये इन कदमों को शुरुआत से ही अपने आत्मनिर्यण के अधिकार पर हमले के रूप में देखती है इन कदमों को छल बल से भारत में विलय के रूप में देखती है। वे शुरुआत से ही इसका विरोध करते रहे है।
           अब पिछले 3 माह से जम्मूकश्मीर की अवाम कर्फ्यू की स्थिति में अपने अपने घरों में कैद है वह भयानक अलगाव, असुरक्षा व यंत्रणा की स्थिति में है।
           यह सम्मेलन मोदी सरकार द्वारा उठाये गए इन फासीवादी कदमों का विरोध करता है। साथ ही मांग करता है कि भारत सरकार जम्मूकश्मीर से कर्फ्यू को तत्काल रद्द करने के साथ साथ जम्मूकश्मीर की अवाम के आत्मनिर्णय के अधिकार का सम्मान करते हुए अगस्त 1953 से पहले की स्थिति को बहाल कर वहां जनमत संग्रह के अपने वायदे को व्यवहार में लागू करे।

         6- देश में बढ़ती भीड़ हिंसा के सम्बन्ध में

        देश में पिछले कुछ सालों से कथित भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा व हत्याओं की संख्या में काफी बढ़ोत्तरी हुई है। कुछ गिनी चुनी घटनाओं को यदि छोड़ दिया जाए तो अधिकांश घटनाएं गौरक्षा के नाम पर हुई हैं। इन कथित गौरक्षकों का निशाना आम तौर पर मेहनतकश मुस्लिम समुदाय के लोग बने हैं  जबकि दलित समुदाय के  मेहनतकश लोग भी इनके निशाने पर रहे हैं।
        2015 में गाज़ियाबाद के दादरी में गौमांस का आरोप लगाकर अख़लाक़ की हत्या कर दी गई थी उसके बाद से अब तक 150 घटनाओं का अनुमान है जिनमें 70 से ज्यादा हत्याएं हो चुकी हैं। 300 से ज्यादा को घायल किये जाने का अनुमान है। इसमें उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, झारखंड, गुजरात में ज्यादा घटनाएं हुई हैं।
       इन बढ़ती घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट अपनी चिंता जता कर इसके खिलाफ कड़े कानून बनाये जाने को कह चुका है लेकिन इसके बावजूद मोदी सरकार का रुख इन घटनाओं को बढ़ावा देने वाला हैं। मोदी सरकार के मंत्री फूलमालाओं से ऐसी हत्या के आरोपियों का स्वागत करते हैं।
        दरअसल देश में जैसे जैसे फासीवादी आंदोलन बढ़ता गया है और यह सत्ता पर पहुंचा है। इन कथित भीड़ हत्याओं में बढ़ोत्तरी होती गयी है। इन बीते 4 सालों में साल दर साल ऐसी घटनाओं की संख्या निरंतर बढ़ती गई है। इन घटनाओं को भीड़ हत्या कहना मामले की गंभीरता पर पर्दा डालना है। वास्तव में ये कथित भीड़ हिंसा  फासीवादी दस्तों द्वारा परोक्ष या प्रत्यक्ष ढंग से की जा रही हैं। यह कथित भीड़ हिंसा संघ परिवार के लिए अपने फासीवादी आंदोलन को आगे बढ़ाने का एक औजार है। इनके हिंदुत्व की फासीवादी विचारधारा में मुस्लिमों व दलितों के प्रति घृणा व नफरत के सिवाय और कुछ नहीं है। इसीलिए कोई हैरत नहीं कि इन कथित भीड़ हिंसा के शिकार मेहनतकश मुस्लिम व दलित हों। भीड़ हिंसा के नाम पर संघी दस्ते आरोपित करने, न्याय करने की भूमिका अपने हाथ में लेने लगे हैं फ़ासीवाद की ओर बढ़ने के ये शुरुवाती संकेत हैं। भाजपा व संघ एकाधिकारी पूंजी के हित में देश में जनवादी सोच तथा संवैधानिक-जनवादी अधिकारों को व्यवहार में निष्प्रभावी या कमजोर कर रही है।
     क्रालोस का सातवां सम्मेलन इन कथित भीड़ हिंसा के नाम पर हिन्दू फासीवादी दस्तों द्वारा की जा रही हिंसा व हत्याओं की निंदा व भर्त्सना करता है साथ ही इसके खिलाफ व्यापक मेहनतकश जनता को एकजुट करने व संघर्ष करने का संकल्प लेता है।

    7--  राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर ( एन.आर.सी. ) के सम्बन्ध में
     असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर बनाने के तहत 19 लाख लोगों की नागरिकता पर हमला बोला जा चुका है। 19 लाख लोगों को देशविहीन, राष्ट्रविहीन बनाया जा चुका है। हमले की शिकार आबादी का बहुलांश मेहनतकश हैं।
      एन.आर.सी. की पहली प्रक्रिया भारत में 1951 की जनगणना के साथ हुई थी। इसके बाद न्यायालय के हस्तक्षेप से केंद्र की सत्ता में संघ परिवार के पहुंच जाने के बाद एन.आर.सी. की प्रक्रिया पुन: शुरू कर दी गई। फासीवादी संघी संगठनों ने लम्बे समय से देश भर में ध्रुवीकरण के अपने घृणित एजेंडे के तहत असम में अलग-अलग वक़्त पर अलग-अलग जगहों से पहुंची भारी  आबादी में से मुस्लिम आबादी को बांग्लादेशी घुसपैठियों के रूप में दुष्प्रचार का जरिया बनाया। एन.आर.सी. की एस प्रक्रिया के लिए असम में 24 मार्च 1971 से पहले बसे लोगों को ही भारत का नागरिक माना जाना था वह भी उसी स्थिति में जब कि व्यक्ति खुद को दस्तावेजों के आधार पर नागरिक साबित कर सके।
       असम में एन.आर.सी. की इस प्रक्रिया के तहत पहले 40 लाख एन आर सी लिस्ट में आने से वंचित हो गए। बाद में एन.आर.सी. की इसी प्रक्रिया के तहत यह संख्या 40 लाख से घटकर 19 लाख पर आ गयी। असम में 19 लाख की यह आबादी जिसमें हिन्दू मुस्लिम दोनों ही है नागरिकता के लिस्ट से वंचित होने के बाद भयानक अलगाव, असुरक्षा एवं अवसाद में हैं। इसी तनाव व दबाव में कुछ लोगों की मौतें भी हुई हैं। भाजपा जिसे इंसानियत, साम्प्रदायिक सौहार्द व आम अवाम की एकजुटता व दुख दर्द से घोर नफ़रत है। ये अब 19 लाख की इस नागरिकताविहीन आबादी में लगभग 12 लाख हिन्दू आबादी होने से फिलहाल दिखावे के लिए इस एन.आर.सी. प्रक्रिया का विरोध कर रहे हैं। जबकि दूसरी ओर पूरे देश में एन.आर.सी. लागू करने की बात कह रहे हैं।
         इस प्रकार नागरिकता से वंचित होने वाले इन लाखों लोगों  के लिए डिटेंसन कैम्प (यातना कैम्प) बनाये जा रहे हैं। असम में अभी 6 कैम्प निर्माणाधीन हैं। असम में फिलहाल 3000 लोग ऐसे कैम्पों में रह रहे हैं जिनमें 29 लोगों की मृत्यु ही चुकी है। मोदी सरकार की चाहत है कि देश के हर जिले में ऐसे डिटेंसन कैम्प बनाये जाएं।
      दूसरी ओर फासीवादी मोदी सरकार  नागरिकता कानून को भी साम्प्रदायिक आधार पर संशोधित करने के लिए प्रयासरत है। जिसके तहत पड़ोसी मुल्कों की गैर मुस्लिम आबादी के लिए भारत की नागरिकता हासिल करना आसान बनाया जा रहा है।
     देश में आज़ादी से पहले बड़ी तादाद में गरीब मज़दूर आबादी का भारी मात्रा में विस्थापन हुआ यह जबरन भी हुआ था। आज़ादी के बाद भी करोड़ों लोगों का विस्थापन भांति भांति की परियोजनाओं तथा रोज़गार की तलाश में हुआ। इनमें से अधिकांश के पास नागरिकता साबित करने हेतु दस्तावेज होने की संभावना बहुत कम है। ऐसी स्थिति में एन.आर.सी. की प्रक्रिया बेमानी है।
    दूसरा आज वैश्वीकरण के जमाने में देश के हुक्मरान विदेशी पूंजी व पूंजी के मालिकों का लाल कालीन बिछाकर स्वागत कर रहे हैं। पूंजी को कहीं भी घुसपैठ व विचरण करने की स्वतंत्रता है। इसकी राह की सारी रुकावटें खत्म की जा रही हैं। दूसरी ओर मज़दूर मेहनतकश नागरिकों जो ज़िंदा रह सकने भर के लिए रोजगार की तलाश में एक देश से दूसरे देश अवैध या वैध तरीके से प्रवेश करते हैं उन्हें "घुसपैठिये" या "दीमक" कहा जाता है।
        संघ भाजपा के इस अभियान के निशाने पर मुस्लिम आबादी है। वे पूरे देश में बाहर से आयी मुस्लिम आबादी को घुसपैठिये करार देकर समूचे मुस्लिम समुदाय को और आतंकित और दोयम दर्जे की स्थिति में  धकेलने पर उतारू है।
        यह सम्मेलन इस घृणित फासीवादी सोच तथा इन कदमों का विरोध करता है साथ ही एन.आर.सी की इस प्रक्रिया को रद्द किए जाने तथा देश में रह रही गरीब मेहनतकश आबादी को देश का नागरिक माने जाने का पक्षधर है।

          8-- शहीदों को श्रद्धांजलि
          हमारे पिछले सम्मेलन से अब तक देश दुनिया में चल रहे जन पक्षधर संघर्षों में भारी संख्या में लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी है। इन लोगों में अफ्रीका, पश्चिम एशिया व लातिन अमेरिका में साम्राज्यवादी हमले व घुसपैठ के खिलाफ लड़ने वाले जनपक्षधर लोगों से लेकर विभिन्न देशों में पूंजीवादी शासकों के द्वारा थोपे गए कटौती कार्यक्रमों के विरोध में खड़े हुए लोग तक सब शामिल हैं। इनमें वर्षों पुरानी तानाशाहियों को धूल चटाने वाले जन संघर्षों में कुर्बान हुए लोग भी शामिल हैं। अपनी महंगी होती शिक्षा के खिलाफ संघर्ष में जान गंवाने वाले छात्र नौजवान भी शामिल हैं इसमें जनवादी अधिकारों की की रक्षा करने में जुटे पत्रकार-बुद्धिजीवी भी शामिल हैं जिनकी शासक गिरोह ने निर्मम हत्या करवा दी तो इनमें सेना-पुलिस की गोलियों का शिकार बनते संघर्षरत मजदूर किसान भी शामिल है। इसी के साथ दुनिया भर में पूंजीवाद साम्राज्यवाद का नाश कर समाजवाद की स्थापना का सपना संजोए ढेरों क्रांतिकारी भी इन संघर्षों में शहीद हो गए ।
         इसके अलावा पूंजीवादी व्यवस्था ने इन वर्षों में भी देश दुनिया के कल कारखानों-खेतों में, साम्राज्यवादी हमलों में,  बेकारी भूखमरी से लेकर सामान्य बीमारियों से आम जनता का कत्लेआम जारी रखा है
        क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन का सांतवा सम्मेलन इन सभी लोगों को याद करता है तथा शहीदों के सपनों को पूरा करने के लिए संघर्ष तेज करने का संकल्प लेता है।
   9 -बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद में अदालती निर्णय के बारे में
         सर्वोच्च न्यायालय ने वर्षों पुराने इस विवाद में राम मंदिर के पक्ष में निर्णय देकर दिखला दिया कि भारत की शीर्ष अदालत भी किस कदर सत्ताधारी फासीवादी गिरोह के सम्मुख आत्मसमर्पण कर चुकी है। अदालत ने भले ही इसे भूमि विवाद  मानने की बात कही पर अंत में जो फैसला सुनाया गया वह कानून पर कम 'आस्था' 'जनमत' से अधिक प्रेरित लगा।
         दरअसल यह फैसला कोई न्यायिक फैसला ना होकर विशुद्ध राजनीति फैसला है। जिसे सत्ताधारी फासीवादी गिरोह के अनुरूप लिया गया है इनके मनोकूल काम को न्यायिक जामा पहनाने का काम सर्वोच्च अदालत ने किया है। अदालत ने हिन्दू फासीवादियों के कुकृत्यों को कानूनी वैधता प्रदान करने का काम शुरू कर दिया है। कश्मीर में धारा 370 हटाने से लेकर इस मसले पर अदालती रुख इस बात को साबित कर देता है।
         इस फैसले के बाद शीर्ष अदालत से इस बात की उम्मीद करना बेमानी हो चुका है कि वह फ़ासीवादियों के गैरकानूनी कृत्यों पर लगाम लगाएगी। इसके निहितार्थ न केवल मुस्लिम आबादी के लिए खतरनाक हैं जो इस फैसले से खुद को छला हुआ महसूस करेगी बल्कि इसके निहितार्थ देश की व्यापक मज़दूर मेहनतकश अवाम के लिए भी खतरनाक हैं जिसे अब फासीवादी गिरोहों के हमलों से भी कोई अदालती सुरक्षा हासिल नहीं होगी।
तथ्य और तर्क की जगह 'जनमत' व ' आस्था' से फैसले लेने की यह परम्परा फासीवादी निजाम की ओर देश की तेज़ी से बढ़ने का एक कदम है।
       क्रालोस का सांतवा सम्मेलन अदालतों के फासिवादी नज़रिए से निर्णय देने की ओर बढ़ने का विरोध करता है तथा फासीवादी अभियान को रोकने के लिए पुरजोर संघर्ष का संकल्प लेता है।

