Thursday, 26 September 2013

            आइये! उत्तराखंड आपदा प्रभावित क्षेत्रो में तबाही झेल रहे लोगों के हक में आवाज उठायें !
साथियो ,
          उत्तराखंड में आई आपदा को लगभग 3 माह गुजर चुके हैं। इन बीते तीन माह ने आम ग्रामीण गरीब नागरिकों के प्रति हमारे शासकों की घोर उपेक्षा, संवेदनहीनता व लापरवाही तथा कुप्रबंधन को खूब उजागर किया है ना केवल राज्य सरकार बल्कि संसाधनों से सम्पन्न केंद्र सरकार व उसके समूचे शासन प्रशासन को भी इस आपदा ने आम जनता के सामने नग्न कर दिया।                      
16-17 जून को रुद्रप्रयाग व उत्तरकाशी समेत पिथौरागढ़ व अन्य इलाकों में आई आपदा से भयानक तबाही- बर्बादी होती है। पर्यटकों व स्थानीय लोगों समेत हजारों  लोग मारे जाते हैं। तब सबसे ज्यादा जरूरत थी तत्काल वहाँ फंसे लोगो को बाहर निकालने की, लोगों तक भोजन –पानी -दवा आदि पहुंचाने की आदि। लेकिन हम सबने देखा कि राज्य का मुखिया आपदा से निपटने में नेतृत्व देने ,आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने के बजाय दिल्ली पहुंच जाता है। मीडिया में व चौतरफा थू –थू होने पर, व आपदा में हाई प्रोफ़ाइल पर्यटकों के भी फंसे होने के चलते फिर पर्यटकों को बाहर निकालने के प्रबंध केंद्र व राज्य सरकार द्वारा किए गए। जबकि इस वक्त इससे निपटने का काम केवल हर जरूरी संसाधनों से सम्पन्न व प्रशासनिक ताने-बाने वाली ताकत (सरकार) ही कर सकती थी |         
लेकिन आपदा प्रभावित क्षेत्रों में हजारों की तादाद में जिन गरीब ग्रामीणों के मकान ,खेत व जानवर खत्म हो जाते हैं तथा  सैकड़ों की संख्या में वे परिवार जिनके घर के पुरुष सदस्य आपदा में मारे जाते हैं उनके लिए सरकारों ने घोषणा बाजी के अलावा क्या किया?  इन लोगो को मेडिकल सुविधाओं व राशन आदि की सख्त जरूरत थी लेकिन सरकारों ने जो दावा करती हैं कि वह जनता के लिए है उन्होंने क्या किया ? कुछ भी नहीं सिवाय कुछ औपचारिकताओं के ,नाम का राहत। और हकीकत यही है कि हालात आज भी बेहद खराब हैं। आखिर सरकारों व उसके प्रशासन की जवाबदेही व ज़िम्मेदारी किसके प्रति है,यह किन लोगों के लिए काम करता  हैं व चिंतित रहता है ?  क्या जनता के लिए ? नहीं; बांधों-टनलों, होटल रिज़ॉर्ट,खनन आदि-आदि के कारोबार में लगे पूंजीपतियों के लिए। और इन्होंने खूब मुनाफा बटोर सकें इसलिए यहां की भौगोलिक बनावट को ध्यान दिये बिना अनियंत्रित व अवैज्ञानिक तरीके से पिछड़ी तकनीक का इस्तेमाल करके अंधाधुध ढंग से भारी तादाद में बांधों -सुरंगो, सड़कों आदि आदि का निर्माण किया।  दूसरी ओर अनियंत्रित पर्यटन बेरोक टोक जारी था।  अत: देर सबेर इस अंधाधुध लूट का 16-17 जून जैसी आपदा के रूप में बिस्फोट होना ही था।  यही स्थिति व सच पूरे देश के संबंध में भी है।  टाटा –बिडला-मित्तल-अंबानी आदि द्वारा देश की संपत्ति संसाधनों की लूट अब किसी से छुपी नही है, हमारे जनप्रतिनिधि होने का दावा करने वाले लोग जो कि संसद या विधान सभाओं में बैठते है तथा पूरा शासन व प्रशासनिक महकमा इन टाटा –अंबानी जैसे  देशी विदेशी पूंजी की सेवा में मुस्तैद रहता है।
  और इसलिए सरकारें, उसके विकास का यह पूंजीवादी माडल और ये पूंजीपति अंतत: यह पूंजीवादी व्यवस्था ही इस आपदा की असल वजह हैं इसके लिए जिम्मेदार हैं जो कि इसे प्राकृतिक या दैवीय आपदा कहकर अपने गुनाहों पर पर्दा डालने का काम कर रहे हैं।  इसीलिए यह सब भी हुआ व होता है कि आम गरीब जनता के प्रति बेहद लापरवाह, संवेदनहीन व संकल्पहीन दिखने व रहने वाले ये पूंजीवादी शासक केदारनाथ धाम को 11 सितंबर से खोल देने के मामले में पूरे प्रशासनिक अमले के साथ संकल्पबद्ध होकर जुट जाते हैं ऐसा क्यो ?  इसे समझना कठिन नहीं है। जैसे ही इस दौरान केदारनाथ के आस-पास जंगलो में सैकड़ों लाशें मिली जिसकी संख्या और बढ़ती लेकिन इसे रोक दिया गया और इस इलाके में जाने पर रोक लगा दी गई।
   इन स्थितियों में तब यह सवाल पैदा होना लाजिमी है कि तब क्या किया जाय, समस्याओं को हल करने के संबंध में किस रास्ते की ओर बढ़ा जाय।निश्चित तौर पर जो रास्ता है वह एकजुट होकर संघर्ष करने का ही है इसी माह शहीद भगत सिंह का जन्मदिन है जिनका क्रांतिकारी संघर्ष ना केवल विदेशी लुटेरे (अंग्रेज़ो) के खिलाफ था बल्कि देशी पूंजीपतियों व जमीदारों के खिलाफ भी था और इस संघर्ष के जरिये वह देश में समाजवाद ( मजदूर-मेहनतकश जनता का राज) लाना चाहते थे। तब से आज हालात बहुत बदले हैं आज भगत सिंह की विचारधारा व समाजवाद का उनका लक्ष्य आज बहुत ज्यादा प्रासंगिक हो चुका है इसलिए जरूरत है इस विचारधारा को समझने की व समाजवाद की दिशा में संघर्ष करने की। 
  इसीलिए आपदा में राहत काम व आपदा के असली कारणों को आम जनता तक पहुचाने व अपने हक के लिए आवाज उठाने-संगठित होने के मकसद से ही “उत्तराखंड आपदा राहत मंचका गठन विभिन्न संगठनों व नागरिक अखबार द्वारा किया गया।  मंच के नेतृत्व में उत्तरकाशी में कुछ दिन तो रुद्रप्रयाग के गुप्तकाशी, कालीमठ व ऊखीमठ वाले क्षेत्र में कई दिन तक मेडिकल कैंप लगाए गए।  और अब इसी की अगली कड़ी में मंच द्वारा एक सेमीनार का आयोजन देहरादून में किया जा रहा है।  उम्मीद है आप इस कार्यक्रम में शिरकत करेंगे।    
                         
