गतिविधियां{सितम्बर-अक्टूबरमाह) 1:-- बरेली में हुए साम्प्रादायिक
दंगों मे क्रान्तिकारी लोक अधिकार संगठन ने अन्य संगठनों के साथ पीस कमेटी का गठन
करके साम्प्रदायिक तत्वों को गिरफ़्तार करने की मांग की तथा कर्फ़्यु के दौरान
साम्प्रदायिक दंगो के कारणों को चिन्हित करता हुआ एक परचा छापा गया व इसे वितरित
किया गया इसके अलावा राहत सामाग्री का भी वितरण किया गया। 2:-- हरियाणा सरकार व पुलिस
प्रशासन द्वारा की जा रही एक तरफ़ा कार्रवाही के तहत मारुति सुज़ुकी मजदूरों पर
फ़र्जी आरोप लगाकर दमन व आतंक का माहौल कायम करने व गिरफ़्तारी के विरोध में संगठन
की अलग-अलग इकाइयों हस्ताक्षर अभियान चलाया गया। 3:-- भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के
तहत संगठन अलग-अलग स्थानों पर ‘भ्रष्टाचार व पूंजीवाद’ शिर्षक से एक पुस्तिका आम अवाम के बीच वितरित की गयी। 4:-- उत्तराखण्ड के कोटद्वार के अन्तर्गत
रचना शर्मा नाम की एक लड़्की की बलात्कार व हत्या के विरोध में ‘जनाधिकार संघर्ष समिति’ के तहत आन्दोलन चलाया गया। जिसमें एक
अपराधिक व्यक्ति की गिरफ़्तारी हुई। आन्दोलन के दौरान सी.बी.सी.आई.डी. जांच की मांग
उठायी गयी। आन्दोलन के दबाव में राज्य सरकार को सी.बी.सी.आई.डी.जांच की घोषणा करनी पड़ी। 5:-- रिटेल सैक्टर में विदेशी
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति के विरोध में बलिया (उत्तर प्रदेश) में जन सभा
की गयी तथा अन्य इकाइयों में भी विरोध व्यक्त किया गया।
6:-- उत्तराखण्ड के टिहरी लोक सभा की सीट
के लिये हुए उपचुनाव में संगठन दवारा परिवर्तन कामी छात्र संगठन, प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र के साथ
देहरादून में संयुक्त पर्चा जारी कर अभियाब लिया गया। 7:-- शिक्षा मित्रॊं पर हुए लाठीचार्ज का
उत्तराखण्ड में विरोध किया गया। -
जनवादी अधिकारों के लिए संघर्षशील व साम्राज्यवाद विरोधी क्रांतिकारी संगठन
Friday, 23 November 2012
Saturday, 20 October 2012
WORKER'S CAUSE
STOP REPRESSION OF WORKER'S MOVEMENT
There was a protest demonstration at Uttarakhand Bhawan on 20th October 2012 against repression of worker's movement , particularly against registration of false and fabricated F.I.R. against 32 workers related with Inqulabi Mazdoor Kendra who were participating in a peaceful rally organized after completion of their 2 day long 3rd Conference in Haridwar. Activists of different organization gathered at Uttarkahand Bhawan and submitted a memorandum to Resident commissioner demanding quashing of fabricated FIR. They also demanded judicial inquiry in registration of false FIR and punishment to officer involved in imposing the said false and fabricated FIR. Activists of Inqalabi Mazdoor Kendra , Krantikari Lok Adhikar Sangathan, Krantikari Naujawan Sabha , Mehnatkash Mazdoor Morcha, Mazdoor Patrika , Pragatisheel Mahila Ekta Kendra & others were present their. A gate meeting was also organised where in speakers emphasized on fight against onslaught of indian state against workers and poor masses. Copy of memorandum given to the R.C. Uttarakhand is given below.
MEMORANDUM
To
The Resident Commissioner
Uttrakhand Bhawan Chanakyapuri
New Delhi
Subject:
- Memorandum against repression of worker’s movement and registration of False
and fabricated FIR against workers and activists at P.S. Ranipur Haridwar.
We
the undersigned organizations/ individuals have come to oppose the repression
of workers and rampant violation of worker’s as well as common citizen’s
democratic and fundamental rights by Uttarkhand Police. Uttarkhand Government is adamant to repress the
worker’s movement. They want to kill the worker’s unity at nascent stage and
for that purpose resort to illegal use of police force and other administrative
machinery. On 15th October
2012 a false and fabricated F.I.R. bearing no. 321/2012 at p.s. Ranipur has
been registered.