Wednesday, 20 November 2019

क्रालोस के 7वें सम्मेलन 16-17 नव. 2019 द्वारा पारित राजनीतिक रिपोर्ट

         क्रालोस के 7वें सम्मेलन 16-17 नव. 2019 द्वारा पारित राजनीतिक रिपोर्ट
     
                       1--  राजनीतिक रिपोर्ट
                    A- 【 अंतर्राष्ट्रीय परिस्थिति 】
     2007-08 से जारी विश्व पूंजीवादी-साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था का संकट 2019 में पुनः गहराने की ओर अग्रसर है। विश्व आर्थिक मंच स्वीकार करने लगा है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के नरम पड़ने, व्यापारिक तनाव के उभरने तथा उभरती अर्थव्यवस्थाओं में वित्तीय बाजारों की अस्थिरता वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के संकट को सूचित कर रहे हैं।
संकटग्रस्त पूंजीवादी अर्थव्यवस्था -: विश्व बैंक के आकंड़ों के हिसाब से वैश्विक अर्थव्यवस्था की विकास दर  2017 में  3.1 %, 2018 में 3%, 2019 में 2.9 % के साथ क्रमशः गिरावट में है जबकि 2020 में इसकी 2.8 % तक गिरावट की आशंका है।
    विश्व बैंक की रिपोर्ट आगे बताती है कि संयुक्त राज्य अमेरिका की सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर वर्ष 2018 में 2.9%, 2019 में 2.5% रही है। यूरो क्षेत्र की विकास दर वर्ष 2018 में 1.9% तथा 2019 में 1.6% रही है। जापानी अर्थव्यवस्था लम्बे समय से ठहराव ग्रस्त रही थी। यह वर्ष 2018 में 0.8% वर्ष 2019 में 0.9% पर रेंग रही है। चीन की अर्थव्यवस्था की सकल घरेलू उत्पाद के विकास दर भी उतार पर है। यह वर्ष 2018 में 6.5 % थी तथा 2019 में 6.2 % रही। भारत की अर्थव्यवस्था 2018 में 7.3% तथा 2019 में 7.5 % रही। हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था की यह विकास दर आंकड़ों के हेर-फेर के द्वारा भी हासिल की गयी है। अब इसमें भी गिरावट का रुझान साफ दिखता है। सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं ठहराव की ओर बढ़ रही है। तुर्की, रूस, ब्राजील की अर्थव्यवस्था भी उतार पर है। वर्ष 2007-08 से शुरू आर्थिक संकट से वित्तीय संस्थानों व पूंजीपतियों को उबारने के लिए दुनिया भर की सरकारों ने अलग-अलग वक़्त पर जो धन झोंका था उसके परिणामस्वरूप सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं भारी ऋण बोझ से दबी हुई हैं। अगर वर्तमान संकट बढ़ता है तो सरकारों का आर्थिक संकट अनियंत्रित होने का खतरा बन सकता है।
     साम्राज्यवादी-पूंजीवादी अर्थव्यवस्था संकटों के भंवर में बार-बार गिरती जाती है। शासक वर्ग बीच-बीच में अर्थव्यवस्था के पटरी पर आने का जश्न मनाते हैं लेकिन थोड़े अंतराल में पुनः संकट उभरने लगता है। चीन, भारत जैसे देश विश्व अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में ताकत बताये जा रहे थे। ये देश भी इस संकट से कभी अछूते नहीं रहे थे। अब विकास दर में उतार के साथ ये  भी स्प्ष्ट तौर पर वैश्विक आर्थिक संकट की गिरफ्त में है
दक्षिणपंथी राजनीति का फैलाव  -:      विश्व भर में एक ओर पूंजीवादी उदारवादी राजनीति का प्रभाव 'उदारीकरण   निजीकरण' की जनविरोधी नीतियों के आगे बढ़ने के साथ ही कम होता गया है। दूसरी ओर पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शासकों ने दक्षिणपंथी राजनीति को सचेत तौर पर आगे बढ़ाया है। दक्षिणपंथी फासीवादी राजनीति का आज की स्थिति में विश्व के अधिकतर भागों में फैलाव हुआ है। वर्ष 2016 में संयुक्त राज्य अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प चुनाव में जीतकर सत्ता में काबिज हुआ। सत्ता में आते ही ट्रम्प ने उग्र राष्ट्रवादी नीति अपनाने की खुली घोषणा की। इसने शरणार्थियों व प्रवासियों के विरुद्ध बयानबाजी आरंभ कर दी। ट्रम्प की इन गतिविधियों से अमेरिका के भीतर नव फासीवादी तत्वों को अब और ज्यादा प्रश्रय मिलने लगा।
     यूरोप में नव फासीवादी ताकतें और आगे बढ़ी हैं। जर्मनी में ए.एफ.डी. (अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी) फासीवादी पार्टी का जर्मन चुनाव में वोट प्रतिशत तथा सीटें बढ़ी हैं। यूरोपीयन पार्लियामेंट में इसने 2014 के 7% वोट के साथ 7 सीट की जगह 2019 में 11 % वोट के साथ 96 में से 11 सीटें हासिल की हैं। फ्रांस में नेशनलिस्ट फ्रंट (अब नेशनल रैली) को यूरोपीयन संसद में 23 % मतों के साथ 21 सीट हासिल हुई हैं। इटली में लीग (लेगा नॉर्ड) का इटली के चुनाव में मत प्रतिशत बढ़ने के साथ साथ यह इटली की तीसरी बड़ी पार्टी बन गयी है। 2015 में पोलैंड में भी अति दक्षिणपंथियों को चुनाव में ज्यादा सीटें हासिल हुई। इजराइल में बेंजामिन नेतान्यहू के नेतृत्व में लिकुड पार्टी को 2019 में बहुमत नहीं मिला। कुछ समय बाद दोबारा चुनाव होने पर इनकी स्थिति कुछ और कमजोर हो गयी। किसी भी पार्टी को यहां स्प्ष्ट बहुमत नहीं मिला। जापान में शिंजो अबे चुनाव जीत कर सत्ता में आ गये। भारत में हिंदू फासीवादी पार्टी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दूसरी बार चुनाव जीतकर सत्ता में आयी है। ब्राजील में बोलसेनारो की जीत से दक्षिणपंथी सत्ता में पहुंचे हैं। यूरोपीय संघ की प्रतिनिधि  सभा में भी फासीवादी ताकतें पहुंच चुकी हैं। स्पेन में अभी चुनाव में दक्षिणपंथी पार्टी वॉक्स का वोट प्रतिशत 15 पहुंच चुका है जबकि इसकी सीटें 24 से बढ़कर 52 हो गई हैं।
    यह धुर दक्षिणपंथी प्रतिगामी राजनीति मजदूर मेहनतकश अवाम के हितों के खिलाफ है। फासीवादी तानाशाही मजदूरों के राजनीतिक संगठन शक्ति को ध्वस्त करने के लिए बदनाम रही है। ये रंगभेद, नस्ली व धार्मिक, अंधराष्ट्रवादी विचारों व नारों के द्वारा असली शोषण को छुपाने और अपने सामूहिक हितों के लिए संगठित होती मेहनतकश जनता को विभाजित करने का काम करती है। यह जनता के बीच भय व्याप्त करने, जनवादी अधिकारों की खिलाफत, सहिष्णुता, विविधता, तार्किकता, धर्मनिरपेक्षता को तिरस्कृत करने के अभियान में लगी रहती हैं। एकाधिकारी पूंजी की सहायता, समर्थन तथा इनके प्रचार माध्यमों का भरपूर सहयोग और राज्य मशीनरी का संरक्षण फासीवादी ताकतों को मिलता रहता है। शरणार्थियों का विरोध, प्रवासियों का विरोध, अंधराष्ट्रवाद इनकी खुद की शक्ति को प्रदर्शित करने के तौर तरीके हैं। यूरोप में यह यूरोपीय संघ के विरोध तक चले जाते हैं।  
   मौजूदा वक्त में दुनिया भर में जनता के संगठित संघर्ष काफी कमजोर हैं। इसलिये शासक वर्ग फासीवादी ताकतों का नपा तुला प्रयोग करेगा।