              कार्यक्रम : :                                                         द्वारा
विषय :--  ‘‘उत्तराखण्ड आपदा से उपजे सवाल व उनका समाधान’’        उत्तराखण्ड आपदा राहत मंच
दिनांक :-  29 सितम्बर (रविवार) 2013,       
समय :-   10:00 प्रातः से  शाम 5 बजे तक।      
स्थान :कालूमल धर्मशाला, राजा रोड़,  प्रिंस चैक (निकट रेलवे स्टेशन), देहरादून।                              
संपर्क न .     8126975771 , 9837205978                        

घटक संगठन :- परिवर्तनकामी छात्र संगठन, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, प्रोग्रेसिव मेडिकोज फोरम,नागरिक (पाक्षिक अखबार), इंकलाबी मजदूर केंद्र, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र, भेल मजदूर ट्रेड यूनियन,                                                                         
      

Friday, 20 September 2013

                                        कार्यक्रम : सेमीनार
        साथियो ,                     
        आगामी  29 सितम्बर (रविवार) 2013 को उत्तराखण्ड आपदा राहत मंचके द्वारा एक सेमीनार का आयोजन किया जा रहा है। जैसा कि सभी जानते हैं कि 16-17 जून को उत्तराखण्ड भीषण आपदा से गुजरा। इस आपदा में हजारों पर्यटक व स्थानीय लोग मारे गए । मंच द्वारा रूद्रप्रयाग के प्रभावित क्षेत्रों में कई दिनों तक व उत्तरकाशी के  प्रभावित क्षेत्रों में मेडिकल कैम्प लगाए गए । इस दौरान आपदा से हुई तबाही, सरकार की घोर असंवेदनशीलता-लापरवाही तथा सरकार के प्रति आम ग्रामीण गरीबों के आक्रोश से भी मंच रूबरू  हुआ। इस आपदा व इससे हुई तबाही तथा इससे निपटने के मामले में सरकार के रुख ने  हमारे समक्ष कई सवाल खडे़ किए हैं मसलन... 
1 .  उत्तराखण्ड में विकास के नाम पर जिस प्रकार से अंधाधुंध ढंग से व अवैज्ञानिक तरीके से बांधों, सड़कों, सुरंगों व होटल, रिजोर्ट आदि का निर्माण हो रहा है, क्या वह इस आपदा के लिए जिम्मेदार नहीं है ? और विकास का इस माडल से दरअसल किन लोगों का हित साधा जा रहा है ? और जो स्पष्ट तौर पर केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के द्वारा बनाई गई नीतियों के तहत अंजाम दिया जा रहा है। क्या यह सरकारें इस आपदा को पैदा करने के दोषी  नहीं है ?
2 .  आपदा के तत्काल बाद आपदा से निपटने के लिए सरकारों द्वारा जिस घोर लापरवाही और हद दर्जे की असंवेदनशीलता का प्रदर्शन  किया गया, उससे आम जनता के लिए क्या सबक हैं ? तथा इसके बाद तब से अब तक जो राहत सामाग्री व चिकित्सकीय सुविधाएं ग्रामीणों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी व जवाबदेही सरकार की बनती थी उस मामले में भी यदि भयानक लापरवाही व असंवेदनशीलता बरती गई है तो क्यों? जबकि संसाधन सम्पन्न लोगों के प्रति सरकार बेहद चिंतित है। ऐसा क्यों ?
उपरोक्त व अन्य सवालों के संदर्भ में एक स्पष्ट  समझ बनाने और समाधान का रास्ता तलाशने हेतु इस सेमीनार का आयोजन किया जा रहा है। जिसमें आपकी भागेदारी अपेक्षित है।
                         कार्यक्रम : :                                                  द्वारा
विषय:- उत्तराखण्ड आपदा से उपजे सवाल व उनका समाधान    उत्तराखण्ड आपदा राहत मंच
दिनांक :-  29 सितम्बर (रविवार) 2013,                          समय :-   10:00 प्रातः से  शाम 5 बजे तक।
स्थान :-  कालूमल धर्मशाला, राजा रोड़,  प्रिंस चैक (निकट रेलवे स्टेशन), देहरादून।                           
संपर्क न .     8126975771 , 9837205978

                                       