The
local administration as well as concerned police authorities was aware that on 14th and 15th
October, 2012, 3rd Conference of Inqlabi Mazdoor Kendra was going on in
Haridwar, Uttarakhand. At the end of the conference a procession was taken out from
Chinamay Degree College to Rawali Mahdood village and written intimation dated
05.10.2012 regarding this procession was also given to the SDM Haridwar10 days
in advance. (Copy Enclosed).
The
said application was forwarded to SHO Ranipur with direction to do the needful,
however on instructions of authorities
at state level, a forged and fabricated F.I.R. No. 321/2012 U/S 147/341/447/505
I.P.C. as well as under 7 criminal law amendment act was registered against 32
named persons and 150 unknown. It is pertinent to mention here in that several
persons who were not present in the conference or even few are those who never
visited Haridwar have been named in F.I.R. with ulterior motive to crush the
worker’s movement at nascent stage. There
is state offensive against the general
masses as well as working class of the country, who are prone to state
repression. The worker’s right is being violated rampantly by the state
machinery. Labor department has become defunct institutions and labor laws gets
place in books of law only for record.
The
incident of 15th October is one stark example of worker’s repression.
On 15th October when the activists and members of Inqulabi
Mazdoor Kendra came out with the procession namely Majdoor Adhikar Jagrukta Rally in a peaceful
manner, police registered a false F.I.R.
against them.
We
are living in a democratic country. Holding meetings, taking out processions, organize
conventions, make slogans and protest in peaceful manner is democratic right of
Indian citizen. Article 19 of The Indian Constitution makes guarantee to the
freedom of speech & expression as well as freedom of association and
assembly in peaceful manner as fundamental right. In the incident cited above, local police
have crossed the limit by registering false and fabricated case against
innocent citizens of India violating their fundamental right. The Uttarakhand
Government as well as Indian state has failed to protect the rights of its
citizen, particularly of those which comes from vulnerable sections of the
society.
We undersigned organizations/individuals feel that the police
had lodged entirely false and fabricated FI.R. against the activist and members
of Inqlabi Mazdoor Kendra . We also condemn this police action on the innocent
members and the activists of Inqlabi Mazdoor Kendra.
We demand that:-
(1)
F.I.R.
No. 321/2012 registered at P.S. Ranipur, Haridwar, uttarakhand against workers,
activists and members of Inqlabi Mazdoor Kendra be quashed immediately.
(2)
A
Judicial inquiry may be constituted to inquire the role of administration in
registering false and fabricated F.I.R. against worker and activists and guilty