संरक्षणवादी प्रवृतियां 
     'वैश्वीकरण-उदारीकरण-बाजारीकरण' के संचालन तथा नियमन के लिए विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाएं बनाते हुए साम्राज्यवादियों द्वारा ऐसा जताया गया था जैसे कि विश्व व्यापार-विनिमय समानता के आधार पर होगा कि यह वैश्विक सहमति के नियमों के अनुरूप चलेगा लेकिन साम्राज्यवादी ताकतें वैश्विक संस्थाओं नियमों समझौतों की कतई परवाह नहीं करते हैं। मौजूदा वैश्विक आर्थिक संकट गहराने के साथ 'मुक्त बाजार अर्थवयवस्था' की वकालत करने वाले साम्राज्यवादी अपने हितों के अनुकूल तथा उभरती पूंजीवादी शक्तियों को कमजोर करने के लिए आज संरक्षणवादी रवैया अपना रही हैं। खासकर अमेरीका द्वारा 'अमेरिका पहले' की नीति अपनाने की घोषणा की गई। इसके द्वारा इस्पात, एलुमिनियम आदि के क्षेत्र में संरक्षणवादी कदमों का एलान किया गया। चीन, भारत, मेक्सिको के निर्यात पर रोक के लिए दंडात्मक तटकरों को लागू किया गया। इरान, वेनेजुएला को सबक सिखाने हेतु तेल निर्यात पर पाबंदी लगाने जैसे कदम उठाए गये। 'वैश्विकरण-उदारीकरण' के अगुवा प्रस्तावकों  में अमेरिकी साम्राज्यवादी  तथा ब्रिटेन के साम्राज्यवादी शासक थे। इन्हें साम्राज्यवादी वर्चस्वकारी हितों वाले विश्व आर्थिक मंच में वरीयता मिलती रही। अमेरीकी शासकों ने विश्व व्यापार संगठन के साथ 'एपेक' व्यापार गुट बनाकर अपने हितों को संरक्षित किया। विश्व आर्थिक संकट के गहन होने के साथ संरक्षणवादी प्रवृत्ति आगे बढ़ती जा रही है। यह पूंजीवादी साम्राज्यवादी दुनिया के गहराते अंतरविरोधों को बताती है।
साम्राज्यवादियों के बीच बढ़ते अंतर्विरोध:    दुनिया में अमेरिकी साम्राज्यवादी अपने वर्चस्व के लिए लगातार प्रयासरत   हैं। विशेष तौर पर 90 के दशक में सोवियत समाजिक साम्राज्यवाद के ढह जाने के बाद इनकी स्थिति कुछ वर्चस्व में आयी मगर यह भी ज्यादा वक्त तक नहीं रही। इसे पिछले एक-दो दशक से एक तरफ यूरोपीय साम्राज्यवादी दूसरी तरफ रूसी साम्राज्यवाद की चुनौती तथा साथ ही जापान व चीन की भी चुनौती मिल रही है। विश्व अर्थव्यवस्था में अमेरीका की आर्थिक हैसियत भी कमजोर हुई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सत्ता में आने और 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति अपनाने के साथ अलग-अलग साम्राज्यवादियों के बीच कुछ असहमतियां भी बढ़ी हैं। ट्रम्प द्वारा यूरोपियन यूनियन के साथ मुक्त व्यापार संबंध कायम करने की वार्ता समाप्त करने के बाद यूरोपियन यूनियन ने जापान के साथ मुक्त व्यापार समझौता (ट्रांस अटलांटिक ट्रेड इन्वेस्टमेंट पार्टनरशिप) कर लिया।
     साम्राज्यवादियों की संस्था जी-7 में एक समय साम्राज्यवादी रूस को भी शामिल किया गया था और इसे जी-8 का नाम दिया गया था। बाद में अमेरिकी व पश्चिमी साम्राज्यवादियों के द्वारा 2014 में रूस को जी-8 से बाहर कर दिया गया। ट्रम्प ने रूस को दोबारा जी-7 में शामिल करने का प्रस्ताव दिया जिसे जर्मनी, ब्रिटेन व फ्रांस ने नकार दिया। अमेरिकी शासकों ने वैश्विक स्तर पर पर्यावरण असन्तुलन व प्रदूषण सम्बन्धी सम्मेलनों में हानिकारक गैसों के उत्सर्जन को कम करने सम्बन्धी फैसले को लागू करने से खुद को अलग कर लिया। इसके चलते शेष साम्राज्यवादी अमेरिकी नेतृत्व की परवाह किये बिना आगे बढ़ने को प्रवृत्त हुए। यही नही! अमेंरिकी शासको ने ईरान के साथ हुए बहुपक्षीय नाभिकीय समझौते (जॉइंट कंप्रेहेंसिव प्लान ऑफ एक्सन) से खुद को अलग कर लिया और एकतरफा तौर पर ईरान पर व्यापारिक पाबंदियों का कार्यक्रम घोषित कर दिया। उक्त बहुपक्षीय समझौते में अमेरिका, फ्रांस, रूस, चीन, इंग्लैंड, जर्मनी व यूरोपीय संघ शामिल थे। इस समझौते के तहत ईरान की परमाणु सामरिक योजना को सीमित व नियंत्रित किया जाना था। साथ ही ईरान पर लगी व्यापारिक पाबंदियां रद्द किये जाने सहित जब्त की गई खरबों डॉलर की धनराशि मुक्त की जानी थी।
साम्राज्यवाद का तीसरी दुनिया पर हमला:     अमेरिकी शासकों ने किसी की परवाह न करते हुए एक तरफा तौर पर ईरान से हुए नाभिकीय समझौते से जब खुद को अलग कर लिया तब इस वजह से एक ओर मध्य पूर्व एशियाई क्षेत्र में तनाव बढ़ गया दूसरी ओर विभिन्न साम्राज्यवादियों द्वारा किए गए निवेश-करार-समझौते खतरे में पड़ गये। अमेरिकी शासकों के इस कदम का रूस, चीन सहित यूरोपीय साम्राज्यवादियों ने आलोचना की। इस सब के बावजूद अमेरिका की हठधर्मिता आगे बढ़ी। इसने ईरान के तेल व्यापार पर प्रतिबंध लगा दिया। दूसरे देशों को भी ईरान से व्यापार संबंध खत्म करने का फरमान जारी कर दिया। अपनी सामरिक शक्ति का भय दिखाकर अमेरिकी साम्राज्यवादी मध्य पूर्व एशिया में अशांति की स्थितियां बनाए हुए हैं। इन्होंने पश्चिमी एशिया में अपने लठैत इजराइल के पक्ष में येरूशलम में अमेरिकी दूतावास बनाने की घोषणा कर दी। पिछले दो दशक से अमेरिकी साम्राज्यवादियो को रूसी साम्राज्यवादियो और उभरती शक्ति चीन से भी चुनौती मिलती रही हैं। अमेरिकी व यूरोपीय साम्राज्यवादियों की साम्राज्यवादी रूस को घेरने तथा इसके पड़ोसी राज्यों में पश्चिमी साम्राज्यवादी समर्थक सत्ताएं स्थापित करने की कोशिशें जारी हैं। रूसी साम्राज्यवादी इनकी विशेषकर अमेरिकी साम्राज्यवादियो की मध्य पूर्व सीरिया आदि में हस्तक्षेप की योजनाओं में चुनौती बनता रहा है। यूक्रेन के मामले में पश्चिमी साम्राज्यवादियों ने साम्राज्यवादी रूस समर्थक विक्टर यानोविच को हटाकर पारसेंको को यूक्रेन का राष्ट्रपति बनाने में कामयाबी पायी जबकि साम्राज्यवादी रूस क्रीमिया को जनमत संग्रह के जरिए अपने में मिलाने में सफल रहा।
    पश्चिमी साम्राज्यवादी जॉर्जिया के स्वायत्त प्रांत दक्षिण आसेसीया, अबखजिया (2018 से रूस के नियंत्रण में) दोबारा षडयंत्र कर इन्हें अलग कर अपने प्रभाव में लेने को लगातार प्रयासरत रहे मगर प्रयास असफल रहा। अमेरिकी व यूरोपीय शासकों ने साम्राज्यवादी रूस को घेर लेने के लिए फरवरी-मार्च 2018 में राजनयिक बहिष्कार अभियान छेड़ा। पश्चिमी साम्राज्यवादियों ने अपने समर्थक समूह का प्रसार कर रूसी राजनयिकों को कई देशों से निष्कासित करवाया। 27 देशों ने रूस के 140 राजनयिकों को अपने-अपने देश से निकाल दिया। विवाद का आधार फर्जी था जो भूतपूर्व रूसी जासूस सर्जेई स्क्रीपाल की हत्या के प्रयास का झूठा आरोप रूस पर मढ़कर तैयार किया गया था। रूस अमेरिकी साम्राज्यवाद की सीरिया में तख्तापलट योजना के खिलाफ चुनौती बनकर खड़ा हुआ था। अन्य अनेक मामलों में पश्चिमी साम्राज्यवादियों तथा रूसी साम्राज्यवादियो के बीच अंतर्विरोध उभरते रहे हैं। मध्य पूर्व के क्षेत्र में भी रूसी शासक चुनौती बनकर खड़े हैं।
    चीनी शासक अपनी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा के चलते विश्व राजनीतिक पटल पर उभरती ताकत के रूप में विकसित हुए हैं। जहां अमेरिकी साम्राज्यवाद की आर्थिक हैसियत कमजोर हुई है वहीं चीन विश्व की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर उभरा है। इसने अपनी औद्योगिक ताकत के साथ अपने प्रभाव को एशिया, अफ्रीका व लैटिन अमेरिका तक पहुंचाया है। व्यापार के क्षेत्र में चीन, अमेरिका व यूरोप के लिए चुनौती बनकर उभरा है। अमेरिकी शासक चीन की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए व्यापार युद्धों के जरिये चीनी माल पर दंडात्मक कर लगाकर उन्हें दबाव में लेने के प्रयास करते रहे हैं। ये चीनी शासकों से सीधे टकराने की जगह भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया का गुट बनाकर चीन को घेरने की मंशा रखते हैं। ये दक्षिणी चीन सागर के द्वीपों के विवादों का लाभ उठाकर वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, ब्रूनेई एवं फिलीपींस को चीन के खिलाफ करने की तिकड़म करते हैं। दूसरी ओर ताईवान में झंझट पैदा कर चीन के भीतर कलह पैदा करने का प्रयास करते रहे हैं।
     दक्षिण एशिया में नेपाल, श्रीलंका, मालदीव व पाकिस्तान में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने की अमेरिकी योजना में भारत भी सहयोग करता रहा है। ये सारी टकराहटें पूंजीवादी लूट-खसोट व हिस्सा-बांट के लिए ही होती हैं। अमेरिकी साम्राज्यवादी दूसरे देशों में हस्तक्षेप कर वहां अपनी समर्थक सत्ता स्थापित करने की आक्रामक कार्यवाही को अंजाम देते रहे हैं। हाल ही में लैटिन अमेरिकी देश 'वेनेजुएला' में अमेरिकी हस्तक्षेप साफ दिखा। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मदुरो को हटाकर जब अमेरिकी मोहरे वाली जुआनगुएडो को कार्यकारी राष्ट्रपति बनाने के लिए सैनिक विद्रोह को भड़का कर सत्ता पलटने का षडयंत्र किया गया था। अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के तेल व्यापार पर प्रतिबंध लगाकर उसकी अर्थव्यवस्था को बर्बाद किया गया। वेनेजुएला 1998 के बाद कुछ हद तक कल्याणकारी सुधारवादी कदमों वाली पूंजीवादी अर्थव्यवस्था बना था लेकिन संशोधनवादी इसकी "अमेरिकी बोलीवार समाजवाद" कहकर इनकी तारीफ करते थे जबकि यह समाजवाद नहीं था। यही नहीं! इसके साम्राज्यवाद से भी संबंध बने हुए थे। 2007-08 के वैश्विक आर्थिक संकट की गिरफ्त में जब यह मुल्क भी आ गया तब आर्थिक संकट बढ़ने के साथ ही यहां भी जनता की सुविधाओं में कटौती की जाने लगी परिणामस्वरूप असंतोष बढ़ने लगा। इस जनअसंतोष का लाभ उठाकर अमेरिकी साम्राज्यवादियो द्वारा राष्ट्रपति निकोलस मदूरो को हटाने का षड्यंत्र किया गया जो सफल नहीं हुआ। चीन व रूसी साम्राज्यवादी मदुरो के पक्ष में खड़े रहे।
    बोलीविया में अमेरिकी साम्राज्यवादियों के हस्तक्षेप एवं बोलीविया के दक्षिणपंथी ताकतों के षड्यंत्र ने इवो मोरेलस की सरकार का तख्तापलट कर दिया जबकि अभी हाल ही में इवो मोरेलस की पार्टी चुनाव जीत कर फिर सत्तासीन हुई थी। अमेरिकी साम्राज्यवादियों के हस्तक्षेप एवं दक्षिणपंथियों के षड्यंत्र के चलते ही इवो मोरेलस को मेक्सिको में शरण लेनी पड़ी। सत्ता  मध्य पूर्व क्षेत्र लीबिया में अमेरिकी व फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों के समर्थन से संयुक्त अरब अमीरात व मिश्र विद्रोह भड़काने में लगे हुए हैं। ये खलीफा हफ्तार को शरण व सामरिक मदद देकर इसे लीबिया की सत्ता पर काबिज करने का षडयंत्र जारी रखे हुए हैं। यमन में सऊदी अरब द्वारा विनाशकारी आक्रमण एवं नरसंहार को अमेरिकी साम्राज्यवाद का समर्थन जारी है। साम्राज्यवादी शासक 'उदारीकरण-वैश्वीकरण' की नीतियों के जरिये हो रही शोषण की खुली लूट से संतुष्ट नहीं हैं। उधर उत्तरी कोरिया एवं अमेरिका के बीच शिखर वार्ता हुई है। अमेरिकी साम्राज्यवादी उत्तरी कोरिया के नाभिकीय शस्त्रों को समाप्त कर उसे चीन के प्रभाव से मुक्त कर अपने पक्ष में लाना चाहते हैं। इस क्षेत्र का इस्तेमाल चीन की घेरेबंदी के लिए करना चाहते हैं। दूसरी ओर उत्तरी कोरिया अपनी गिरती अर्थव्यवस्था को संभालने में सहायता तथा सुरक्षा की गारंटी चाहता है क्योंकि उत्तर कोरिया दक्षिण कोरिया में मौजूद अमेरिकी सामरिक और मिसाइल रक्षा प्रणाली के निशाने पर है। उत्तरी कोरिया की सचेत कोशिश यह भी है कि इसे चीनी सहयोग को खोना ना पड़े। वार्ताएं अभी भी निर्णायक मुकाम तक नहीं पहुंची है। कुल मिलाकर कोरियाई क्षेत्र में शांति व अमन की स्थितियों का कायम होना असंभव है क्योंकि वर्तमान दौर में विश्व शक्ति संतुलन साम्राज्यवाद के पक्ष में है।
साम्राज्यवाद-पूंजीवाद के क्रूर चेहरे को बताता शरणार्थी संकट :     साम्राज्यवाद-पूंजीवाद का अमानवीय चेहरा स्प्ष्ट है  इसने शरणार्थियों-प्रवासियों के विरुद्ध दमनात्मक व्यवहार कर इन्हें अपराधी बताकर बंदी शिविरों में कैद कर दिया है। इसे हर प्रकार की मानवीय सहायता से वंचित करने, बच्चों को माता-पिता से अलग कर बंदी बना देने तथा सरहदों से बाहर धकेल कर मरने के लिए छोड़ देने की अमानवीय कार्यवाहियां की हैं। शरणार्थियों के प्रति अमानवीयता का यह परिदृश्य विश्वव्यापी है। यह पूंजीवाद के पतन की घृणित तस्वीर भी है। ये साम्राज्यवादी-पूंजीवादी शासक दुनिया के कोने-कोने तक अपने लिए लूट की खुली छूट चाहते हैं लेकिन जब मानवीय संकट का सवाल आता है तो अपनी सरहदों की नाकेबंदी कर लेते हैं। वर्तमान शरणार्थी संकट पूंजीवादी-साम्राज्यवादी जनविरोधी 'उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण' की नीतियों की निर्मम लूट-खसोट के दौर में साम्राज्यवादी-पूंजीवादी शासकों की आधिपत्यकारी एवं आक्रमणकारी युद्धों व हमलों से होने वाली तबाही-बर्बादी का नतीजा है। लीबीया, सीरिया, इराक, यमन में साम्राज्यवादी ताकतों के हस्तक्षेप के चलते हुए गृह युद्धों तथा हमलों के चलते लाखों शरणार्थी दूसरे देशों में शरण लेने को मजबूर हैं। इसी के साथ-साथ लैटिन अमेरिकी देशों अलसल्वाडोर, ग्वाटेमाला, होंडुरास, निकारागुआ जैसे देशों के साथ ही अफ्रीकी देशों से भी भारी संख्या में विस्थापन व पलायन बढ़ा। इन स्थितियों के लिए साम्राज्यवादियों के साथ-साथ देशी शासक भी उतने ही गुनाहगार हैं। ये इस या उस साम्राज्यवादी मुल्क के कनिष्ठ सहयोगी बने हुए हैं।