Tuesday, 10 September 2013

mujaffarnagar communal riots

                                                मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक दंगा
               
               
                जैसा कि  तय था 2014 के लोक सभा के चुनाव को ध्यान में रखते हुए सभी पूंजीवादी राजनीतिक पार्टिया केंद्र की सत्ता अपने नेतृत्व में सरकार बनाने की जी तोड़ कवायद  में  पिछले समय की ही तरह हर घृणित हथकंडे अजमाएँगी । इस जी तोड़ कवायद में समाज में हिन्दू- मुस्लिम वोटो को ध्यान में रखते हुए सांप्रदायिक ध्रूविकरण एक हथियार है जिसे आर . एस. एस. के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी सबसे आगे है।90 के दशक में राम मंदिर निर्माण के नाम पर पूरे ही देश को दंगो की आग मे झोंक देने वाली भा ज पा,  राष्ट्रीय सेवक संघ  व इसके अन्य आनुषंगिक संगठनो  ने इस सांप्रदायिक ध्रूविकरण को एक मुकाम तक पहुचाया। लेकिन इसके बाद भी केंद्र में  केवल अपने दम पर सरकार बनाने का ख्वाब अधूरा रहा । इसके बाद फिर नई रणनीति के तहत संघ ने सांप्रदायिक ध्रूविकरण को स्थानीय व क्षेत्रीय मुद्दे के तहत दलितो व आदिवासियों में भी घुसपैठ की गई ‘’ धर्मांतरण ‘’ लव  जेहाद ‘’ आदि आदि  जैसे फर्जी मामले खड़े किए गए  चैरिटी काम करके भी इस मकसद को साधा गया सांप्रदायिककरण किया गया ।और फिर  गुजरात के स्तर पर 2002 का फासीज़्म का प्रयोग भी सफल रहा ।
                इसलिए ऐसा यूं ही नही हुआ कि अलग –अलग शहरो के स्तर या कस्बों के स्तर पर दंगो की तादाद बढ़ गई उत्तर प्रदेश में ही इससे पहले लगभग 17 महीने में ही सांप्रदायिक हिंसा व तनाव की 100 से अधिक घटनाएँ हो चुकी हैं । और अब संघ खुलकर सामने आ गया  है फासिस्ट नरेन्द्रमोदी की केंद्र के लिए   ताजपोशी  , 84 कोसी यात्रा और फिर राम मंदिर की बातें आदि  इसके कारनामों से पैदा होने वाले  सांप्रदायिक  उन्माद की ओर साफ साफ इशारा कर रही हैं।
                किश्तवाड़ की आग अभी बुझी भी नही थी कि  अब मुजफ्फरनगर में दंगे हो गए ।और यहा अब तक सरकारी आकड़ों के मुताबिक ही  तीन दर्जन से  लोग मारे गए है कई गायब है व घायल हैं। हकीकत हमेशा की ही तरह इससे कई गुनी ज्यादा हो सकती है ।यहाँ अगस्त के तीसरे हफ्ते में एक लड़की से हुई छेड़छाड़ अगर इतना बड़ा रूप धारण कर लेती है , महापंचायतें होती है जाट समुदाय के लोगो द्वारा जिसमे लोग हथियारो के साथ पहुचते हैऔर यह सब सपा सरकार व उसके शासन प्रशासन के आखो के सामने घटित होता है। इन महापंचायतों में भाजपा के तीन चार नेता पहुचते है भारतीय किसान यूनियन के नेता  व कांग्रेस के पूर्व संसद हरेन्द्र मालिक भी पहुचते हैं।इनके खिलाफ एफ आई आर के बावजूद कोई कार्यवाही नही की जाती। सपा सरकार इसे हो जाने देती है।तो यह सब ऐसे ही नही हो जाता है।  