officials be punished for lodging a false and fabricated F.I.R.
(3)
Stop
repression of worker’s movement.
(4)
Restore
worker’s right
Inqalabi Mazdoor Kendra
Krantikari Lok Adhikar Sangathan
Krantikari Naujawan Sabha
Mehnatkash Mazdoor Morcha
Mazdoor Patrika
Pragatisheel Mahila Ekta Kendra
Saturday, 6 October 2012
प्रोन्नति
में आरक्षण के सवाल पर क्या रुख हो ? प्रोन्नति में आरक्षण के खिलाफ़ सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त सरकारी कर्मचारियों
ने अपनी आवाज़ हर सरकारी विभाग में अधिकांश राज्यों में बुलन्द कर रखी थी वहीं उसी दौरान
अखबार की यह सुर्खी कि उत्तराखण्ड के पहाड़ी जिले में स्थित एक सरकारी प्राथमिक शिक्षण
संस्थान में भोजन माता के पद पर नियुक्त की गयी महिला की दलित जाति से होने के चलते
सवर्ण घरों के बच्चों ने स्कूल में भोजन करने से इंकार कर दिया था यही तथा इसी व अन्य
प्रकार की जातिगत उत्पीड़न की ढेरों घटनायें स्वत: ही प्रोन्नति
में भी क्यों आरक्षण का समर्थन किया जाना चाहिये इसका अहसास कराती है। इसी के साथ-साथ प्रोन्नति में आरक्षण के खिलाफ़ उठी यह चौतरफ़ा आवाज विशेषकर उत्तराखण्ड
में ढोल-नगाड़े-गीतों-नुक्कड़ नाटकों के साथ, अखबारों में इसका जबर्दस्त प्रचार व इसके
पक्ष में तर्क गढ़्ती व फ़िजा बनाती मीडिया जो कि खुद भी इसी संकीर्ण मानसिकता से ग्रस्त
है इस आवाज व प्रचार का प्रभुत्व ही खुद प्रोन्नति में आरक्षण के समर्थन में व इसे
लागू किये जाने के पक्ष में मज़बूत तर्क बनता है। ‘समानता’ ‘योग्यता’ और अब ‘सुप्रीम कोर्ट
का निर्णय’ जैसे शब्द व ऐसे फ़िजूल के तर्क की आड़
में अपनी खुद की पीठ थपथपाते ये लोग खुद से यह तर्क नहीं करते या नहीं करना चाहते कि
एक असमान समाज में एक सामाजिक गैरबराबरी वाले समाज में ‘समानता का सिद्धान्त’ को लागू करने
का अर्थ पहले से सक्षम व ताकतवर लोगों को और मज़बूत करने के सिवाय और कुछ भी नहीं है।
इस खाई को पाटने के लिये ‘असमानता का नियम’ लागू करना ही
पड़ेगा। इसी
प्रकार ये आरक्षण विरोधी स्वघोषित योग्य लोग योग्यता को आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों से निरपेक्ष मानते हैं यानी कैसी भी परिस्थितियां हो
योग्य हमेशा ही योग्य होगा/ रहेगा, जैसे योग्यता
पैदायशी होती हो सवर्णों के जीन में हो। ये भूल जाते हैं कि बुनियादी तौर पर व आम तौर
पर परिस्थितियां ही योग्यता को निर्धारित करती हैं। आरक्षित कोटे से आया कोई डॉक्टर
या इन्जीनियर इनकी नज़रों मे अयोग्य होता है जबकि कई लाख रुपये डोनेशन देकर बना कोई
डॉक्टर या इन्जीनियर अपने सवर्ण पृष्ठ्भूमी के चलते इनके लिये "योग्य" हो जाता है। परिस्थितियां निश्चित तौर पर
दोनों के लिये भिन्न हैं एक हजारों सालों से वंचित अपमानित है तिरष्कृत है व पशुतुल्य
समझा गया है श्रम से जुडे़ सभी काम व सवर्णों के सभी घृणित काम इसी के कन्धों पर थे
जबकि दूसरे का समाज के सभी सुख-सुविधाओं पर आरक्षण है। लेकिन
इस तथ्य को ये अपने पास भी फ़टकने नहीं देते। इक्कीसवीं सदी
तक आते-आते पूंजीवाद ने इस फ़ासले को कम कर दिया है। पिछले कई
दशकों से चल रहे पूंजीवादी विकास व बाद मे लागू आरक्षण की प्रक्रिया ने दलित-पिछड़ी जाति में भी वर्गीय विभाजन कर दिया है इनके बीच से कुछ हिस्सा अपनी हैसियत
में ऊपर उठ गया है ‘फ़िक्की’ की तर्ज़ पर इसमें से निकले पूंजीपतियों
ने अपन|
एसोसिएशन ‘डिक्की’ बना रखा है ब.स.पा. व इसकी सुप्रीमो मायावती पूंजीपतियों की ही पार्टी