     इस दौर में शरणार्थी समस्या से जुड़ी अनेक परिघटनाएं भी सामने आयीं। संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति ने तो मैक्सिको की सीमा पर दीवार खड़ी करने की परियोजना आरंभ कर दी तथा सरहदों की चौकशी पर सैन्य बल लगा दिए। यूरोपीय देशों ने शरणार्थियों के प्रवेश को रोकने के लिए अपनी सीमाएं बंद कर दी। शरणार्थियों को जहाजों से उतरने नहीं दिया गया गया जो शरणार्थी प्रवेश करने में किसी तरह सफल हुए उन्हें बंदी शिविरों में कैद कर लिया गया। शरण पाने की इस जोखिम भरी यात्रा में हजारों शरणार्थियों की दर्दनाक मौत हो गयी। कई देशों ने तो नए प्रवासियों को वैध-अवैध की भीड़ बताकर उनको देश से निष्कासित किये जाने के पक्ष में माहौल बनाया। दक्षिणपंथी नव फासीवादी शक्तियों ने इससे शह पाकर प्रवासियों पर हमले किये। इटली में छह लाख रोमा आबादी को निष्कासन की धमकी दी गई। यूरोपीय सरकारों के दबाव में शरणार्थियों को रोकने के लिए अल्जीरिया सरकार ने घृणित तौर तरीके अपनाए। इसने शरणार्थियों को पकड़कर सहारा मरुस्थल में मरने के लिए छोड़ दिया जहां पिछले कुछ वर्षों में 35,000 से अधिक की मौत हो गई है। म्यांमार शासकों द्वारा रोहिंग्या मुसलमानों का देश से सफाया अभियान चलाया गया। लाखों रोहिंग्या परिवार अपमानित जीवन परिस्थितियों का सामना करने को मजबूर हो गए। वे अपने देश को छोड़कर भारत व बांग्लादेश जाने को मजबूर हुए। भारत की हिन्दू फासीवादी सरकार ने शरणार्थियों को आतंकवादी के रूप में प्रचारित कर उन्हें भीतर नहीं प्रवेश करने देने तथा पहले प्रवेश कर चुके लोगों को अपमानजनक जीवन जीने को बाध्य कर दिया।
     भारत में एन.आर.सी. की प्रक्रिया के तहत लाखों मेहनतकश मुस्लिमों को घुसपैठिये के रूप में चिन्हित करने व इनकी नागरिकता को अवैध घोषित करने का अभियान चला हुआ है। हिंदू फासीवादी इस मुद्दे के जरिये अपने फासीवादी आंदोलन को और आगे बढ़ा रहे हैं। हिंदू फासीवादी नागरिकता के मुद्दे को साम्प्रदायिक रंग देकर इसे ध्रूवीकरण का औजार बनाये हुए हैं।
    बीसवीं सदी के क्रांतिकारी संघर्षों ने विश्व राजनीतिक संतुलन को मानवीय सरोकारों के पक्ष में खड़ा करने में निर्णायक भूमिका अदा की थी। शोषित-पीड़ित जनता के पक्ष में खड़े होना तथा इन्हें शरण देना मानवीय सरोकारों तथा संहिता के रूप में स्थापित किया था। क्रांतिकारी संघर्षों का आवेग बेहद कमजोर होने की स्थिति में आज का वर्तमान दौर शासकों द्वारा जनता के जनवादी अधिकारों, अन्य सहूलियतों को छीनने के रूप में तथा मानवीय सरोकारों को कुचलने के रूप में सामने आया है।
सामाजिक संकट:   बीते सालों में संपूर्ण विश्व में अमीर-गरीब के बीच असमानता की खाई ज्यादा तेजी से चौड़ी होती
                 गयी है। वैश्विक आर्थिक संकट के दौर में पूंजीवादी साम्राज्यवादी शासकों ने कल्याणकारी राज्य के दौर की शेष बची नागरिक सुविधाओं शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन व रोजगार आदि पर भी तीखा हमला बोला है। सरकारों ने इन जिम्मेदारियों से खुद को अलग कर लिया है। इन्हें बाजार के दोहन के लिए छोड़ दिया है। इसके चलते असमानता और ज्यादा गति से बढ़ी है, भारी तादाद में बेरोजगारी बढ़ी है, अभावग्रस्तता बढ़ी है तथा भुखमरी बढ़ी है। विश्व भर में वर्ष 2014 में भुखमरी की सीमा पर 78.37 करोड़ लोग थे जिनकी तादाद वर्ष 2017 में बढ़कर 82.10 करोड़ हो गई।
स्वास्थ्य सुविधा के अभाव में हर वर्ष 86 लाख लोग विश्व भर में मौत के मुंह में चले जाते हैं। विश्व भर में हर वर्ष 10 करोड़ लोग गरीबी की हालात में फंस जाते हैं। इन स्थितियों में भारी अलगाव, अनिश्चितता, असुरक्षा, अवसाद, तनावग्रस्तता ने मानसिक बीमारियों को जन्म दिया है। इसके चलते आत्महत्या, नशाखोरी एवं यौन हिंसा आदि की घटनाएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका जो विश्व साम्राज्यवाद का सिरमौर बनने का दावा करता है वहां 15-19 वर्ष के किशोर नौजवान उम्र के लड़के-लड़कियों में आत्महत्या की प्रवृत्ति वर्ष 2007-15 में 5.1% थी जो कि 1975 की तुलना में दुगुनी हो चुकी हैं। यह सामाजिक संकट विश्वव्यापी है। ब्रिटेन में बेघरों की बढ़ती तादाद, अमेरिकी फूड स्टांप तथा ब्रिटेन के फ्री फूड स्टालों के सामने लगी लम्बी कतारें संकट की गवाही देते हैं। साम्राज्यवादी संस्थाएं स्वीकार करती हैं कि मजदूरी वेतन स्तर का ठहराव अमीर-गरीब के बीच खाई बढ़ा रहा है। श्रम बाजार में ठेकाकरण तथा अंशकालिक रोजगार का बोलबाला है। पूंजी श्रम पर हमलावर है। साम्राज्यवादी-पूंजीवादी शासक सब जानते हुए भी जनविरोधी हमला तेज करते जा रहे हैं।       
साम्राज्यवादी-पूंजीवादी शासकों ने मुनाफे की अपनी हवस में प्रकृति का अंधाधुध व अनियंत्रित दोहन किया है। इसके चलते पर्यावरण असंतुलन व प्रदूषण की समस्या विकराल बन चुकी है। इन्हीं के द्वारा भांति-भांति के पर्यावरणवादी सस्थाओं का जाल भी खड़ा किया गया है। इस दायरे में यानी पूंजीवाद के रहते विकराल होते पर्यावरण संकट का हल नामुमकिन है। साम्राज्यवादी-पूंजीवादी शासक सामाजिक समस्याओं के प्रति भी बेहद संवेदनहीन होते हैं। वे समस्याओं का निदान नहीं कर सकते। इसके उलट वे जनता के दमन-उत्पीड़न के तंत्र को मजबूत करते जाते हैं। लूट-खसोट व हिस्सा-बांट के युद्ध हेतु खतरनाक नाभिकीय व सामरिक हथियारों की खरीद तथा दमनतंत्र को और ज्यादा मजबूत करने हेतु इनका रक्षा बजट का आकार निरन्तर बढ़ता जा रहा है। इन्होंने इस बीच जनता के जनवादी अधिकारों को निष्प्रभावी व सीमित कर वोट डालने के औपचारिक स्तर तक पहुंचा दिया है। पूंजीवादी संसदीय व्यवस्था तथा इसकी जनप्रतिनिधित्व प्रणाली अब लगभग खोखली हो चुकी है। यही नहीं! जनमत के विपरीत भी सरकारों का संचालन-गठन कर दिया जाता है। सरकारें जनता की सामूहिक अभिव्यक्ति को कुचलने के लिए सामान्य दमन व काले कठोर कानूनों को बनाने से भी आगे बढ़कर आपातकाल लागू कर जनता के जनवादी अधिकारों को कुचलने की ओर बढ़ रही हैं। फ्रांस की सरकार ने बढ़ते वर्ग संघर्ष से निपटने के लिए सिर्फ एक कार्टून विवाद के बाद हुए आतंकी हमले की आड़ लेकर आपातकाल लागू कर दिया था व जनता के अधिकारों को कुचल दिया था। अभी हाल ही में श्रीलंका के शासकों ने एक आतंकवादी घटना की आड़ लेकर पूरे देश में आपातकाल लागू कर दिया था। विरोध के स्वरों को रोकने के लिए शासक वर्ग राजनीतिक सेंसरशिप लगा देने की सीमा तक पहुंच जाते हैं। ब्राजील के दक्षिणपंथी राष्ट्रपति बोलसेनारो ने छात्रों के लिए समाजशास्त्र-दर्शनशास्त्र की डिग्री के लिए फंड देना बंद कर दिया। इसका कहना है कि किसान-मजदूर के बेटे मानव जाति के विज्ञान को पढ़कर मार्क्सवादी बन जाएगें वह ऐसा नहीं चाहते! शासक वर्ग जनता पर तरह-तरह की निगरानी की व्यवस्था को मजबूत कर रहा है। डिजिटल डाटा संग्रह करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस निगरानी तंत्र में शासकों के लिए सहायक हैं।
     समाज में साम्प्रदायिक ध्रूवीकरण को शासकों ने सचेत और पर आगे बढ़ाया है। प्रवासियों, दूसरे धर्म व नस्ल के लोगों के प्रति वैमनस्य को बढ़ाया है। अंधराष्ट्रवाद व उग्रराष्ट्रवाद के जरिए शासक जनता के अधिकारों पर लगातार हमला बढ़ाते गए हैं। जनता की यह अधिकारहीनता शासकों के तानाशाही भरे रुख को स्पष्ट कर देती है।
जन संघर्षों की स्थिति:    'निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण' की जनविरोधी नीतियों की मार से जहां सामाजिक संकट
                       बढ़ते गये हैं वहीं विश्व भर में जनता का असंतोष उनके संघर्षों के रूप में फुटकर रूप में सामने आया है।
     अप्रवासियों के विरुद्ध शासकों की अमानवीय नीतियों के खिलाफ अमेरिका में लाखों काले-गोरे लोग मिलकर संघर्ष में उतरे। डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से पहले भी इन्होंने सामूहिक प्रतिरोध किया था और ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद भी विरोध के लिए ये एकजुट हो रहे हैं। रोमानिया में भ्रष्टाचार संबंधी कानूनों को ढीला करने के शासकों के फैसले के विरुद्ध देश के 70 शहरों में देशव्यापी प्रदर्शन हुए। इसमें छात्रों, नौजवानों, मजदूरों, स्त्री-पुरुषों व बूढ़ों सभी ने भागीदारी की। दिसंबर 2017 में इजराइल में बिजली के निजीकरण एवं जनता के आंदोलनों में न्यायालय के अनावश्यक हस्तक्षेप के विरुद्ध जनता के प्रदर्शन हुए। जनता के विभिन्न हिस्सों की इसमें भागीदारी रही। दिसंबर 2017-जनवरी 2018 में जर्मनी के ऑटोसेक्टर और बिजली सेक्टर के मजदूरों की हड़ताल हुई जो "निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण" के खिलाफ थी। जनवरी 2018 में दुनिया की जनता के संघर्षों में वृद्धि हुई। संघर्षों में सुरक्षाबलों से टकराव भी हुआ। जनवरी 2018 में ग्रीस में मेहनतकश जनता के संघर्ष हुए जो सरकार की सामाजिक मदों में कटौती कार्यक्रम के खिलाफ थी। ईरान में महंगाई व बेरोजगारी के कारण उपजे असंतोष ने जनआंदोलनों को जन्म दे दिया। धार्मिक निरंकुशता के बावजूद लोग संघर्ष में शामिल हुए।
     फ्रांस का "पीली जैकेट आंदोलन" विश्व भर में चर्चा का विषय रहा। यह आंदोलन नवम्बर 2018 से आरंभ होकर देश भर में फैल गया। आंदोलन फ्रांसीसी जनता के संघर्ष के उग्र तेवर के कारण पड़ोसी यूरोपीय देशों के मजदूर-मेहनतकशों को भी आंदोलन के लिए नैतिक ऊर्जा देता गया। जर्मनी, बेल्जियम, बुल्गारिया, सर्बिया व ग्रीस आदि में आंदोलनों का दौर चल पड़ा। आंदोलन ईंधन मूल्य वृद्धि की प्रतिक्रिया में शुरू हुआ था। आंदोलन ने सामाजिक बराबरी, मजदूरी में भारी वृद्धि, धनिकों के विशेषाधिकारों के खात्मे और राष्ट्रपति इमानुएल मैक्रो के त्यागपत्र की मांग की। भारी दमन के बावजूद यह आंदोलन लम्बे वक़्त तक चलता रहा। यह आंदोलन ऊर्जावान होते हुए भी सांगठनिक-वैचारिक शक्ति से लैस नहीं था। यही इस आंदोलन की सीमा बन गयी।
     सूडान के तानाशाह ओमर-अल-बशीर को जनता के तीखे संघर्षों के कारण दिसंबर 2018 से शुरू हुए सरकार विरोधी प्रदर्शनों के चलते सत्ता छोड़नी पड़ी। महंगाई व बेरोजगारी से त्रस्त व आक्रोशित जनता ने सैन्य दमन का सामना करते हुए चार माह तक जुझारू संघर्ष किए। अन्ततः 2 वर्ष के भीतर नागरिक-प्रशासन-सरकार के गठन की सहमति के साथ आंदोलन समाप्त हुआ। ओमर-अल-बशीर 1989 से सत्तासीन था। फरवरी 2019 में दोबारा राष्ट्रपति बनने की योजना बना रहा था। जनता के संघर्षों ने उसे चलता कर दिया। इसी तरह अल्जीरिया के तानाशाह अब्दुल अजीज बोत्फ़ालिका को भी जनता के तीखे संघर्षों के कारण फरवरी 2019 त्यागपत्र देना पड़ा। अब्दुल अजीज सैन्य समर्थन से 1970 से सत्ता पर था।
     निकारागुआ में राष्ट्रपति डेनियल ओर्टेगा की सरकार द्वारा आई.एम.एफ के निर्देश पर पेंशन कटौती तथा सामाजिक सुरक्षा खर्च में कटौती के खिलाफ अप्रैल 2018 में जनता के संघर्ष फूट पड़े। संघर्ष का दमन हुआ। लगभग 300 लोगों को दमन के कारण जान भी गंवानी पड़ी। इस देश में अमेरिकी साम्राज्यवादियो की  षडयंत्रकारी कार्यवाहियां चलती रही हैं। ट्यूनीशिया में टैक्सों का बोझ लादे जाने के विरुद्ध जनवरी 2019 में जनता के संघर्ष फिर फूट पड़े। ब्राजील में दक्षिणपंथी राष्ट्रपति बोलसेनारो द्वारा शिक्षा बजट में 30% की कमी के खिलाफ छात्रों का देशव्यापी आंदोलन फूट पड़ा। आंदोलन में 10 लाख छात्र शामिल रहे। जनता के दूसरे हिस्सों का भी इसे समर्थन हासिल हुआ।
     चिली में अभी हाल ही में मेट्रो किराये में वृद्धि के विरोध में लाखों का जनसैलाब सड़कों पर उमड़ पड़ा इसका दमन हुआ जिसमें 20 लोग मारे गए। सैकड़ों घायल हो गए। इराक में बेरोजगारी भ्रष्टाचार के विरोध में सरकार विरोधी प्रदर्शनों की लहर उमड़ आयी है इसका भारी दमन शासकों ने किया है इसमें 300 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। इक़वाडोर में कटौती कार्यक्रमों के विरोध में प्रदर्शनों का तांता लगा हुआ है प्रदर्शन का दमन हुआ है इसमें सैकड़ों लोग मारे गए हैं। इसी प्रकार लेबनॉन में व्हाट्स पर टैक्स लगाये जाने के खिलाफ सड़कों पर जनसैलाब उमड़ पड़ा। दूसरी ओर इंडोनेशिया में भी छात्रों का संघर्ष फुट पड़ा है।
     चीन में मजदूरों व किसानों के संघर्ष फूटते रहे हैं। इनका क्रूरतापूर्वक दमन चीनी शासक करते रहे हैं। हांगकांग में प्रत्यर्पण कानून के खिलाफ व्यापक जनसंघर्ष हुआ। चीनी शासकों द्वारा किये गए दमन के बावजूद जनसंघर्ष आगे बढ़ता गया। अमेरिकी साम्राज्यवादी अपने हित में हांगकांग के प्रदर्शनकारियों को प्रशिक्षण-उकसावा देकर चीन में लगातार हस्तक्षेप करते रहे हैं। वहीं दूसरी ओर उईगर प्रांत के मुस्लिम समुदाय को डिटेंशन कैंप में रखना उनका पुनर्शिक्षण करना चीनी शासकों के फासीवादी रुझान का उदाहरण है।

