Tuesday, 16 April 2019

मेरठ के भुसामंडी में लगी आग: तथ्यान्वेषी रिपोर्ट

 मेरठ के भुसामंडी में लगी आग:
       तथ्यान्वेषी रिपोर्ट

  क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन के कार्यकर्ताओं की टीम मेरठ के उस क्षेत्र में 13 मार्च को गई जहां 6 मार्च को लगभग 200 घर जलकर खाक हो गए थे। यहां मजदूर मेहनतकश अल्पसंख्यक परिवारों की सालों की मेहनत से जुटाया गया हर सामान उन्हीं के सामने जलकर खाक हो गया।  
       मेरठ में दिल्ली बस अड्डे से तकरीबन 1 किमी की दूरी पर भूसामंडी जगह पड़ती है। इसी इलाके में तकरीबन 1-2 एकड़ की जगह है, जो तीन तरफ से बंद है, बाहर निकलने का रास्ता सिर्फ एक ओर से है। अंदर शुरूवात में एक छोटा कारखाना था फिर तीन-चार लाइन में अल्पसंख्यक परिवार बसे हुए थे जबकि अन्त में हिंदू समुदाय के परिवार हैं। तकरीबन 200 मेहनतकश मुस्लिम परिवार पिछले अलग-अलग वक्त से यहां रहते हैं। कोई 20 साल से कोई 10 से तो कोई 3-4 साल से। ये सभी यहीं आस-पास के हैं न कि बांग्लादेशी। जैसा कि मीडिया प्रचार कर रहा है। इनमें से अधिकांश लोग झुग्गी-झोंपड़ी बनाकर रहते थे। जबकि कुछ लोगों ने कुछ पक्का मकान बनाया था। यहीं तकरीबन 10-15 परिवार हिन्दू समुदाय के भी रहते हैं जिनके घर पक्के व सही सलामत हैं। एक घर जो कि मुस्लिम परिवार के घर से लगा हुआ था उसके दरवाजे व टंकी जलने के अलावा कोई नुकसान नहीं हुआ। तथ्यान्वेषी टीम ने दोनों ही समुदाय के लोगों से बातचीत की।
       यहां अधिकांश मुस्लिम परिवार मेहनत मजदूरी कर परिवार का गुजारा करते हैं। झुग्गी झोंपड़ी बनाकर, प्लास्टिक की पन्नियां डालकर अपनी गुजर-बसर कर रहे थे। लोगों से बातचीत करने पर पता चला कि इस 1-2 एकड़ जमीन को मनोज शर्मा नाम के शख्स ने 3-4 लोगों को बेचा था जो कि मुस्लिम थे। फिर इन 3-4 लोगों ने जमीन गरीब मजदूर मेहनतकश मुस्लिमों को बेच दी। इन सभी के पास कोई दस्तावेज नहीं था जिससे साबित होता हो कि मालिकाना इन्हीं का है। छावनी बोर्ड इस जमीन को अपनी बताता रहा है। ये साफ है कि जमीन के मालिकाना सम्बन्धी दस्तावेज किसी के पास भी नहीं हैं। कुछ का कहना था कि अंग्रेजों के जमाने से ही ये जमीन लीज पर थी।
       इसी का फायदा उठाकर छावनी बोर्ड व पुलिस अवैध जमीन तथा अतिक्रमण का डर दिखाकर आये दिन वसूली करती रहती थी। लोगों ने बताया कि जब कभी भी कोई पक्के निर्माण की कोशिश करता था, पुलिस आ धमकती थी और अवैध वसूली करती थी। ऐसा नहीं कि केवल एक बार वसूली हो बल्कि यह बार-बार होता था। पुलिस ने इस आरोप से इंकार किया है।
      जैसा कि आम तौर पर गरीब बस्तियों में होता है, यहां भी कोई मुस्लिम परिवार अवैध शराब का छोटा कारोबार करता था। लोगों ने बताया कि 6 मार्च यानी आग लगाए जाने वाले दिन से कई दिन पहले पुलिस रात के 1-2 बजे उस अवैध कारोबारी समेत कुछ घरों में गैरकानूनी तरीके से घुस गई। कुछ लोगों से मारपीट की। दहशत में एक महिला बेहोश हो गई व एक नौजवान की दहशत के चलते हार्ट अटैक से मौत हो गई। पुलिस के इस अत्याचार के विरोध में इन लोगों ने पुलिस थाने पहुंचकर एक तहरीर दर्ज की थी। हमें यह बताया गया कि पुलिस इस तहरीर के चलते बहुत चिढ़ गई थी।
        6 मार्च को शाम 4 बजे के लगभग छावनी बोर्ड के लोग व पुलिस के लोग यहां पहुंच गए। लोगों ने बताया कि एक मजदूर जो पक्का निर्माण करवा रहा था, उससे वसूली करने आये थे। चूंकि इसने कुछ हजार रुपये कुछ दिन पहले ही पुलिस वालों को दिए थे इसलिए इस मजदूर परिवार ने इसका विरोध करते हुए पैसे देने से मना कर दिया। इसी पर झड़प शुरू हुई। इस वक्त अधिकांश पुरुष काम से बाहर थे। लड़के, महिलाएं व अन्य सदस्य ही घर पर थे। इसी झड़प में मामला आगे बढ़ा। पथराव हुआ। लाठीचार्ज हुआ। मौजूद लोगों में भगदड़ मची। इसी वक्त एक जगह से आग लगी व फैल गई। यह आग फैलती चली गई। प्लास्टिक ने आग पकड़ी, घर में रखा सामान आग की चपेट में आया फिर गैस सिलेंडर ने आग पकड़ ली, विस्फोट होने लगे। इस दौरान सभी लोग अपनी-अपनी जान बचाने के लिए बच्चों को लेकर बाहर सड़क पर निकल गए। जान बचाने के लिए एक ओर की दीवार भी तोड़ी गई।