है। दलित-पिछडे़ डाक्टर-इन्जीनियर भी इस
जमात में शामिल है आज आरक्षण का लाभ भी दलितो-पिछड़ों का यही मध्यम
व उच्च मध्यम वर्गीय हिस्सा उठा रहा है। जबकि इनका अधिकांश हिस्सा मज़दूर है जो की निजी
क्षेत्र में काम करता है जहां कोई आरक्षण नहीं है। इस प्रकार जाति भेदभाव भी लगातार
कम हुआ है। निजी क्षेत्र तो दूर की बात आज तो सरकारी क्षेत्र में भी नियमित नियुक्ति
के बजाय ठेकेदारी व संविदा पर कर्मचारी रखे जा रहे हैं यहां भी कोई आरक्षण नहीं है
। लेकिन आरक्षण विरोधी लोग
इन तथ्यों को भी आंख-कान नहीं देते। उन्हें लगता है कि
"योग्य" होने का लाइसेन्स केवल उन्हीं
के पास है कि भारत सरकार ने करोड़ों सरकारी नौकरियों के पद सृजित किये हैं बस ये केवल
दलित-पिछड़े ही हैं जिनके आरक्षण के कारण वे या उनके
"योग्य" बच्चे बेरोजगार हैं या उन जैसे
"योग्य" का प्रमोशन नहीं हो पा रहा है। उनका दिमाग शासक वर्ग की पूंजीवादी
नीतियों को कभी कठ्घरे में खड़ा करने व इसके खिलाफ़ संघर्ष करने की ओर नहीं जाता। चौतरफ़ा
बेरोजगारी व इसकी बढ़ती दर इनकी नज़रों से ओझल रहती है। हकीकत तो यही
है की आरक्षण की व्यवश्था के बावजूद आज भी हर जगह सवर्णों का ही वर्चस्व है। अधिकतर
सभी उच्च पदों पर ये ही आसीन हैं। ये श्रेष्ठता बोध से इतने आत्ममुग्ध हैं कुन्ठित
हैं कि किसी दलित-पिछड़े जाति के अधिकारी को बर्दाश्त नहीं कर
पाते उन पर तरह-तरह के व्यंग्यबाण चलाते रहते हैं कुछ केसों में
तो इस माहौल से तंग आकर इन अधिकारियों को इस्तिफ़ा देकर नौकरी छोड़्नी भी पड़ी है। स्थिति
आज भी यह है कि आरक्षित पदों पर भी दलितो-पिछड़ों से उम्मीदवार
न मिलने के चलते पद काफ़ी लम्बे समय से रिक्त चलते रहते हैं। अब यदि प्रश्न इस रूप में प्रश्तुत हो कि क्या आरक्षण मात्र से इस समस्या का
हल बुनियादी तौर पर संभव है तो स्पष्टत: यह केवल एक सुधार है
समस्या का बुनियादी हल नहीं। दलितो-पिछ्ड़ों का बहुलांश आज मजदूर
वर्ग की पातों में है। ब.स.पा. समेत सभी पूंजीवादी चुना्वबाज पार्टियां अपने-अपने वोट
बैंक के गणितीय समीकरण के हिसाब से व्यवहार कर रही है। इस समस्या का वास्तविक समाधान
मज़दूर वर्ग के संघर्षों के दम पर ही संभव है। आर्थिक-सामाजिक
गैरबराबरी को व तमाम शोशण-उत्पीड़्न खत्म करने के मकसद से एक नयी
समाज व्यवश्था ‘समाजवाद’ का निर्माण अतीत
में मजदूर वर्ग के नेतृत्व में हुआ था। इसी के दबाव में व अपनी जरूरत के हिसाब से हमारे
शासकों ने आरक्षण जैसी व्यवश्था का प्रावधान संविधान में किया था। और अब भविष्य में
एक क्रान्तिकारी संघर्ष के जरिये ही एक झटके से इस समस्या का खात्मा होगा। मज़दूर जिसमें दलितों-पिछ्ड़ों की संख्या काफ़ी है अपने को वर्ग के बतौर संगठित करके इस क्रान्तिकारी
संघर्ष को अंज़ाम देगा।
Sunday, 30 September 2012
आर्थिक सुधारों का यह " बोल्ड स्टैप " मेहनतकश अवाम
को और तबाही की ओर धकेलेगा यू.पी.ए. सरकार नयी आर्थिक सुधारों को तेजी से
आगे बढ़ाने की दिशा मल्टि ब्रान्ड रीटेल सेक्टर
में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी देकर इसे लागू करने की अधिसूचना भी जारी
कर दी । साथ ही उड्ड्यन, पॉवर एक्सचेन्ज, प्रसारण क्षेत्र मे भी विदेशी निवेश की सीमा बढ़ा दी गयी है ।
एमएमटीसी, सेल, हिंदुस्तान कॉपर, ऑइल इंडिया और नाल्को सहित सात सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के विनिवेश का फ़ैसला