वैश्विक परिस्थितियों का सार संकलन:     विश्व पूंजीवादी साम्राज्यवादी शासक अपने क्रूर शोषण-दमन के अभियान में   निरन्तर सक्रिय हैं। वे अपने शासन को बनाये रखने व टिकाये रखने के लिए एक बार फिर दक्षिणपंथी नवफासीवादी शक्तियों को बटोर रहे हैं तथा आगे बढ़ा रहे हैं। ये शोषण-लूट को बनाये रखने के लिए दमन-उत्पीड़न की किसी भी सीमा को पार करने को तैयार हैं। दूसरी ओर व्यापक मजदूर मेहनतकश आबादी है जिसने बीसवीं सदी के क्रांतिकारी संघर्षों से हासिल सफलताओं, जनवादी अधिकारों व जीवन की सुरक्षा को खोने का कटु अनुभव पाया है। यह अपने संघर्षों के जरिये शासकों का लगातार प्रतिरोध कर रही है किंतु उसका संघर्ष अभी अपने क्रांतिकारी राजनीतिक नेतृत्वकारी संगठन से विहीन है। विश्व राजनीतिक रंगमंच पर अभी भी साम्राज्यवादी शक्तियां सिरमौर बनी हुई हैं। शेष पूंजीवादी शक्तियां इस अभियान का अनुसरण कर रही हैं। संपूर्ण विश्व पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था अपने इस जनविरोधी चरित्र के कारण नित नये संकटों में घिरती जाती है लेकिन इसके साथ-साथ इसकी शोषण की हवस और भी बढ़ती जाती है।
    इस स्थिति में समाज में बढ़ती लूट-शोषण, बेरोजगारी-असमानता, अमानवीयता व अभावग्रस्तता के दुष्चक्र के खात्मे की दरकार भी बढ़ती जा रही है। हाल-फिलहाल शासकों के समक्ष चुनौती पेश करने वाली व आमूल परिवर्तन की राह खोलने वाली मज़दूर मेहनतकशों की शक्तियां क्रांतिकारी ढंग से संगठित नहीं हैं। मजदूरों व मेहनतकशों की संघर्षकारी शक्ति ही परिवर्तन की क्षमता रखती है। यही पूंजीवाद का नाश कर महत्तम समानता, स्वतंत्रता, जनवाद वाला समाजवादी समाज बना सकती है।
                 B - 【 राष्ट्रीय परिस्थिति 】
       पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से जारी विश्व अर्थव्यवस्था का संकट और भी गहरा हुआ है। विश्व अर्थव्यवस्था के संकट के प्रभाव तथा मोदी सरकार के नोटबन्दी व जी.एस.टी. जैसे विशिष्ट कदमों के चलते साल 2019-20 की दूसरी तिमाही गुजरते-गुजरते भारतीय अर्थव्यवस्था में भी गहरे संकट के लक्षण साफ साफ दिखने लगे हैं। इस दौरान पूंजीवाद की पतनशीलता और इसका दमनकारी व उत्पीड़नकारी चरित्र और भी बढ़ा है। पूंजीपति वर्ग अपने मुनाफे को बनाये रखने व अपनी व्यवस्था को दीर्घजीवी बनाने के लिए राजनीति में घोर प्रतिक्रियावादी कदमों की दिशा में आगे बढ़ चुका है दूसरी ओर यह आर्थिक संकट का सारा बोझ मजदूरों व मेहनतकशों पर डाल रहा है।
      वैसे तो पिछले साल अर्थव्यस्था के जिस विकास दर को आंकड़ेबाजी के खेल के जरिये 7 % से ऊपर बताया जा रहा था वह सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ही अब 5 % के नज़दीक पहुंच गयी है। हालांकि इन आंकड़ों पर भी संदेह है कई पूंजीवादी अर्थशास्त्री ही इसे 5 % से काफी नीचे बता रहे हैं। आलम यह है कि अर्थव्यवस्था के कोर सेक्टर की वृध्दि गत वर्ष के 7.8 % से गिरकर जून 19 में 0.2 % तक गिर गई है। फरवरी 2019 में तो औद्योगिक उत्पादन में विकास दर 20 माह के न्यूनतम स्तर 0.1 प्रतिशत तक गिर गयी थी। कुछ महीनों में यह ऋणात्मक रही है। उद्योगों की खस्ता हालत इस बात की पुष्टि करती है। ऑटोसेक्टर से लेकर दैनिक उपभोग की वस्तुओं की बिक्री में जून-जुलाई 2019 आते-आते भारी गिरावट दिखी है। वाहन निर्माता कंपनियां एक ओर उत्पादन क्षमता से काफी कम उत्पादन कर रही हैं तालाबंदी कर रही हैं तो दूसरी ओर बड़ी तादाद में मज़दूरों की छंटनिया भी कर रही हैं। लगभग 10 लाख मज़दूरों की छंटनी होने की खबरें आ रही हैं। वाहनों की बिक्री में 30 साल की सबसे बड़ी गिरावट बतायी जा रही हैं। सार्वजनिक तथा निजी क्ष्रेत्र के कई उद्यम भारी कर्ज जाल में फंसे हुए हैं। इसका नतीजा बैंकों की 8-10 लाख करोड़ रुपये के गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (फंसे हुए कर्ज) के रूप में सामने आया है। सरकार इसके बड़े हिस्से को बट्टे खाते में डालने को बेताब है।
      दूसरी ओर कृषि संकट और ज्यादा गहन हुआ है। कृषि विकास दर गत वर्ष के 5.1% से गिरकर 2% तक गिर गयी है। इस संकट की अभिव्यक्ति इस रूप में भी दिखाई देती है कि औसतन 12000 किसान प्रतिवर्ष आत्महत्या कर रहे हैं। कृषि का अधिकाधिक पूंजीवादीकरण तथा बहुराष्ट्रीय निगमों की कृषि क्षेत्र में घुसपैठ ने हालात को अत्यन्त भयावह बना दिया है। घटते रकवे, गिरती आय, बढ़ती ऋणग्रस्तता, बढ़ती लागत और बाजार की होड़ भी कृषि संकट को बढ़ा रही है। कृषि में छोटे-मझौले किसान तो पहले ही खस्ताहाल थे अब धनी किसानों का निचला स्तर भी इस संकट की चपेट में है।
     संकट के और आगे गहराने की आशंका में, टैक्स का दायरा पूंजीपतियों के एक हिस्से व उच्च मध्यम वर्ग पर बढाने तथा कॉरपोरेट टैक्स में कटौती मनमाफिक न होने से जुलाई-अगस्त 2019 में बजट के बाद शेयर बाजार में बड़ी गिरावट हुई। शेयर बाजार से पूंजी का पलायन हुआ। मगर जैसे ही कॉरपोरेट टैक्स को घटाकर 22 % किया गया शेयर बाजार के खिलाड़ी, कॉरपोरेट घराने खुशी में झूम उठे। 36 हज़ार के करीब लुढ़क चुका सेंसेक्स उछलकर 39 हज़ार के निकट पहुंच गया। स्पष्ट है कि इस पक्ष में हुई टेक्स दर की कटौती जनता पर टैक्स बढ़ाकर प्रतिसन्तुलित होगी।
    इन बीते वर्षों में शिक्षा, स्वास्थ्य, मनरेगा, महिला बाल विकास, परिवार कल्याण, सिंचाई परियोजनाओं, सब्सिडी आदि में भारी कटौती की गयी। कुछ मदों में तो जितनी राशि की घोषणा हुई उससे बहुत कम राशि ही जारी की गयी। दूसरी ओर भ्रष्टाचार खत्म करने के नाम पर सार्वजनिक जन वितरण प्रणाली को आधार कार्ड से जोड़कर तथा खाद्य सब्सिडी को नकद हस्तान्तरण से प्रतिस्थापित करके गरीब-मेहनतकशों के जीवन को बहुत मुश्किल बना दिया गया है।
    इन वर्षों में मोदी सरकार ने नागरिक विमानन, फार्मा, सिंगल ब्रांड रिटेल, बैंक, बीमा आदि क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को काफी बढ़ा दिया है। रक्षा क्षेत्र भी एफ.डी.आई. के लिए खोल दिया गया है जिसका एक नमूना राफेल सम्बन्धी भ्रष्टाचार के रूप में भी दिखा। दूसरी ओर सूचना अधिकार कानून में संशोधन कर सरकार ने इसे बेहद कमजोर कर दिया है। यहां आयुक्तों के चयन तथा वेतन तय करने पर सरकार ने अपना नियंत्रण कायम कर लिया है।
     2019 में चुनाव में एकाधिकारी पूंजी के प्रचंड समर्थन, अन्धराष्ट्रवादी उन्माद तथा घृणित तौर तरीकों के जरिये फासीवादी ताकतों की सत्ता में पुनर्वापसी हुई है। अपने दूसरे कार्यकाल के 100 दिनों में ही मोदी सरकार ने मज़दूर मेहनतकशों पर तीखा हमला बोला है। विनिवेशीकरण, कल्याणकारी मदों में भारी कटौती, सब्सिडी में कटौती, सरकारी नौकरियों में कटौती तथा वेतन भत्तों में कटौती की जा रही है। तरह-तरह के टैक्स लादे जा रहे हैं यह 'मोटर वाहन अधिनियम' के जरिये भी हो रहा है व स्वच्छता आदि के नाम पर 'उपकर' लगाकर भी। हर तरह से जनता पर मंहगाई का बोझ बढ़ाया जा रहा है।
रेलवे के कोच कारखानों का निगमीकरण, स्टेशनों का निजीकरण, रेलवे कालोनियों को बेचना तथा 100 दिन में 2 निजी ट्रेन चलाने का जनविरोधी व पूंजीपरस्त लक्ष्य सरकार ने लिया है। बिजली विभाग, इंडियन एयरलाइन्स, एच.ए.एल., बी.एस.एन.एल., डाक विभाग जैसे सार्वजनिक संस्थानों के निजीकरण की ओर सरकार क्रमशः अग्रसर है। यह विनिवेशीकरण के जरिये आगे बढ़ रही है। लगभग 1 लाख करोड़ रुपये इस साल इससे जुटाने का इनका लक्ष्य है। अब बैंको में सरकारी हिस्सेदारी को 50 प्रतिशत से नीचे लाने की बातें हो रही हैं। एकाधिकारी पूंजी के हित में बैंकों का आपस में विलय कर विशाल आकार के कुछ चुंनिन्दा बैकों में बदला जा रहा है। दूसरी ओर मज़दूर विरोधी वेज कोड बिल भी पास हो चुका है। नीम(एन.ई.ई.एम), एफ.टी.ई.एक्ट के जरिये पूंजीपतियों को श्रम के शोषण की खुली छूट दी जा रही है।
     पिछले 4 वर्षों में भारत की राजनीति फासीवाद की दिशा में और ज्यादा आगे बढ़ चुकी है। भाजपा अपने संघी गुरू के नारे ‘‘राजनीति का हिन्दूकरण करो और हिन्दुओं का सैन्यीकरण करो’’ पर आगे चल रही है। बहुसंख्यक धार्मिक समुदाय को अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय का डर दिखाकर उग्र हिन्दुत्व की राजनीति की जा रही है। पुलिस, सेना, न्यायालय, शिक्षा आदि सभी संस्थाओं में हिन्दू फासीवादी काबिज हो चुके हैं। इन्होंने ज्ञान-विज्ञान के स्थान पर समाज में कूपमंडूकता व पोंगापंथ को बढ़ावा दिया है। अयोध्या के मसले पर राम मंदिर के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का फैसला दिखाता है कि शीर्ष अदालत भी अब तथ्य तर्क के स्थान पर 'आस्था' व 'जनमत' से फैसले सुनाने लगी है शीर्ष अदालत भी संघी फ़ासीवादियों के सामने समर्पण करती जा रही है। इस फैसले से मुस्लिम समुदाय की अलगाव व दोयम दर्जे की स्थिति में और इजाफा होगा।
     मोदी सरकार के दोबारा सत्तासीन होने के साथ समाज में फासीवादी आंदोलन काफी आगे बढ़ चुका है। लव जिहाद, गौरक्षा, देशभक्ति, समान नागरिक संहिता, राम मंदिर, अंधराष्ट्रवाद आदि इस फासीवादी आंदोलन के औजार हैं। अख़लाक़ से लेकर पहलू खान व तबरेज़ तक कई निर्दोष अल्पसंख्यकों को गौरक्षा के नाम पर इनके फासिस्ट दस्तों ने मार डाला। इनके मंत्री हत्यारे फासिस्टों का फूलमालाओं से स्वागत करते हैं। प्रधानमंत्री अपने कारिंदों के इस घृणित कृत्य का खामोशी से स्वागत करते हैं।   
    अब यह कहना सही होगा कि देश में फासीवादी आन्दोलन अब तक की सबसे मजबूत स्थिति में है तथा भारत में आज फासीवाद का खतरा बिल्कुल दहलीज़ पर खड़ा है। यदि अभी फासीवाद कायम नहीं किया गया है तो सिर्फ इसीलिए कि फ़िलहाल इसकी जरूरत अभी शासक एकाधिकारी पूंजी को नहीं है। लम्बे समय से तबाही-बर्बादी की धीमी मार झेलने के बाद अब तेज़ गति से होती तबाही-बर्बादी की स्थिति मज़दूर मेहनतकश अवाम के असंतोष व आक्रोश को बढ़ाकर जनसंघर्ष की विस्फोटक स्थिति की ओर ले जा सकती है। इससे निपटने के लिए फासीवादी ताकतों को एकाधिकारी पूंजी के मालिक आगे बढ़ाकर सत्ता तक ले आये हैं।
     मोदी सरकार ने विभिन्न राज्यों की गैर भाजपाई सरकारों को अस्थिर करने, विपक्षी नेताओं की खरीद फरोख्त कर उनकी सरकारें गिराने के काम में सबको पीछे छोड़ दिया है। इसके लिए इन्होंने ई.डी., इनकम टैक्स, सी.बी.आई. व राज्यपाल का जमकर इस्तेमाल किया है। अरुणांचल प्रदेश व उत्तराखंड में तो विपक्ष की सरकार अदालत के हस्तक्षेप के बाद ही बच पायी हालांकि बाद में हुए चुनावों में दोनों जगह भाजपा सरकार बनाने में सफल हुई। कर्नाटक में पहले राउंड में तो मोदी सरकार की खुली खरीद-फरोख्त के चलते खूब किरकिरी भी हुई थी। इसलिए अगली दफा सरकार गिराने की दिशा में संभल कर कदम बढ़ाये गये। अन्ततः जे.डी.(एस)-कांग्रेस की गठबन्धन सरकार को गिरा कर भाजपा अपनी सरकार बनाने में सफल रही।
     मुख्य विपक्षी पूंजीवादी दल कांग्रेस की स्थिति काफी कमजोर है। हालांकि यह अभी भी 20 % (12 करोड़ वोटर) वोटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। संघ-भाजपा ने अपनी हिन्दू फासीवादी राजनीति और एकाधिकारी पूंजी के सहयोग से इसे बैकफुट पर धकेला है।