       लोगों का कहना है कि यह आग पुलिस ने लगाई। न केवल आग लगाई गई बल्कि पेट्रोल बोतलों में भर कर छत पर फेंके गए। रबड़ के टायर भी छतों पर फेंके गए। इस दौरान जब फायर बिग्रेड की गाड़ी आग बुझाने आई तो पुलिस ने उसे आगे बढ़ने नहीं दिया फिर इसे दूसरे रास्ते से ले जाकर आग बुझाई गई लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पुलिस की इन हरकतों से लोगों ने आक्रोश में विरोध व जाम किया। कुछ तोड़-फोड़ भी हुई। अब आग लगाने के लिए भी पुलिस-प्रशासन ने अवैध शराब बेचने वाले मुस्लिम परिवार को जिम्मेदार ठहराया है साथ ही विरोध-सड़क जाम व तोड़-फोड़ करने के लिए भी मुस्लिम युवकों को निशाने पर लेकर जेल में डाला जा रहा है। इन परिवारों को मजबूर किया जा रहा है कि ये सभी को गिरफ्तार करवाएं।
      एक तरफ पुलिस का यह दबाव और दूसरी तरफ तन के कपड़ों के अलावा सब कुछ राख बन जाने, बहुत मेहनत व जतन से सालों की मेहनत स्वाहा हो जाने का सदमा। इस स्थिति में जिस सहारे की जरूरत थी वह है नहीं। शासन-प्रशासन का रुख सबक सिखाने का है। कांग्रेस, सपा जैसी पार्टियां इस वक्त नदारद हैं। बसपा के एक मुस्लिम सांसद हाजी याकूब व पूर्व मेयर हाजी शाहिद अशफाक ने आर्थिक मदद की है और खाने-रहने की वहीं पर व्यवस्था की है।
       हिन्दू समुदाय से जुड़े परिवारों के पास भी टीम गई। इनका कहना था कि वे खुद (हिन्दू समुदाय) यहां सालों से रह रहे हैं। तब यहां खेत थे। मुस्लिम समुदाय के लोग यहां बाद में आये। मुस्लिमों के प्रति नफरत की झलक इनकी आखों में साफ देखी जा सकती थी। इनका कहना था कि पुलिस व छावनी बोर्ड ने इनका (हिन्दू परिवारों) साथ दिया है व पुलिस ने आग नहीं लगाई। सरकार तो बहुत अच्छा काम कर रही है। हमें इन मुस्लिमों के बीच से गुजरने वाले एकमात्र रास्ते से जाना पड़ता है। हमें बाहर निकलने का अलग रास्ता चाहिए। ये लोग (मुस्लिम) पता नहीं कहां से आ गए। जिस दिन आग लगी उस दिन हम सभी को जान बचाने के लिए भागना पड़ा।
        कुल मिलाकर कुछ बातें साफ देखी समझी जा सकती हैं। मूल बात यही लगती है कि इस जमीन की कीमत आज करोड़ों में है जिस पर ये मुस्लिम परिवार सालों से रह रहे हैं। अब तक यह जमीन पुलिस व छावनी बोर्ड के लोगों के लिए अवैध कमाई का जरिया बनी हुयी थी। लेकिन इस बात की संभावना बनती है कि इस जमीन पर किसी की गिद्ध दृष्टि लगी हुई हो। इसमें छावनी बोर्ड के लोगों व पुलिस के लोगों को मोटी रकम मिल गयी हो। फिर आग लगाकर, खौफ पैदा कर इस जगह को छोड़ देने की परिस्थितियां निर्मित कर देने की सोच से साजिश रची गई हो। इसमें साम्प्रदायिकता से ग्रसित होने के चलते साथ ही गरीब मेहनतकशों के प्रति हिकारत का भाव होने के चलते पुलिस व छावनी बोर्ड द्वारा इस काम को बेझिझक, घोर संवेदनहीनता व अमानवीयता से अंजाम दिया गया हो। साथ ही यह संघ परिवार के लिए मुस्लिमों को सबक सिखा ध्रुवीकरण को आगे बढ़ाने का जरिया भी हो सकता है। यह सुनने को मिला कि यहीं बाहर शांति फार्म हाउस में एक बैठक उसी दिन हुई थी जिसमें कुछ भाजपाई भी शामिल रहे थे। जिस ढंग से हिदू समुदाय के परिवारों ने पुलिस को क्लीन चिट दी, सरकार को बहुत अच्छा काम करने वाला बताया तथा पुलिस से संरक्षण मिलने की बात कही, उससे भी यह संदेह गहराता है।