और फिर मामला हाथ से निकलता दिखाकर भारी तादाद में अर्ध सैनिक बल बुला ली जाती है। कर्फ़्यू लगाया जाता है  केंद्र की कांग्रेस सरकार व उसका गृह मंत्रालय  भी अपने को बेहद चिंतित दिखाकर तुरंत ही सक्रिय हो जाता है।अल्पसंख्यको को भयाक्रांत कर फिर उनके रक्षक बन एक ओर कांग्रेस व सपा उनके वोटो को हासिल करने का समीकरण बना रही है तो दूसरी ओर इन प्रतिक्रियावादी व सांप्रदायिक महापंचायतों को हो जाने का अवसर दे कर नरम हिन्दुत्व का परिचय देकर यहा से भी वोट हासिल करने की जुगत में है। भाजपा तो घोषित तौर पर ही सांप्रदायिक पार्टी है।लेकिन यह पार्टिया भी कम नहीं है । कांग्रेस द्वारा 1984 में सीक्खो का कत्लेआम किया गया था। राजीव गांधी का यह  कुख्यात बयान कि जब पेड़ गिरता है तो धरती कापती है आज भी शायद ही कोई भूला होगा । बस फर्क इतना ही है कि धर्मनिरपेक्ष या सेक्युलर शब्द की लफ्फाजी करते हुए ये यह सब करती हैं  और संघ की तरह इनका ताना बाना नही है ।  
                हकीकत यही है कि भारतीय शासक वर्ग सांप्रदायिक व कट्टरपंथी ताकतों को शुरू से प्रश्रय देते रही हैं। और भारतीय राज्य सवर्ण हिन्दु मानसिकता से ग्रसित है। इसी का परिणाम यह है की एक ओर यह अपनी जहनीयत में महिला विरोधी , दलित विरोधी तो दूसरी ओर अल्पसंख्यक विरोधी है विशेष तौर पर सारे ही मामलो  में मजदूर- मेहनतकश अवाम के लोग। भारतीय शासक फिर इसे वक्त बेवक्त अपनी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करते रहते हैं । इसीलिए यह अनायास नहीं है कि कि टाटा ,अंबानी आदि आदि जैसे पूंजीपति फासिस्ट मोदी की तारीफ में कसीदे गड़ते हैं ।
                इस प्रकार सांप्रदायिक उन्माद  दंगा पैदा करके शासको द्वारा ना केवल सामुदायिक सौहार्द को खत्म कर दिया जाता है व  सत्ता पर पैठ बनाई जाती है बल्कि मजदूर मेहनतकश आवाम की एकता को खंडित कर दिया जाता है व उनके वर्तमान व भावी संघर्षो को कमजोर करने की दिशा में कदम भी बढ़ाया जाता है ।
और यह मजदूर मेहनतकश अवाम ही  है जो कि सांप्रदायिक दंगो के शिकार होते है व इसमें तबाह -बर्बाद होते हैं ।
                क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक दंगे में मारे गए लोगो के प्रति अपनी संवेदना व शोक व्यक्त करता है। इस घटना में शामिल लोग जिनके खिलाफ एफ आई आर  दर्ज है उन्हे तत्काल  गिरफ्तार करने की मांग करता है । सांप्रदायिक व कट्टरपंथी संगठनो पर प्रतिबंध लगाने की माँग करता है।  
समस्त मजदूर मेहनतकश अवाम से अपील करता है कि आइये!  इन सभी सांप्रदायिक व कट्टरपंथी  ताकतों व इन्हे प्रश्रय देने वाली  ताकत के विरोध में संघर्ष  एकजुट हो संघर्ष करें  ।                                                                                                
                                                                                                                क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन
               