भी लिया गया है। सुधारों की इसी कड़ी में बिमा क्षेत्र में भी विदेशी निवेश की सीमा
बढ़ा दी गयी है नये पेन्सन बिल को लागू कर रही है जबकि दुसरी ओर तेल पुल घाटे व सब्सिडी
के नाम पर एल.पी.जी. {गैस} व डीजल-पेट्रोल के दामों को नियन्त्रणमुक्त
करने की ओर और तेजी से आगे बढ़ रही है।
सरकार की इस घोषणा के तत्काल बाद ही सरकारी वामपंथियों समेत अन्य पूंजीवादी राजनीतिक पार्टियों ने चुनावी फ़ायदों का आकलन करके दावं-पेंच खेलने शुरु कर दिये। यू.पी.ए. सरकार के जाने की बातें की जाने लगी। लेकिन सरकार अभी बची हुई है। आगे भी इसके बचे रहने की ही संभावना ज्यादा है। सरकार की इस घोषणा के विरोध में 20 सितम्बर को बन्द का आयोजन भी इन्ही के द्वारा अपने-अपने आधार को बचाने के लिये किया गया। यह विरोध अतीत की ही तरह छ्द़्म विरोध के सिवा कुछ भी नहीं था। जो भा.ज.पा. 2002 में अपने शासन काल के दौरान खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को मंजूरी देने की वकालत कर रही थी आज वही इसके विरोध का नाटक कर रही है और जो मनमोहन सिहं राज्य सभा में विपक्ष के नेता की बतौर खुद ही तब बेरोजगारी का तर्क देकर भा.ज.पा. का विरोध कर रहे थे आज इसे लागू करने के लिये कुर्बान हो जाने की बात कर रहे हैं। करना हर पूंजीवादी राजनीतिक पार्टी को यही था। नब्बे के दशक के जब देश में पूंजीवादी विकास संकट में फ़ंस गया तब पूंजीवादी विकास के रथ को आगे बढ़ाने के लिये भारतीय एकाधिकारी पूंजीवादी घरानों के हित में ही "नयी आर्थिक नीतियों" को लागू किया गया। मन मोहन सिहं-नरसिहं राव के नेतृत्व वाली कॉंग्रेस तब भी इसकी अगुवाई कर रही थी। तब भी ऐसा ही मिलता-जुलता विरोध विपक्षियों की ओर से था। तब भी देश के विकास, नयी तकनिकी, सस्ता माल व रोजगार के अपार नये क्षेत्र खुलने का तर्क दिया गया। आज फ़िर यही तर्क हर ओर प्रचारित व स्थापित किये जा रहे है। हमें बताया जा रहा है कि विकास के लिये विदेशी पूंजी की जरूरत है। जबकि हकिकत इसके परे है बीते दो दशक मजदूर वर्ग,छोटे-मझोले किसानो समेत अधिकांश मेहनतकश अवाम की बढ़्ती तबाही-बर्बादी के गवाह हैं। अब रिटेल सैक्टर की बात की जाय तो अनुमानत: 4 करोड़ खुदरा व्यापारियों को इसमें रोजगार मिला है इसमें बड़ी पूंजी के आने से शॉपिगं मॉल खुलने से निश्चित् तौर पर अधिकांश धीरे धीरे बर्बाद होकर गरीबी कंगाली की ओर बढ़ेंगे व मजदूर वर्ग की पातों में शामिल हो जायेंगे। लेकिन ऐसा केवल वालमार्ट, केरिफ़ोर, टेस्को जैसे विशाल मगरमच्छों के आने से ही नहीं होगा बल्कि यह प्रक्रिया तो पहले से ही देश में चल रही है रिलायन्स, भारती, आई. टी. सी. जैसे बढ़े-बढ़े मगरमच्छ देश के भीतर ही मौजूद हैं इन्से छोटे मगरमच्छ तो हर शहर में हैं। इसके अलावा नैट्वर्किंग मार्केटिंग, इन्टरनेट व टी.वी. पर ऑनलाइन मार्केटिंग तो है ही। जो कि खुदरा बाजार से बिचौलियों का सफ़ाया करने में लगी हुई हैं। लेकिन विरोध के सुर केवल विदेशी निवेश पर हैं। दरअसल आर्थिक सुधारों का यह कदम शासक वर्ग ने ऐसे वक़्त पर उठाया है जब भारतीय पूंजीवाद वैश्विक संकट की गिरफ़्त में है इस संकट को भारतीय पूंजीपति वर्ग के प्रतिनिधि मनमोहन-प्रणव मुखर्जी-पी.चिदमबरम की तिकड़ी को अन्तत: स्वीकारना ही पड़ा। देश में गत आठ महीनों के दौरान औसत औध्योगिक विकास 2.5% रहा। कृषि संकटपूर्ण व्यवश्था में है। जी.डी.पी विकास दर 2011-12 मे घट्कर 6.5 % रह गया। 