     वहीं दूसरे क्षेत्रीय पूंजीवादी दल स.पा., ब.स.पा., डी.एम.के., आर.जे.डी., तृणमूल कांग्रेस आदि भी भा.ज.पा. व कांग्रेस की ही तरह आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं व जनविरोधी हैं। ये भी नई आर्थिक नीतियों के ही समर्थक हैं। इनका आधार भी अभी बना हुआ है हालांकि तृणमूल कांग्रेस की स्थिति कमजोर हुई है। ब.स.पा. की स्थिति में सीटों के लिहाज से सुधार है। स.पा. की स्थिति कमजोर हुई है। यही स्थिति आम आदमी पार्टी की भी है। ये सभी संघ/भाजपा की हिन्दू फासीवादी राजनीति व पूंजी के प्रबंधन के आगे बौने साबित हुए हैं। 
     2019 के चुनाव में भाजपा को 37% मतों के साथ 303 सीटें मिली हैं। इस जीत की वजह कॉरपोरेट घरानों तथा इसके मीडिया का खुला समर्थन व प्रचार, अन्धराष्ट्रवादी उन्माद,  राज्य मशीनरी का इस्तेमाल तथा अन्य ढेरों घृणित तौर तरीके रहे र्है।
    सुधारवादी संसदीय वामपंथी पार्टियों का आधार भी इन दिनों और ज्यादा खिसका है। इनके लिए मोदी या भाजपा का सत्ता में होना ही फासीवाद है। इस "फासीवाद" की पराजय का ख्वाब ये वाम मोर्चा या कांग्रेस के साथ चुनावी गठबन्धन बनाकर देखते हैं। चुनावी जोड़-तोड़ में सिमट जाने की इनकी नीति ने संघी फासीवादियों को ही आगे बढ़ाने में प्रकारांतर से मदद की है।
     इन बीते वर्षों ने साफ दिखाया है कि मोदी सरकार का 'अच्छे दिन' का नारा आम जनता के हर हिस्से के लिए छलावा था। किसानों से सरकार द्वारा किये गए कर्जमाफी व उचित समर्थन मूल्य के वादे हवा हवाई ही साबित हुए हैं। चुनावी दबाव में हार की आशंका से ही इन्होंने 6 हज़ार रुपये किसानों के खाते में 'वोट खरीदने' की गरज से डालने की घोषणा की। वहीं दूसरी ओर किसानों की जमीनों को पूंजीपतियों के लिए अधिग्रहण करना आसान बनाया जा रहा है। साथ ही इनके संघर्षों का दमन भी किया गया है।  
     पूंजी द्वारा प्राकृतिक संसाधनों की लूट को जारी रखने के लिए आदिवासियों को 'जल-जंगल-जमीन' के परंपरागत अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। लाखों आदिवासियों को जंगलों से खदेड़ने का हुक्म सुनाया जा रहा है। वनाधिकार कानून व ग्राम सभा के अधिकारों को सीमित किया जा रहा है।
     नौजवानों को दो करोड़ रोजगार प्रतिवर्ष देने का नारा भी जुमला ही साबित हुआ है। हाल यह है कि आज पिछले 45 साल में देश में सबसे ज्यादा बेरोजगारी है। अब इस सम्बन्ध में आंकड़े जारी करना भी सरकार ने बन्द कर दिया है। "स्टार्ट अप" "मेक इन इंडिया" का आलम यह है कि खुद सरकार ने इसके बारे में बात करनी बन्द कर दी है। देश के मुखिया के हिसाब से इन्होंने पकोड़े बेचने का रोज़गार तो नौजवानों को दिया ही है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने तो एक ही झटके में सवा लाख समायोजित शिक्षा मित्रों को नौकरी से बाहर कर दिया जिसके चलते सदमे व आत्महत्या से ढेरों की मौत हो गयी। इसके साथ ही शिक्षा प्रेरकों, लोक कल्याण मित्रों की नौकरियां भी खत्म कर दी गयी। लाखों रोज़गार सेवकों को तो न्यूनतम मानदेय भी कई-कई माह तक नहीं मिलता है।
    इन वर्षों में सरकारी संस्थानों में संविदा व ठेकाकरण बढ़ा है। शिक्षकों/कर्मचारियों की पुरानी पेंशन की मांग को सरकार ने ठुकरा कर इन्हें नयी पेंशन योजना लेने को बाध्य किया है। आशा, आंगनबाड़ी, भोजनमाता, संगिनी आदि की कर्मचारी का दर्जा देने की मांग को अनसुनी कर बहुत ही कम मानदेय पर रखकर उनका शोषण किया जा रहा है।
     हिन्दू फासीवादी अपनी जहनियत में घोर महिला विरोधी हैं, घोर जातिवादी हैं तथा घोर मुस्लिम विरोधी हैं। इनके राज में महिलाओं व बच्चियों के खिलाफ यौन हिंसा व बलात्कार की घटनाएं बढ़़ी हैं। 2016 में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में 2.6 प्रतिशत की वृद्धि हुयी है। 7 वर्षीया आसिफा, 2.5 वर्षीया ट्वींकल, उन्नाव व शाहजहांपुर की घटनाओं ने यह साफ दिखाया है कि इन्होंने अपने राज में यौन हिंसा व हत्या के आरोपियों के मसले को भी ध्रूवीकरण का औजार बनाया है। आरोपियों को बचाने के लिए इन्होंने "हिन्दू एकता" का नारा गढ़ लिया। आरोपी कुलदीप सिंह सेंगर, नित्यानंद, चिन्मयानंद के मसले से समझा जा सकता है कि महिलाओं पर अत्याचार की क्या स्थिति है। मुजफ्फरपुर, देवरिया आदि जगहों पर बालिका गृहों में बच्चियों के साथ यौन-उत्पीड़न की घटनाओं में भी इनके लोगों पर संलिप्तता के आरोप लगे। चर्चित हुए '#मी-टू'अभियान ने भी संघ परिवार की महिला विरोधी सोच को जाहिर किया है। सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश के मसले पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा नवम्बर 19 में इस मसले को 7 जजों की बेंच को भेजना दिखलाता है कि संघी फासीवादियों के प्रभाव में अदालत महिला विरोधी धार्मिक परंपराओं के आगे समर्पण कर रही है।
     बीते वर्षो में दलित उत्पीड़न की घटनाओं में भी तेजी आयी है। ऊना में दलितों की पिटाई, रोहित वेमुला व पायल तड़वी की सांस्थानिक हत्या, सहारनपुर में दलित बस्ती को निशाना बनाया जाना आदि घटनाएं हिंदू फासीवादियों के मेहनतकश दलितों पर बढ़ते हमले की ही अभिव्यक्ति है।
    सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त मध्यम वर्ग की ऊंची जातियों के लोग भी संघियों के सत्ता में आने से मुखर होकर अपनी घोर जातिवादी सोच का परिचय दे रहे हैं। संघ परिवार की शह पर इसके चलते जातिवाद के खिलाफ आंदोलनों के अगुवा व प्रतीक पेरियार, फूले व रविदास जो कि दलितों के लिए प्रेरक व प्रतीक हैं इन पर भी हमला हो रहा है।  
     संघी सरकार ने इसी घृणित सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त होकर एक ओर आरक्षण तो दूसरी ओर एस.सी./एस.टी.एक्ट पर भी हमला बोला। इसने आरक्षण को कमजोर करने के लिए 13 प्वाइंट रोस्टर प्रणाली तथा आर्थिक आधार पर 10 % आरक्षण का प्रावधान किया। कोर्ट के जरिये एस.सी./एस.टी. एक्ट को कमजोर किया गया हालांकि 2 अप्रैल के दलित संगठनों के देशव्यापी प्रदर्शन के बाद इस बदलाव को वापस ले लिया गया। भीमा कोरेगांव में दलित संगठनों द्वारा मनाए जाने वाले कार्यक्रम का भी साजिशन दमन किया गया। दलित सवाल पर संघ/भाजपा की दुविधा यह है कि ये एक ओर चुनावी मजबूरी व साम्प्रदायिक गोलबंदी के लिए मुसलमानों के खिलाफ दलितों का इस्तेमाल करते हैं तो वहीं दूसरी ओर इसी घृणित जातिवादी सोच के चलते ये मेहनतकश दलितों के भी ख़िलाफ हैं।
      मेहनतकश दलितों पर होती हिंसा के खिलाफ ब.स.पा. व अन्य दलित पार्टियां रस्म अदायगी कर रही हैं या कुछ भा.ज.पा. के गोद में बैठ गयी हैं। ये घोर अवसरवादी हैं। ये बेनकाब हो रही हैं। इस स्थिति में दलित समुदाय के बीच से एक नया उभार पैदा हो चुका है। यह भी सत्ता में हिस्सेदारी का ही ख्वाब देखता है। सही मायने में मेहनतकश दलित समुदाय की समस्या पर आवाज बुलन्द करने वाले इन लोगों को क्रांतिकारी धारा की ओर आना होगा। अन्यथा इनका हश्र भी ब.स.पा. आदि की तरह ही होने को अभिशप्त है। इसी उभार के दबाव में दलितों को झट-पट अपने साथ लाने की चाहत में कई वामपंथी संगठन/पार्टियां भी  "लाल सलाम-नीला सलाम" का गलत नारा पेश कर रहे हैं।
     अल्पसंख्यकों की राजनीति करने वाले भी लगभग इसी तरह के हैं। फासीवादी राजनीति के बढ़ने के साथ-साथ मुस्लिमों में मुस्लिम कट्टरपंथियों का प्रभाव बढ़ रहा है। इसके चलते भी यहां अलगाव ज्यादा बढ़ रहा है। यह स्थिति हिन्दू फासीवादियों के लिए लाभदायक है। एक प्रकार से हिन्दू फासीवादी दोयम दर्जे की स्थिति में इन्हें धकेलने में कामयाब रहे हैं। गरीब/मेहनतकश मुस्लिमों व अन्य हिस्सों को वर्गीय आधार पर गोलबंद करने तथा साम्प्रदायिकता व फासीवाद के खिलाफ एकजुट करने की जरूरत है।
      आज सभी सम्बन्ध पूंजी से संचालित हो रहे हैं। बाजार की अदृश्य ताकत व मार सर्वव्यापी हो चुकी है। इसका एक नतीजा यह है कि मानवीय संबंधों में सरोकार की भावना, संवेदनशीलता खत्म होती जा रही है। इसके चलते आज पूरे भारतीय समाज में तनाव, जीवन की असुरक्षा, अलगाव व अवसाद और आत्मिक संकट अपने चरम पर है। इसके चलते नशाखोरी, यौन हिंसा, आत्महत्या व अन्य मानसिक बीमारियां बढ़ती जा रही हैं। 
     इन बीते 4 वर्षों में एकाधिकारी पूंजी का वर्चस्व हर ओर तेजी से बढ़ा है। इस दौर में एक ओर नक्सलवाद के नाम पर आदिवासियों को खनिज संसाधनों से भरपूर जंगलों से खदेड़ने के लिए अभियान तेज़ी से आयोजित हो रहे हैं तो दूसरी ओर "अरबन नक्सल" का एक हौवा खड़ा कर जनसंघर्षों से निपटने की तैयारी हो चुकी है। आतंकवाद या हिस्ट्रीशीटर के नाम पर निर्दोष मुस्लिमों का एनकाउंटर होने की घटनाएं बढ़ चुकी हैं।
      सरकार व संघ परिवार ने अपने आलोचकों, असहमति जताने वालों का मीडिया ट्रायल करवाना, मीडिया के जरिये इनका चरित्र हनन करवाना तथा इन्हें 'देश विरोधी' के रूप प्रचारित करने की अपनी घृणित चाल को अब आम बना दिया है। विरोधियों पर 'राजद्रोह' आदि के फर्जी मुकदमे दर्ज किये जा रहे हैं। इन्हें तरह-तरह की धमकी दी जाती है। इन पर हमले होते हैं। इनकी हत्या की कोशिशें होती हैं। दाभोलकर, गोबिन्द पान्सरे, एम.एम.कलबुर्गी के बाद गौरी लंकेश की सरेआम हत्या इसी बात को बताती है। इतिहासकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों, दलित बुद्धिजीवियों तथा प्रगतिशील जनवादी ताकतों पर 'अर्बन नक्सल' का ठप्पा लगाकर फर्जी मुकदमों में जेलों में ठूंस दिया जाता है। इन्होंने 'अघोषित आपात काल' सी स्थिति पूरे देश में बना दी है। हालांकि अभी फासीवादी निजाम कायम नहीं हुआ है मगर ये घटनाएं स्पष्टतः फासीवाद की ओर बढ़ने को दिखलाती हैं।
     फर्जी एनकाउंटर का चलन विशेषकर उ. प्र. में अब आम होता जा रहा हैं। यह भी फासीवादी आंदोलन को आगे बढाने में मददगार है। उ.प्र.पुलिस द्वारा ही पिछले वर्षों में 1 हजार से ज्यादा एनकाउन्टर किये गये। यह पूंजीवादी लोकतंत्र की स्थापित मान्यताओं व संवैधानिक कानूनी प्रकिया को ध्वस्त करना है। यू.पी. अब इनकी 'हिन्दू फासीवाद' की नयी प्रयोगशाला बन चुका है।
     यही नही! मोदी सरकार ने जनआंदोलनों को कुचलने के उद्देश्य से एन.आई.ए. का कार्यक्षेत्र बढ़ा दिया है साथ ही यू.ए.पी.ए. में भी संशोधन कर दिये हैं। इसके तहत अब सरकार किसी भी व्यक्ति को मात्र शक के आधार पर आतंकी घोषित कर सकती है और उसकी संपत्ति भी जब्त की जा सकती है जबकि एन.आई.ए. को विदेशों में जांच व गिरफ्तारी का अधिकार होगा।          
    इसी के साथ आधार परियोजना का कभी विरोध करने वाली भाजपा इसे तेजी से व्यापक क्षेत्रों में लागू करती गयी है। इसे असंवैधानिक तरीके से 'धन बिल' के रूप में पारित कराया गया। अपराध रोकने के नाम पर डी.एन.ए. बिल के तहत देश के अधिकांश लोगों का डी.एन.ए. एकत्रित करने व डी.एन.ए. बैंक बनाने का प्रावधान किया जा रहा है। यह खतरनाक है जो व्यक्ति की निजता का उल्लंघन करने के साथ-साथ एक समूचा निगरानी तंत्र भी निर्मित करता है। इससे विरोधियों पर नजर रखना, उन्हें चिन्हित करना व उनका दमन करना बेहद आसान हो जायेगा।
     फासीवादी ताकतें पूंजीवादी लोकतंत्र की ताकतों व संस्थानों को हर जगह कमजोर व प्रतिस्थापित कर रही हैं। इसके चलते इनके व राज्य की संस्थाओं के बीच अंतरविरोध भी साफ दिखा है। गत वर्षों में केंद्र सरकार बनाम सी.बी.आई., सरकार बनाम रिजर्व बैंक, सरकार बनाम सुप्रीम कोर्ट एवं सरकार बनाम एन.एस.एस.ओ. के रूप में हुए विवादों में यह अन्तर्विरोध दिखा जहां फासीवादी ताकतें अपना शिकंजा कायम करने में अंततः सफल रही। इसीकी अभिव्यक्ति यह थी कि भारतीय सांख्यिकी आयोग (एन.एस.एस.ओ.) के तीन में से दो गैर सरकारी सदस्यों ने बेरोजगारी के सही आंकड़े जारी न करने के विरोध में इस्तीफा दे दिया। सुप्रीम कोर्ट के कोलेजियम के 4 जजों की प्रेस कांफ्रेंस मोदी सरकार की शह पर काम कर रहे मुख्य न्यायाधीश की निरंकुशता व मनमर्जी के विरोध में हुई।