               
               

                

position over national and international issue

         सीरिया पर अमेरिकी साम्राज्यवादी के संभावित हमले का विरोध करो !
       
         सीरिया में हर प्रकार की साम्राज्यवादी दखलंदाजी का विरोध करो !!  
                               
               
                ``जनतंत्र’’ की स्थापना के नाम पर अमेरीकी साम्राज्यवादियों  द्वारा अन्य पूंजीवादी मुल्को की संप्रभुता पर हमले की दास्ता काफी लंबी है । अपने हितो के प्रतिकूल पड़ती सरकारो के तख्तापलट की इनकी काली करतूते लातिनी अमेरिकी मुल्कों से समझी जा सकती है । रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल व जनवाद की स्थापना के नाम अमेरिकी साम्राज्यवादियों द्वारा इराक पर हमला बोल दिया गया और उससे पहले आतंकवादके खातमे के नाम पर अफगानिस्तान पर  हमला बोल दिया गया था। इराक पर हुआ हमला खुद साम्राज्यवादी मुल्कों  द्वारा खड़ी की गई संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ को अमेरिकी शासको द्वारा ठेंगे पर रखते हुए किया गया था बाकी साम्राज्यवादी मुल्क कैसे इस लूट मे अपने हिस्सेदारी हो इसकी रणनीति बना रहे थे   इराक मे हुए हमले के बाद से अब तक इराक मे अब तक कई लाख इराक़ी मेहनतकश नागरिक जिसमे मासूम बच्चे भी शामिल हैं  मारे गए है । दुनिया के सामने यह तभी स्पष्ट था कि दरअसल अमेरिकी (साम्राज्यवादी) पूंजीपति वर्ग अपने अर्थव्यवस्था के बढ़ते संकट को हल करने के लिए व  क्रूड ऑइल ( कच्चे तेल ) को नियंत्रित करने के लिए यह सब ताना बाना रच रहा है । जबकि अफगानिस्तान पर अमेरिकी शासको की दीर्घकालिक रणनीति ( सामरिक महत्व ) के तहत  था । और यह भी तभी स्पष्ट हो गया था कि आने वाले वक्त मे सीरिया, ईरान , लीबिया व  उत्तरी कोरिया अमेरिकी साम्राज्यवादियों की निगाह में है।
                टूनीशिया से बगावत के जो लहर शुरू हुई थी वह मिश्र आदि आदि मुल्क होते हुए सीरिया भी जा पहुची थी । मजदूर वर्ग समेत आम मेहनतकश आवाम बढ़ती बेरोजगारी , महंगाई से त्रस्त हो आक्रोशित  व आंदोलित होकर अपनी तानाशाही हुकूमतों से टकरायी । इन जनसंघर्षों को साम्राज्यवादी मुल्को विशेषकर अमेरिकी साम्रज्यवादियों ने अपने हितो के अनुरूप नियंत्रित करने को पूरा व्यूह रचा । मध्य पूर्व के इन पूंजीवादी मुल्को के ही पूंजीपतिवर्ग के दूसरे धडों  ने इन जनसंघर्षों  पर  अपना नेतृत्व बनाया अमेरिकी साम्राज्यवादियों का उन्हे पूरा सहयोग मिला । मिश्र के मामले मे इसे साफ साफ देखा जा सकता है ।
                सीरिया जैसे पूंजीवादी मुल्क में बसर  अल असद की सरकार के खिलाफ जो आक्रोश मेहनत कश जनसमुदाय में पैदा हुआ उसे भी धुर्त्त अमेरिकी शासको ने अपने नियंत्रण में करने का भरपूर अवसर के रूप में बदलने की कोशिश की । यहा भी  सीरियाई शासकों का  दूसरा धड़ा जो कि पिछले कई दशकों से सत्ता में बैठने को लालायित था उसने ही मेहनतकश आवाम के संघर्षो के नेतृत्व को हथिया लिया और दूसरी ओर इन्हे अमेरिकी शासकों ने हथियार से लेकर हर तरह से बसर अल असद की सत्ता को उलट देने में इनकी भरपूर मदद की । सीरिया के मामले मे विशेष स्थिति यह बनती थी कि अमेरिकी साम्रज्यावादियों से इसके संबंध पहले से ही खटास भरे रहे हैं यहा रूसी साम्राज्यवादियों का प्रभाव है उसका नौसैनिक अड्डा भी यहाँ है ।