2012-13 की पहली तिमाही में 5.5 %है। औध्योगिक उत्पादन सूचकांक इस दौरान -0.1% तथा मैनुफ़ैक्चरिगं -0.6% रहा। निर्यात में लगातार कमी तो आयात में बढोत्तरी हो रही है। वैश्विक अर्थव्यवश्था मंदी की गिरफ़्त से अपने लाख दावों-प्रयासों के बावजूद भी नहीं निकल पा रही है। हज़ारों अरब डॉलर के बेल आउट पैकेज भी क्षणिक राहत देने वाले साबित हुए है। इस संकट का पूरा बोझ अब मजदूर वर्ग समेत आम मेहनतकश अवाम पर’ऑस्टीरिटी पैकेज’ के नाम पर डाला जा रहा है सारी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को खत्म करने व उनकी जिन्दगी को तबाही की ओर धकेल कर मंदी के संकट से उबरने की नाकाम व मुर्खतापूर्ण कोशिश की जा रही है। ग्रीस, स्पेन पुर्तगाल इत्यादि समेत साम्राज्यवादी मुल्कों में यह हो रहा है। यही सब करने का दबाव भारतीय शासक वर्ग पर भी था। जो कि अलग-अलग पत्रिकाओं, रेटिगं एजेन्सियों व प्रतिनिधियों के वक्तव्यों में भी प्रकट होता रहता था। ऐसा करने की मांग व दबाव खुद भारतीय पूंजीपति वर्ग की भी थी ऐसी मांग व दबाव पहले से ही था। एकाधिकारी पूंजीपतियों के सचेत प्रतिनिधियों ने सटीक वक़्त पर यह कद़म उठाया जबकि खुद उनकी साख दांव पर लगी हुई थी। सरकार के ऐसा कदम उठाते ही शेयर मार्केट झूम उठा। उध्योग जगत ने तुरन्त ही खुशी के राग अलापने शुरु कर दिये। पिछ्ले दो-ढाइ दशकों की ही तरह आर्थिक सुधारों का यह कदम मजदूर वर्ग, छोटे-मझोले किसानो समेत छोटी पूंजी वालो को और ज्यादा तबाही की ओर धकेलेगा। लाखों किसानों को मौत की नींद सुलाने के बाद अब मध्य भारत के इलाके में पूंजी की यह हवस आदिवासियों के विश्थापन प्रतिरोध व बर्बर दमन की नयी इबारत लिख रही है। ऐसा ही यह किसानो की जमीनो के अधिग्रहण के मामले में कर रही है। सम्पति एवं पूंजी इस प्रक्रिया में छिनकर मुट्ठि भर पूंजीपतियों के हाथों सिमटती जा रही है। यह पूंजीवाद की अन्तर्नीहित गति है कि इसमें पूंजी व समप्त्ति का केन्द्रीकरण बढ़्ता जाता है बड़ी पूंजी छोटी पूंजी को निगल जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में उत्पादन का समाजीकरण भी बढ़्ता जाता है। इस प्रकार यह समाजवाद के लिये आधार तैयार करता जाता है। पूंजी की यही गति रिटेल में भी एक ओर छोटी पूंजी को सम्पत्ति को निगलते हुए आगे बढे़गी तो दुसरी ओर उत्पादन को विपणन को और ज्यादा संगठित कर देगी। यह पूंजी की एतिहासिक गति है। हाल-फ़िलहाल भले ही पूंजीपति वर्ग इस संकट से उबरने में कुछ राहत महसूस करे लेकिन जल्दी ही वह और गहरे संकट मे फ़ंस जायेगा।
छोटी सम्पत्ति व पूंजी के मालिकों का आम तौर पर यही दुख:दायी हश्र पूंजीवाद में होता है। विशाल पूंजी के आक्रामक तेवरों व ताकत के आगे छोटी पूंजी का मजबूत से मजबूत प्रतिरोध भी देर सबेर विलीन हो जाता है। क्योंकि यह समाजविकास की गति को पीछे धकेलने का निष्फ़ल प्रयास होता है। वर्तमान लोकतंत्र जिसे कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में हमारे शासक लम्बे अर्से से प्रचारित व स्थापित करते आ रहे हैं यह लोकतन्त्र या जनतन्त्र वास्तव में पूंजी का तंत्र है जिसमें सारे अधिकार पूंजी के मालिकों के पास हैं उसी की सत्ता है। फ़ौज-पुलिस-नौकरशाही ही इसके असली हथियार हैं। आम अवाम के अधिकार तो अपने शोषण व उत्पीड़्न के विरोध में अवाज उठाने पर लाठी-गोली-जेल व फ़र्जी मुकदमों में बदल जाते हैं। इसलिये यही इनके लिये सही रास्ता है कि पूंजीवादी व्यवश्था की इस आम गति को समझते हुए अपने संघर्षों की धार समाजवाद की स्थापना की दिशा की ओर करे। यहीं वास्तविक तौर पर मेहनतकश अवाम को वास्तविक अधिकार होंगे क्योंकि वहां पूंजी की सत्ता के बजाय मेहनतश अवाम की सत्ता होगी।