     मोदी राज में पूंजीवादी मीडिया पूरी तरह से फासीवादी ताकतों का प्रचार तंत्र बन चुका है। हालांकि ऐसा एकाधिकारी पूंजी के समर्थन से ही हो रहा है। सोशल मीडिया पर भी संघ/भाजपा का कब्जा बना हुआ है। इनके आई.टी. सेल अफवाह फैलाने, झूठ व अर्धसत्य फैलाने के फासीवादी एजेंडे में लगे हुए हैं। 
     दोबारा सत्ता पर आते ही मोदी सरकार ने अर्थव्यवस्था की पस्त पड़ती हालत के बीच फासीवादी एजेंडे को नई धार दे दी है। इस दौरान विभिन्न राष्ट्रीयताओं का दमन ज्यादा तेज हुआ है विशेषकर कश्मीर में। "वॄहत्तर व अखंड भारत" के अपने घृणित एजेण्डे के तहत एक ओर इन्होंने नागरिकता कानून (संशोधन) बिल, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एन.आर.सी.) लागू किया है। इसके तहत इन्होंने मुस्लिम व बांग्लादेशी बराबर घुसपैठिया का अपना फासीवादी एजेंडा देशव्यापी कर दिया है। असम में पहले 40 लाख तो अगली प्रक्रिया में 19 लाख लोग "नागरिकताविहीन" "देशविहीन" हो चुके हैं। दूसरी ओर कश्मीर में इन्होंने अनु. 370 व 35 ए. को खत्म करने का काम भी असंवैधानिक तरीके से कर डाला है। इस प्रकार 1947 से ही "विलय समझौते" को कमजोर करते हुए छल-बल से कश्मीर को भारत में मिलाने की साजिश की भारतीय शासकों की प्रतिनिधि पार्टी कांग्रेस ने जो शुरूआत कर दी थी वह 70 सालों में विभिन्न पड़ावों से गुज़रते हुए 2019 में पूरी हो चुकी है। कश्मीर में अभी भी कर्फ्यू है। अवाम बेहद दुख तकलीफों में है। भयानक असुरक्षा व अलगाव में है। कश्मीरी अवाम का संघर्ष दमन के इन हथकण्डों से समाप्त नहीं होगा फ़िलहाल जम्मूकश्मीर की स्थिति फिलिस्तीन सी होने की ही संभावना ज्यादा है।
     भारतीय शासक अपने कमजोर पड़ोसियों पर भी धौंसपट्टी के रिश्ते कायम करने की निरंतर कोशिश में हैं। नेपाल, भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश व मालदीव में मोदी सरकार के बढ़ते हस्तक्षेप ने इन मुल्कों को चीन की ओर धकेला है जिससे भारतीय शासकों की स्थिति इन मुल्कों में कमजोर हुई है। मोदी सरकार देश के भीतर चीन व पाकिस्तान का खौफ पैदा कर अन्धराष्ट्रवादी उन्माद पैदा कर रही है। "सर्जीकल स्ट्राइक", "पुलवामा हमला", "डोकलाम" जैसी घटनाएं इसी उन्माद को फैलाने का जरिया रही हैं। इस अन्धराष्ट्रवादी उन्माद पर सवार होकर एक ओर ये अपना फासीवादी आंदोलन आगे बढ़ा रहे हैं। दूसरी तरफ जनविरोधी पूंजीपरस्त नीतियों को तेजी से लागू कर रहे हैं।
    शरणार्थी समस्या पर विशेषकर मुस्लिमों के प्रति जो घृणित रुख यूरोप व अमेरिका की नवफासीवादी व दक्षिणपंथी ताकतों का है वही रुख हिन्दू फासीवादियों का भी है। वर्मा के बौद्ध फासीवादियों के भयानक हमले के चलते लाखों मुस्लिम रोहिंग्या शरणार्थियों के रूप में वर्मा से भागने को मजबूर हुए। इन्होंने शरण पाने के लिए भारत का रुख किया तो हिन्दू फासीवादी ताकतों ने पूरे देश में आतंकी के तौर इनकी छवि गढ़ने एवं देश में इन्हें न घुसने देने की बात की।
     इस बीच भारत की विदेश नीति में अमेरिकापरस्ती बढ़ती गयी है। दुनिया के कई मुल्कों को तबाह करने वाले अमेरिका तथा इसके लठैत इजरायल से भारत की निकटता बढ़ी है। अमेरिका की धमकी पर झुकना इनके "राष्ट्रवाद" की पोल खोल देता है जब ईरान से यह अमेरिकी दबाव में तेल का आयात शून्य पर ले आने का वायदा करते हैं। कमजोर मुल्कों के पक्ष में खड़े होने व इनका समर्थन करने का भारत के शासकों का रुख बेहद कमजोर हो चुका है। भारत सरकार ने अपने बन्दरगाहों व सैन्य अड्डों के इस्तेमाल की अनुमति अमेरिकी सेना को दे दी है। भारतीय शासक अमेरिकी साम्राज्यवाद के आशीर्वाद से दक्षिण एशिया में इजरायल जैसी स्थिति चाहते है।
     देश में इन बढ़ते फासीवादी हमलों तथा नये आर्थिक सुधारों की तेज गति ने असन्तोष व प्रतिरोध को भी आगे बढ़ाया है। पिछले 4 वर्षों में मजदूरों, किसानों, कर्मचारियों, छात्रों-नौजवानों, महिलाओं, आदिवासियों ने शासक वर्ग की जन विरोधी नीतियों, समाज के फासीवादीकरण व जनवादी अधिकारों के छीने जाने के खिलाफ संघर्ष किया है। हालांकि इस संघर्ष का अधिकांश अभी तात्कालिक मांगों के इर्दगिर्द ही है फिर भी क्षमता भर प्रतिरोध हुआ है।
    मजदूरों ने शोषण-उत्पीड़न-दमन व श्रम कानूनों में मजदूर विरोधी परिवर्तनों के खिलाफ लगातार संघर्ष किया है। औद्योगिक संस्थानों में यूनियन बनाने तथा छंटनी, तालाबंदी के खिलाफ मजदूर सड़कों पर उतरे। गुड़गांव (हरियाणा) में मारूति व बेलसोनिका; राजस्थान में डायकिन; उत्तराखण्ड में इन्टरार्क, डेल्टा, माइक्रोमेक्स व प्रिकॉल आदि के मजदूरों ने परंपरागत ट्रेड यूनियन आन्दोलन से अलग होकर जुझारू संघर्ष किये। भविष्य निधि कानून में मोदी सरकार द्वारा किये गए बदलाव के खिलाफ बैंगलोर में गारमेंट क्षेत्र की महिला मजदूरों के जुझारू आन्दोलन ने मोदी सरकार को पीछे हटने को बाध्य कर दिया था।
     किसानों ने भी कर्जमाफी, फसलों के उचित दाम, जमीन अधिग्रहण के खिलाफ तथा स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों को लागू कराने आदि की मांगों के साथ आन्दोलन किया। महाराष्ट्र के किसानों का लॉंगमार्च, तमिलनाडु के किसानों का मानव मुंडों के साथ दिल्ली में प्रदर्शन, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश आदि में किसानों का जुझारू आन्दोलन हुआ। मंदसौर में किसानों पर गोलियां भी चली जिसमें कुछ किसान मारे गये। हालांकि ये संघर्ष धनी किसानों के नेतृत्व में इनके एजेंडे पर अधिक रहा है। धनी किसान छोटे-मझौले किसानों की संकटग्रस्तता, आक्रोश व असन्तोष को अपने पक्ष में भुनाने में सफल हो जा रहे हैं। ये किसानों के संघर्ष का ही नतीजा था कि 'जमीन अधिग्रहण कानून' में संशोधन के फैसले को मोदी सरकार को वापस लेना पड़ा।
    तूतीकोरिन में स्टरलाइट कंपनी के विरूद्ध वहां के नागरिकों के लंबे जुझारू आन्दोलन में जुलूस के दौरान पुलिस ने लोगों पर गोलियां चला कर 14 लोगों की हत्या कर दी। इसके खिलाफ पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हुए। इसके अलावा बंगाल का भांगर आन्दोलन, झारखण्ड का पत्थलगढ़ी आन्दोलन एवं केरल के सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश हेतु मध्ययुगीन सामन्ती मान्यताओं एवं फासीवादी ताकतों के विरूद्ध महिलाओं का जुझारू आन्दोलन भी नज़ीर बने।
     प्राकृतिक संसाधनों की लूट व जल-जंगल-जमीन से बेदखली के खिलाफ आदिवासियों ने भी जुझारू आन्दोलन किये हैं। आदिवासियों की बेदखली के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ हुए आन्दोलन से तात्कालिक तौर पर शासकों को पीछे हटना पड़ा।
     चेन्नई से लेकर जे.एन.यू., बनारस हिंदू विश्वविद्यालय तक कई विश्वविद्यालयों में फासीवादी ताक़तों ने यहां के जनवादी माहौल पर हमला बोल अपने फासीवादी एजेंडे को लागू करने की कोशिश की। रोहित वेमुला, नजीब जैसे फासीवाद विरोधी छात्र इनके हमलों के शिकार बने। इसके जवाब में छात्रों ने हर स्तर पर फासीवादी एजेंडे का तीखा विरोध भी किया है और इनके खिलाफ जुझारू संघर्ष किये है। इसमें कुछ स्थानीय मामलों में जीत भी हासिल की है। बी.एच.यू. की छात्राओं का संघर्ष भी इसमें एक मिसाल है।
    एस.एस.सी. (स्टाफ सिलेक्शन कमीशन) में धांधली के खिलाफ, मुंबई, बिहार व देहरादून में बेरोजगारी के खिलाफ तथा हाल में पिथौरागढ़ विश्वविद्यालय में पुस्तकों व शिक्षकों के लिए हुए आन्दोलनों ने छात्रों-नौजवानों में पनप रहे आक्रोश को व्यक्त किया।
    इसके अलावा शिक्षा के निजीकरण, फीसवृद्धि, सीट कटौती, विश्वविद्यालय में 13 प्वाइन्ट रोस्टर लागू करने तथा इतिहास व विज्ञान को भगवा रंग में रंगने के विरोध में छात्रों ने संघर्ष किया। जे.एन.यू. एक बार फिर संघर्ष ला गढ़ बना है भारी फीस वृद्धि एवं ड्रेस कोड के खिलाफ छात्रों के जुझारू संघर्ष ने मोदी सरकार को पीछे हटने को बाध्य कर दिया। इसी प्रकार आयुष छात्रों का मेडिकल फीस में भारी वृद्धि के खिलाफ देहरादून (उत्तराखंड) में संघर्ष जारी है। इसके साथ-साथ प्रस्तावित नई शिक्षा नीति 2019 के खिलाफ भी अलग अलग विश्वविद्यालयों में छात्र संघर्षरत हैं। छात्रों-नौजवानों के इन आन्दोलनों ने कई मामलों पर सरकार को पीछे हटने को बाध्य किया।
    सरकारी संस्थानों में ठेकाकरण-संविदाकरण के खिलाफ तथा वेतन विसंगतियों को लेकर आन्दोलन हुए। शिक्षकों व कर्मचारियों का नयी पेंशन स्कीम के खिलाफ काफी लम्बा आन्दोलन हुआ। शिक्षामित्रों, भोजनमाताओं, आशा, आंगनबाड़ी व अन्य संविदा कर्मियों ने भी अपनी तात्कालिक मांगों के लिए संघर्ष किया जो परोक्ष तौर पर सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ लक्षित थे।
    इसके अलावा दलितों/अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमलों, महिलाओं व बच्चियों के यौन उत्पीड़न के खिलाफ देश भर में प्रदर्शन हुए। दमनकारी कानूनों को और ज्यादा खतरनाक बनाये जाने, जनता के जनवादी अधिकारों व उसकी जनवादी आकांक्षाओं को कुचले जाने के खिलाफ एवं पूंजीवादी व फासीवादी ताकतों द्वारा किये जा रहे दमन-उत्पीड़न व शोषण के खिलाफ देश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए। 
    आज हमारे देश में फासीवाद का खतरा पहले किसी भी समय से सबसे ज्यादा है। फासीवादी ताक़तें आज सता के केंद्रीकरण को और भी तेजी से आगे बढ़ा रही हैं। कैबिनेट, विपक्ष व मंत्रियों की स्थिति बेहद कमजोर हो चुकी है। मोदी-शाह-डोभाल व मुट्ठी भर नौकरशाहों के हाथों यह केंद्रीकरण हो रहा है। इस प्रकार एक ओर एकाधिकारी पूंजी समूचे समाज व वर्गों पर अपने निरंकुश प्रभुत्व की ओर इनके जरिये आगे बढ़ रही है दूसरी ओर फासीवादी आन्दोलन अन्धराष्ट्रवाद तथा मुस्लिमों के खिलाफ नफरत के प्रसार के जरिये आगे बढ़ रहा है। यह एकाधिकारी पूंजी के हित में कल्याणकारी राज्य के खात्मे की ओर बढ़ रहा है जैसा कि अब संघी खुलेआम "कल्याणकारी राज्य" के खिलाफ बातें करते हुए "आत्मनिर्भरता' के नाम पर जनता को पूंजी की खुली लूट का शिकार बनने को मजबूर करने की ओर आगे बढ़ रहे हैं। ऐसे में जरूरी है कि धैर्यपूर्वक जनता के अलग-अलग हिस्सों में शिद्दत से काम किया जाय। दलितों-अल्पसंख्यकों पर हो रहे हर हमले का विरोध किया जाय तथा इनकी लामबंदी की जाय।    
     मजदूरों/मेहनतकशों के हर न्यायपूर्ण संघर्ष के पक्ष में शासकों द्वारा किये जा रहे दमन-उत्पीड़न के खिलाफ, जनवादी अधिकारों को सीमित किए जाने, मेहनतकश जनता की खुफिया निगरानी व दमनकारी कानूनों को बनाए जाने के खिलाफ जनता को एकजुट संघर्ष खड़ा करना वक़्त की जरूरत है।
     इन कामों को करने के लिए हमें पूंजीवाद, फासीवाद का भंडाफोड़ करते हुए इनके हर हमले का मुंहतोड़ जवाब देना होगा। मेहनतकश जनता के बीच अपने कामों को धैर्यपूर्वक करते हुए उन्हें फासीवादियों की पांतों से क्रांतिकारी पांतों में लाना होगा। स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर पूंजीवाद-साम्राज्यवाद व फासीवाद के खिलाफ सभी क्रांतिकारी, जनवादी व प्रगतिशील ताकतों तथा जनता के विभिन्न समूहों के साथ मोर्चाबंदी करनी होगी जिसकी दिशा समाजवाद की ओर हो।                