यह एक ओर  अमेरिका – इजरायल गठजोड़ का विरोध करता रहा है  तो दूसरी ओर फिलीस्तीन का समर्थन करता रहा है ।  इसीलिए अमेरिकी साम्राज्यवादी इस अपने द्वारा समर्थित विद्रोहको अवसर के रूप मे देख रहे थे  ताकि वहाँ अपना प्रभाव कायम कर सके व अपने संकट का बोझ दूसरे मुल्को  पर डाल सके तेल गैस व पेट्रो डालर पर नियंत्रण ही असल मकसद था  , हालांकि  यहाँ हमला  करना इनके लिए  इतना आसान भी नही है । अन्य साम्राज्यवादी मुल्क भी लूट मे हिस्सदारी के हिसाब से अपनी अपनी  रणनीति बना रहे हैं । भारतीय पूंजीवादी शासको की अवस्थिति की बात की जाय तो यह भी अपने हितो को साधने के लिए घृणित हथकंडे अपना रहा है । इस मुद्दे पर फिलहाल रूसी साम्राज्यवादियों के साथ खड़ा है ।
                अमेरिकी शासक जब इस  समर्थित विद्रोह से वहा हस्तक्षेप कर उसे अपने प्रभाव में लेने में सफल नही हो पाये तो अब वह इस मकसद के लिए  इस तथाकथित रासायनिक हमले द्वारा जनसहार के नाम पर सीरिया की संप्रभुता को रौदने की दिशा मे बढ़ रहा है।जिसका विरोध न केवल दुनिया की अमनपसंद व जनवादपसंद मेहनतकश जनता कर रही है बल्कि खुद साम्राज्यवादी मुल्क अमेरिका की  मेहनतकश अवाम भी इस हमले का विरोध कर रही है।
                सीरिया जैसे पूंजीवादी मुल्क में बसर अल असद के नेतृत्व मे सीरियाई पूंजीपति वर्ग की नग्न तानाशाही शासन मेहनतकश जनता के ऊपर कायम है पूंजीवादी जनवाद में जो सीमित अधिकार मेहनतकश को हासिल होते हैं वह यहा की अवाम को हासिल नही हैं। इसलिए भयावह बेरोजगारी व महंगाई को लेकर यहाँ मेहनतकश अवाम ने आक्रोशित हो जो संघर्ष शुरू किया था और बसर अल असद सरकार साम्राज्यवाद समर्थित विद्रोहियो से निपटने के नाम पर आम जनता का जो दमन कर रही है उससे निपटने के लिए जरूरी है की  उस संघर्ष पर अपना नेतृत्व कायम  किया जाय ।साथ ही  साम्राज्यवादी मुल्को की मुल्क के भीतर  हर दखलंदाज़ी का विरोध करने की जरूरत है अपने जनवादी अधिकारो को हासिल करने की दिशा में संघर्ष करने की सख्त जरूरत है और अंतत:  इस संघर्ष को नई ऊचाइयों तक पहुचाते हुए मजदूर वर्ग के नेतृत्व में सामाजवाद का निर्माण करने की जरूरत है। जबकि दूसरी ओर दुनिया की जनवादपसंद अवाम को सीरियाई मेहनतकश अवाम के साथ एकजुटता कायम करते हुए अमेरिकी साम्राज्यवादी मुल्क द्वारा होने वाले हमले का पुरजोर विरोध करने के साथ साथ यहा हो रहे  हर साम्राज्यवादी दखलंदाजी का विरोध करने की जरूरत है।           
               




अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम

  अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम        अंततः अमेरिकी साम्राज्यवादियों को फिलहाल पीछे हटना ...