सरकार की इस घोषणा के तत्काल बाद ही सरकारी वामपंथियों समेत अन्य पूंजीवादी राजनीतिक पार्टियों ने चुनावी फ़ायदों का आकलन करके दावं-पेंच खेलने शुरु कर दिये। यू.पी.ए. सरकार के जाने की बातें की जाने लगी। लेकिन सरकार अभी बची हुई है। आगे भी इसके बचे रहने की ही संभावना ज्यादा है। सरकार की इस घोषणा के विरोध में 20 सितम्बर को बन्द का आयोजन भी इन्ही के द्वारा अपने-अपने आधार को बचाने के लिये किया गया। यह विरोध अतीत की ही तरह छ्द़्म विरोध के सिवा कुछ भी नहीं था। जो भा.ज.पा. 2002 में अपने शासन काल के दौरान खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को मंजूरी देने की वकालत कर रही थी आज वही इसके विरोध का नाटक कर रही है और जो मनमोहन सिहं राज्य सभा में विपक्ष के नेता की बतौर खुद ही तब बेरोजगारी का तर्क देकर भा.ज.पा. का विरोध कर रहे थे आज इसे लागू करने के लिये कुर्बान हो जाने की बात कर रहे हैं। करना हर पूंजीवादी राजनीतिक पार्टी को यही था। नब्बे के दशक के जब देश में पूंजीवादी विकास संकट में फ़ंस गया तब पूंजीवादी विकास के रथ को आगे बढ़ाने के लिये भारतीय एकाधिकारी पूंजीवादी घरानों के हित में ही "नयी आर्थिक नीतियों" को लागू किया गया। मन मोहन सिहं-नरसिहं राव के नेतृत्व वाली कॉंग्रेस तब भी इसकी अगुवाई कर रही थी। तब भी ऐसा ही मिलता-जुलता विरोध विपक्षियों की ओर से था। तब भी देश के विकास, नयी तकनिकी, सस्ता माल व रोजगार के अपार नये क्षेत्र खुलने का तर्क दिया गया। आज फ़िर यही तर्क हर ओर प्रचारित व स्थापित किये जा रहे है। हमें बताया जा रहा है कि विकास के लिये विदेशी पूंजी की जरूरत है। जबकि हकिकत इसके परे है बीते दो दशक मजदूर वर्ग,छोटे-मझोले किसानो समेत अधिकांश मेहनतकश अवाम की बढ़्ती तबाही-बर्बादी के गवाह हैं। अब रिटेल सैक्टर की बात की जाय तो अनुमानत: 4 करोड़ खुदरा व्यापारियों को इसमें रोजगार मिला है इसमें बड़ी पूंजी के आने से शॉपिगं मॉल खुलने से निश्चित् तौर पर अधिकांश धीरे धीरे बर्बाद होकर गरीबी कंगाली की ओर बढ़ेंगे व मजदूर वर्ग की पातों में शामिल हो जायेंगे। लेकिन ऐसा केवल वालमार्ट, केरिफ़ोर, टेस्को जैसे विशाल मगरमच्छों के आने से ही नहीं होगा बल्कि यह प्रक्रिया तो पहले से ही देश में चल रही है रिलायन्स, भारती, आई. टी. सी. जैसे बढ़े-बढ़े मगरमच्छ देश के भीतर ही मौजूद हैं इन्से छोटे मगरमच्छ तो हर शहर में हैं। इसके अलावा नैट्वर्किंग मार्केटिंग, इन्टरनेट व टी.वी. पर ऑनलाइन मार्केटिंग तो है ही। जो कि खुदरा बाजार से बिचौलियों का सफ़ाया करने में लगी हुई हैं। लेकिन विरोध के सुर केवल विदेशी निवेश पर हैं। दरअसल आर्थिक सुधारों का यह कदम शासक वर्ग ने ऐसे वक़्त पर उठाया है जब भारतीय पूंजीवाद वैश्विक संकट की गिरफ़्त में है इस संकट को भारतीय पूंजीपति वर्ग के प्रतिनिधि मनमोहन-प्रणव मुखर्जी-पी.चिदमबरम की तिकड़ी को अन्तत: स्वीकारना ही पड़ा। देश में गत आठ महीनों के दौरान औसत औध्योगिक विकास 2.5% रहा। कृषि संकटपूर्ण व्यवश्था में है। जी.डी.पी विकास दर 2011-12 मे घट्कर 6.5 % रह गया। 