क्रांतिकारी लोक अधिकार का सातवां सम्मेलन सम्पन्न

              

                                        
                     क्रांतिकारी लोक अधिकार का सातवां सम्मेलन सम्पन्न
     

          क्रांतिकारी लोक अधिकार का सातवां सम्मेलन 16 -17 नवम्बर को सम्प्पन हुआ। सम्मेलन में उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश के अलग अलग हिस्सों से प्रतिनिधियों ने इस सम्मेलन में भागीदारी की। सम्मेलन में पहले दिन राजनीतिक सांगठनिक रिपोर्ट पर चर्चा की गई। यहां राजनीतिक रिपोर्ट पर देश और दुनिया की अर्थव्यवस्था राजनीति व सामाजिक स्थिति पर चर्चा की गई। देश व दुनिया भर में घोर जनविरोधी आर्थिक नीतियों व जनविरोधी फासीवादी राजनीति पर गहरी चिंता व्यक्त की गई। रिपोर्ट में बताया गया कि साम्राज्यवादी मुल्कों के बीच बढ़ते अंतर्विरोध, पूंजीवादी साम्राज्यवादी लूट खसोट, इसकी आक्रमकता, तीसरी दुनिया के पूंजीवादी मुल्कों के शासकों का इनके साथ सांठगांठ ने स्थिति को जटिल बना दिया है इसके चलते एक ओर बड़े स्तर पर शरणार्थी संकट तो दूसरी ओर इसने सामाजिक संकट को गहरा दिया है। दुनिया के कई हिस्सों में उमड़ते जंससंघर्षों का हवाला देते हुए बताया गया कि फिलहाल क्रांतिकारी राजनीति बेहद कमजोर होने के चलते जंससंघर्षों  की सीमा बनी हुई है। वही सांगठनिक रिपोर्ट में अपनी कमियों को चिन्हित करते हुए इन्हें दूर करने के सम्बन्ध में कार्यदिशा प्रस्तुत की गई। सम्मेलन के अंतिम दिन देश के भीतर घटे तात्कालिक जनविरोधी हमलों व रुझानों पर प्रस्ताव पारित किए गए। शहीदों को श्रद्धांजलि, भीड़ हिंसा के सम्बन्ध में, कश्मीर से 370 को निष्प्रभावी किये जाने, फासीवादी हमलों के खिलाफ,  मज़दूर विरोधी वेज लेबर कोड बिल पर, यू.ए.पी.ए. में संशोधन ,  एन.आर.सी प्रक्रिया को रद्द किए जाने, सुप्रीम कोर्ट के बाबरी मस्जिद पर आए फैसले के सबन्ध में प्रस्ताव पारित हुए। इसके अलावा चुनाव हुए। नए पदाधिकारियों का चुनाव किया गया।
       इसके बाद सम्मेलन का खुला सत्र सम्पन्न हुआ। इसमें विभिन्न्न संगठनों के प्रतिनिधियों, आम जनता के बीच से लोगों ने शिरकत की।
      सम्मेलन में वरिष्ठ नागरिक गुलशन सूरी, बीमा कर्मचारी संघ से मनोज गुप्ता, बजाज मोटर्स कर्मकार यूनियन से कुंवर सिंह कंडारी, इंट्रार्क मज़दूर संगठन से सौरभ कुमार, भोजन माता संगठन से चम्पा, अधिवक्ता मो. यूसुफ, जनसत्ता से पत्रकार फलाश विश्वाश, मज़दूर सहयोग केंद्र से मुकुल, गुजरात अम्बुजा से कर्मकार यूनियन से रामजी , इंकलाबी मज़दूर केंद्र से खीमानंद, परिवर्तनकामी छात्र संगठन से महेंद्र, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र से रजनी, टेम्पो चालक यूनियन से कृष्णपाल, ठेका मज़दूर कल्याण परिषद से अभिलाख आदि ने बातें रखी। इसके अलावा माइक्रोमैक्स से नंदन सिंह, नेस्ले से महेंद्र सिंह, रिद्धि सिद्धि से कार्यकारिणी सदस्य जोशी जी, यजाकी से धर्मेंद्र तथा पीपल्स फ्रंट से ए पी भारती व आर डी एफ से कुंदन भी इस खुले सत्र में मौजूद रहे। समयाभाव के चलते कई साथी खुले सत्र को सम्बोधित नही कर सके।
   सभी वक्ताओं ने आज देश में रहे आर्थिक संकट, मज़दूरों-कर्मचारियों की छंटनी, बढ़ती बेरोज़गारी , बढ़ती महंगाई पर पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की साथ ही देश में सरकार द्वारा जनता के अधिकारों को कमजोर करने, जनता के अलग अलग हिस्सों के आंदोलनों को बदनाम करने व इनका दमन करने, जनता की निगरानी किये जाने, जनता के जीवन स्तर को और नीचे गिरने घोर जनविरोधी व पूंजीपरस्त नीतियों को लागू किये जाने के विरोध में अपना आक्रोश व्यक्त किया। हिन्दू- मुस्लिम, युद्ध का उन्माद पैदा कर मेहनकश जनता को बांटने उनके बीच गहरी नफरत पैदा किये जाने पर भी गहरी चिंता व्यक्त की इसे आम अवाम के खिलाफ खतरनाक कदम बताया।
        इसके बाद अंत में सत्यनारायण धर्मशाला से स्टेडियम तक सांकेतिक जुलूस कार्यक्रम किया गया। इसी के साथ संगठन का सातवां सम्मेलन जोश-ओ-खरोश व जनता जनवादी अधिकारों के लिए गोलबंद करने के दृढ़ संकल्पबद्धता के सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।
      
                                        
                                           

Tuesday, 12 November 2019

फासीवादी हिदू राष्ट्र की ओर बढ़ते कदम

फासीवादी हिदू राष्ट्र की ओर बढ़ते कदम
         
       अंततः बाबरी मस्जिद वाली कथित विवादित जमीन का मालिकाना न्यायालय ने हिन्दू पक्ष को देने के सम्बन्ध में अपना फैसला सार्वजनिक किया। 9 नवम्बर का दिन इस प्रकार फ़ासीवादियों के आगे न्यायिक संस्था के समर्पण का ऐतिहासिक दिन भी बन गया। यह फैसला अप्रत्याशित नहीं था पिछले साल भर से न्यायिक संस्था के रुख से यह साफ होने लगा था कि फैसला तथ्यों, तर्कों व संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर नहीं बल्कि यह आस्था के आधार पर होगा।
       न्यायालय द्वारा यह माना गया कि बाबरी मस्जिद ध्वंस होना ग़ैरकानूनी था गलत था इसी प्रकार यह भी कि 1949 में मस्जिद परिसर में मूर्तियां रखना गलत था, यह भी कहा गया कि मस्जिद के नीचे कुछ तो था मगर वहां मंदिर नहीं था और मस्जिद 16 वी सदी से बनी हुई थी। यह कहा गया कि अयोध्या में राम के जन्म को सभी हिन्दू मानते हैं यहां उनकी आस्था है हालांकि कोर्ट आस्था से नहीं चलता। मगर फिर फैसला आस्था के आधार पर दे दिया गया जिसमें 2.77 एकड़ जमीन हिन्दू पक्ष को दे दी गई। कहा गया कि सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड जमीन पर अपना मालिकाना हक को साबित नहीं कर सका इसे साबित करने के लिए दो- तीन सदी पुराने सबूत मांगे गये। सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड द्वारा प्रस्तुत राजस्व अभिलेख व गेजेट को खारिज कर दिया गया। हिन्दू पक्ष पर जमीन स्वामित्व से सम्बंधित कोई भी सबूत की मांग नहीं की गई।
      न्यायालय ने सरकार को मंदिर बनाने के सम्बन्ध में एक ट्रस्ट के गठन व इसमें निर्मोही अखाड़े को उचित प्रतिनिधित्व निर्देश दिया गया। मुस्लिम पक्ष के लिए 5 एकड़ जमीन अयोध्या में ही कहीं भी राज्य सरकार या केंद्र सरकार किसी भी द्वारा देने का निर्देश दिया गया। इस प्रकार सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के पास एक दौर में जो 67 एकड़ जमीन थी उसके अधिकांश का अधिग्रहण सरकार द्वारा 1993 में कर लिया गया था इसके बाद 2.77 एकड़ जमीन में से मात्र एक तिहाई  हिस्सा मुस्लिम पक्ष को देने का फैसला हुआ था अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने यह जमीन भी जो वक़्फ़ बोर्ड के पास थी जिसमें बाबरी मस्जिद थी पूरी तरह से छीन ली।
        इस फैसले से पहले संघियों ने कोर्ट के फैसला जो कुछ भी हो उसे स्वीकार किये जाने की खोखली बातें की थी। यह उन्हें पहले से ही भान था कि फैसला लगभग इसी ढंग का होगा। इसीलिए संघपरिवार के लोग मुस्लिम समुदाय से संबंधित संगठनों, बुद्धिजीवियों के बीच जाकर इस पक्ष में सहमत कराने व अपने पक्ष में सहमत कराने में जुटे थे। अब फैसला आ जाने के बाद 'एकजुट होने' 'मिलजुलकर  रहने', 'न किसी की जीत न किसी की हार होने' की पाखंडी, लफ़्फ़ाजीपूर्ण बातें कर रहे हैं। जबकि स्पष्टत: यह फ़ासीवादी ताकतों की जीत है। मौजूदा आर्थिक संकट के लिए तात्कालिक तौर पर जिम्मेदार व आम अवाम के जीवन को ज्यादा गहन संकट की ओर धकेलने वाली फ़ासीवादी ताकतें बाबरी मस्जिद जमीन के सम्बन्ध में मौजूदा फैसले से और ज्यादा ध्रुवीकरण करने की दिशा में कामयाब हुए हैं।
        जहां तक विपक्षियों का सवाल है सभी खुद को बहुसंख्यक आबादी यानी हिन्दू आबादी के पक्षधर दिखाने के खेल में व्यस्त हैं कॉंग्रेस तो खुद ही वर्तमान स्थिति के लिए जिम्मेदार है। सपा, बसपा, आप आदि सभी फैसले का स्वागत कर रहे है। इममें से कुछ तो यह भी कह रहे है कि कोर्ट के फैसले ने संघ परिवार से उनका मुद्दा छीन लिया है। ऐसा होने की एक वजह यह भी है कि ये भी जनवादी नही बल्कि भाजपा की ही तरह भ्रष्ट है। इन सभी को नरम हिंदुत्व को साथ लेकर चलने से कोई परहेज नही रहा है। सुधारवादी वामपंथी पार्टियां भी इस मसले पर 'धर्मनिरपेक्ष' व सही स्थिति लेने से कतरा रही हैं।
        कोर्ट का यह फैसला भले ही यह कहता है कि मस्जिद मंदिर तोड़ कर नहीं बनाई गई है। लेकिन इससे कोई विशेष फर्क नही पड़ता। क्योंकि फैसला संघियों के पक्ष में है इसे वह अपनी जीत के रूप में व हिंदुओं की जीत के रूप में दिखाने में कामयाब हैं। इनका यह घृणित मन्तव्य पूरा हुआ। हिंदुओं विशेषकर सवर्ण लोगों के दिमाग में लंबे वक्त से जो जहर संघ परिवार व इससे ग्रस्त मीडिया ने भरा है वह यह कि देश में कांग्रेस के दौर में सब कुछ मुस्लिमों के हिसाब से तय होता रहा है हिन्दू लोग सदियों से व कांग्रेस के दौर में उपेक्षित रहे है उत्पीड़ित रहे हैं।हिंदुओं के साथ भारी अन्याय हुआ है। इसे संघी शब्दावली में 'मुस्लिमों का तुष्टिकरण' कहा जाता है। इसलिए एक ऐसी घृणित व फासीवादी मनोदशा निर्मित कर दी गई है जिसका मकसद मुस्लिमों को उत्पीड़ित, अधिकारहीनता की स्थिति में धकेल देना है। हज सब्सिडी, तीन तलाक, एक देश में दो कानून, कश्मीर, बांलादेशी घुसपैठिये आदि आदि के जरिये यह बात जेहन में बिठाई गई है।
       कुलमिलाकर ये फैसला अल्पसंख्यक आबादी को असुरक्षा व अलगाव की ओर धकेलने वाला है इस फैसले ने पूरे तंत्र पर इनके भरोसे को बेहद कमजोर कर दिया है। अभी तक एक उम्मीद की किरण कोर्ट से थी मगर यह भी अब खत्म हो गई है। इसीलिए कइयों को यही कहकर खुद को तसल्ली देनी पड़ी "तुम्हारा शहर, तुम्हीं कातिल, तुम्ही मुंसिफ, हमें यकीन था, कसूर हमारा ही होगा" !
        यह फैसला केवल मुस्लिमों को दोयम दर्जे में धकेकने वाला नहीं है बल्कि देश की समग्र मज़दूर मेहनतकश आबादी के खिलाफ है यह इनके जनवादी व संवैधानिक अधिकारों को व्यवहार में खत्म करने की ओर जाता है। उन्हें भी दोयम दर्जे की ओर धकेलने वाला है।       

चुनाव की आड़ में बिहार में नागरिकता परीक्षण (एन आर सी)

      चुनाव की आड़ में बिहार में नागरिकता परीक्षण (एन आर सी)       बिहार चुनाव में मोदी सरकार अपने फासीवादी एजेंडे को चुनाव आयोग के जरिए आगे...