Tuesday, 19 February 2019

मोदी के 5 साल : देश किधर जा रहा है ?

अभियान:
       मोदी के 5 साल : देश किधर जा रहा है ?

     क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, परिवर्तनकामी छात्र संगठन, इन्कलाबी मज़दूर केंद्र व प्रगतिशील महिला एकता केंद्र द्वारा मोदी सरकार के 5 सालों के दौरान लागू की गई मज़दूर विरोधी, छोटे-मझोले किसान व आम मेहनतकशजन विरोधी नीतियों को बेनकाब करने हेतु एक अभियान उत्तराखंड,उत्तरप्रदेश, दिल्ली व हरियाणा के कुछ अलग अलग हिस्सों में चलाया।
       इस अभियान हेतु एक पुस्तिका जारी की गई जिसका शीर्षक था : मोदी के 5 साल-देश किधर जा रहा है ? इसके अलावा व्यापक अभियान के लिए एक पर्चा भी जारी किया गया जिसका शीर्षक था: बहुरूपिये रूप धर कर छलें इससे पहले उन्हें सबक सीखा दो !
     पुस्तिका में मोदी के 5 साल में अर्थव्यवस्था की खस्ता हालत, मज़दूर विरोधी फैसलों मसलन श्रम कानूनों व ट्रेड यूनियन को ध्वस्त करने वाले बदलाव, छोटे मझोले किसान विरोधी फैसलों, महिलाओं-दलितों-अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमलों जनवाद विरोधी कदमों, मोदी सरकार की साम्राज्यवादपरस्ती आदि कदमों को बेनकाब किया गया है।
     15 जनवरी से 15 के बीच यह अभियान चलाया गया। अभियान में अवाम के अलग अलग हिस्सों से व्यापक बातचित हुई। अभियान दलित व अल्पसंख्यक आबादी के बीच भी चलाया गया। अभियान में यह महसूस किया गया कि मोदी की छवि एक हद तक धूमिल हुई है।
      दलितों व अल्पसंख्यकों के बीच स्वाभाविक था कि संघ परिवार व मोदी सरकार की घृणित रुझान के चलते आक्रोश होता। मोदी भक्त मीडिया व संघी प्रचार को छोड़ दिया जाय तो अभियान में यह साफ दिखा कि जनता अलग अलग हिस्सों जे बीच कम या ज्यादा रूप में मोदी सरकार के खिलाफ एक गुस्सा या नाराज़गी है मज़दूर वर्ग के लिये तो वैसे भी यह समझना मुश्किल नहीं है कि 'प्रधान सेवक' उनका नहीं लम्पट पूंजी का सेवक है।