2012-13 की पहली तिमाही में 5.5 %है। औध्योगिक उत्पादन सूचकांक इस दौरान -0.1% तथा मैनुफ़ैक्चरिगं -0.6% रहा। निर्यात में लगातार कमी तो आयात में बढोत्तरी हो रही है। वैश्विक अर्थव्यवश्था मंदी की गिरफ़्त से अपने लाख दावों-प्रयासों के बावजूद भी नहीं निकल पा रही है। हज़ारों अरब डॉलर के बेल आउट पैकेज भी क्षणिक राहत देने वाले साबित हुए है। इस संकट का पूरा बोझ अब मजदूर वर्ग समेत आम मेहनतकश अवाम पर’ऑस्टीरिटी पैकेज’ के नाम पर डाला जा रहा है सारी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को खत्म करने व उनकी जिन्दगी को तबाही की ओर धकेल कर मंदी के संकट से उबरने की नाकाम व मुर्खतापूर्ण कोशिश की जा रही है। ग्रीस, स्पेन पुर्तगाल इत्यादि समेत साम्राज्यवादी मुल्कों में यह हो रहा है। यही सब करने का दबाव भारतीय शासक वर्ग पर भी था। जो कि अलग-अलग पत्रिकाओं, रेटिगं एजेन्सियों व प्रतिनिधियों के वक्तव्यों में भी प्रकट होता रहता था। ऐसा करने की मांग व दबाव खुद भारतीय पूंजीपति वर्ग की भी थी ऐसी मांग व दबाव पहले से ही था। एकाधिकारी पूंजीपतियों के सचेत प्रतिनिधियों ने सटीक वक़्त पर यह कद़म उठाया जबकि खुद उनकी साख दांव पर लगी हुई थी। सरकार के ऐसा कदम उठाते ही शेयर मार्केट झूम उठा। उध्योग जगत ने तुरन्त ही खुशी के राग अलापने शुरु कर दिये। पिछ्ले दो-ढाइ दशकों की ही तरह आर्थिक सुधारों का यह कदम मजदूर वर्ग, छोटे-मझोले किसानो समेत छोटी पूंजी वालो को और ज्यादा तबाही की ओर धकेलेगा। लाखों किसानों को मौत की नींद सुलाने के बाद अब मध्य भारत के इलाके में पूंजी की यह हवस आदिवासियों के विश्थापन प्रतिरोध व बर्बर दमन की नयी इबारत लिख रही है। ऐसा ही यह किसानो की जमीनो के अधिग्रहण के मामले में कर रही है। सम्पति एवं पूंजी इस प्रक्रिया में छिनकर मुट्ठि भर पूंजीपतियों के हाथों सिमटती जा रही है। यह पूंजीवाद की अन्तर्नीहित गति है कि इसमें पूंजी व समप्त्ति का केन्द्रीकरण बढ़्ता जाता है बड़ी पूंजी छोटी पूंजी को निगल जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में उत्पादन का समाजीकरण भी बढ़्ता जाता है। इस प्रकार यह समाजवाद के लिये आधार तैयार करता जाता है। पूंजी की यही गति रिटेल में भी एक ओर छोटी पूंजी को सम्पत्ति को निगलते हुए आगे बढे़गी तो दुसरी ओर उत्पादन को विपणन को और ज्यादा संगठित कर देगी। यह पूंजी की एतिहासिक गति है। हाल-फ़िलहाल भले ही पूंजीपति वर्ग इस संकट से उबरने में कुछ राहत महसूस करे लेकिन जल्दी ही वह और गहरे संकट मे फ़ंस जायेगा।
छोटी सम्पत्ति व पूंजी के मालिकों का आम तौर पर यही दुख:दायी हश्र पूंजीवाद में होता है। विशाल पूंजी के आक्रामक तेवरों व ताकत के आगे छोटी पूंजी का मजबूत से मजबूत प्रतिरोध भी देर सबेर विलीन हो जाता है। क्योंकि यह समाजविकास की गति को पीछे धकेलने का निष्फ़ल प्रयास होता है। वर्तमान लोकतंत्र जिसे कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में हमारे शासक लम्बे अर्से से प्रचारित व स्थापित करते आ रहे हैं यह लोकतन्त्र या जनतन्त्र वास्तव में पूंजी का तंत्र है जिसमें सारे अधिकार पूंजी के मालिकों के पास हैं उसी की सत्ता है। फ़ौज-पुलिस-नौकरशाही ही इसके असली हथियार हैं। आम अवाम के अधिकार तो अपने शोषण व उत्पीड़्न के विरोध में अवाज उठाने पर लाठी-गोली-जेल व फ़र्जी मुकदमों में बदल जाते हैं। इसलिये यही इनके लिये सही रास्ता है कि पूंजीवादी व्यवश्था की इस आम गति को समझते हुए अपने संघर्षों की धार समाजवाद की स्थापना की दिशा की ओर करे। यहीं वास्तविक तौर पर मेहनतकश अवाम को वास्तविक अधिकार होंगे क्योंकि वहां पूंजी की सत्ता के बजाय मेहनतश अवाम की सत्ता होगी।
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