आतंकी हमले और अंधराष्ट्रवाद

आतंकी हमले और अंधराष्ट्रवाद    
      पुलवामा में मेहनतकशों के 42 बेटे कथित आतंकी हमले में मारे गये हैं यह बेहद दुःखद व निन्दनीय है। यह हमला आत्मघाती दस्ते के द्वारा अंजाम दिया गया। अब तस्वीर साफ होती जा रही है कि संभावित हमले की की खुफिया जानकारी होने के बावजूद सुरक्षा में भारी लापरवाही बरती गई या फिर हमले को हो जाने दिया गया।
      अब इस हमले के बाद मोदी और शाह की जोड़ी इसके जरिये चुनावों में अंधराष्ट्रवाद व युद्ध का उन्माद पैदा कर रहे है । कुछ समय से इनके बुझे हुए चेहरों में घृणित मुस्कान तैरती साफ देखी जा सकती है ये अपना चुनाव प्रचार अंधाधुंध तरीके से न केवल जारी रखे हुए हैं बल्कि सर्वदलीय बैठक जो इस आतंकी हमले के बाद रखी गई थी देश के पी एम ने इसमें उपस्थित रहना भी जरूरी न समझा वो चुनाव प्रचार  में निकल गए गृह मंत्री को बिठाकर। दूसरी ओर गोदी मीडिया अपने चैनल व अखबार पर तो संघ परिवार के लम्पट संगठन सड़कों पर युद्धोन्माद व अंधराष्ट्रवादी उन्माद पैदा कर रहे हैं। ये एक ओर पाकिस्तान को ललकार रहे हैं तो दूसरी तरफ संघी लम्पट कश्मीरी लोगों देहरादून से लेकर अन्य शहरों में हमलावर है उन्हें खदेड़ रहे हैं। अब यह इनके लिए 'वोटों की फसल' तैयार करने का जरिया बन गया है साथ ही बेरोजगारी, भ्रष्टाचार जैसे तमाम सवालों को पीछे धकेलने का औजार भी।
         ये सवाल करने को तैयार नहीं कि नोटबंदी के जरिये  कथित आतंकवाद की कमर तोड़ देने वाल दावों का क्या हुआ। ये यह बताने को तैयार नहीं कि जब एक तरफ उन्हें इतनी नफरत पाकिस्तान से है तो फिर क्यों मोदी के दौर में भारत पाक के बीच व्यापार साल दर साल बढ़ता रहा। निर्यात 1920 मिलियन डॉलर तो आयात 488 मिलियन डॉलर हो गया। क्यों फिर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का बेटा पाकिस्तान के नागरिक के साथ मिलकर कम्पनी चला रहे है ? आदि आदि।
       एक तरफ युद्द की ललकार दूसरी तरफ खरबो का व्यापार ! यही स्थिति पाकिस्तानी शासकों की है।
      आज़ादी के बाद दोनों ही देशों के पूँजीवादी शासकों ने कश्मीर को लेकर जो नीति बनाई और फिर बाद में एक दूसरे देशों को अस्थिर करने अपने घृणित हितों के अनुरूप एक दूसरे के मुल्कों में हस्तक्षेप करते रहे है। साथ ही अपने अपने देशों में दोनों देशों के शासक अपनी अपनी मेहनतकश जनता के दिलों में एक दूसरे के खिलाफ नफरत का बीजारोपण कर इसे आगे बढ़ाते गए हैं। यह अंधराष्ट्रवादी उन्माद  शासकों के लिए बड़े काम की चीज बन जाती है। सत्ताधारी पार्टी फिर सत्ता पर अपनी गिरफ़्त बनाये रखने के लिए भी इसका इस्तेमाल करती हैं।
         इन बातों के साथ साथ यह भी बात है कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद 'कश्मीर समस्या' पर कश्मीरी अवाम को अलगाव में डालने, क्रूर दमन तथा  साम्प्रदायिक उन्माद का जो घृणित खेल खेला गया उसने समस्या को विकराल बना दिया है। इन सब चीजों या कारणों से स्थिति बेहद जटिल बन गयी है। पिछले एक साल में आतंकी हमले बढ़ते गए हैं। पुलवामा की ही तरह का हमला लम्बे समय के बाद होने की बात कही जा रही है।
       इसलिए भारत व पाकिस्तानी पूँजीवादी शासकों की घृणित मंसूबों व नीतियों, अंतर्विरोधों के चलते हस्तक्षेप व इसके लिए पालित पोषित या फिर प्रतिक्रिया में उपजे कथित आतंकी संगठनों के हमलों में या फिर छद्म युद्धों में मेहनतकशों के बेटे ही मारे जाते हैं। ऐसा दोनों ही जगहों में होता है। इसलिए जरूरी है युद्धों व कथित आतंकी संगठनों को पैदा करने वाले पूँजीवादी निजाम को ध्वस्त किया जाय ।

Tuesday, 12 February 2019

जहरीली शराब से हुई मौतों के जिम्मेदार शासक ही हैं !

जहरीली शराब से हुई मौतों के जिम्मेदार शासक ही हैं !

       उत्तराखण्ड के रुड़की, यू पी के सहारनपुर व कुशीनगर में अब तक जहरीली शराब के चलते 100 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। हर बार की तरह फिर असल अपराधियों, शराब के अवैध कारोबारियों को बचाने का खेल खेला जा रहा है।   
       जहरीली शराब से होने वाली मौतों का मामला पहली दफा नहीं है। 2015 में मुंबई में गरीब बस्ती में 100 से ज्यादा लोग की मौत हुई थी। गुजरात में 2009 में 136 लोगों की जबकि 1987 में 200 लोगों की मौत हुई थी। पश्चिम बंगाल में 2011 में 170 लोग जहरीली शराब के चलते मर गए। कर्नाटक में 1981 में 308 लोग लोगों की मौत जहरीली शराब के चलते हो गई।       हर बार मरने वाले गरीब व मेहनतकश लोग ही होते हैं। सहारनपुर  व रुड़की में हुई मौतों में भी सभी गरीब मज़दूर मेहनतकश लोग ही हैं।
    शराब के अवैध कारोबारी बेहद सस्ती मिथाइल अल्कोहल(जहरीली शराब) का इस्तेमाल  करते हैं  या फिर गुड़ व शीरा को शराब बनाने के लिए  इसे जल्द सड़ाने के लिए इसमें रसायन का इस्तेमाल करते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि इसमें एथिल एल्कोहॉल(शराब) के साथ साथ मिथाइल एल्कोहॉल ज्यादा मात्रा में बन जाता है।  यह बहुत सस्ती बनती है। गरीब बस्तियों में इसी की सप्लाई कर दी जाती है। इसके अलावा भी कई बार जानकारी न होने के चलते गलत प्रक्रिया से किण्वन  (सड़ाने) के चलते शराब में मिथाइल एल्कोहॉल भी बन जाता है।
      मिथाइल एल्कोहल की थोड़ी मात्रा भी शरीर के घातक होती है इसे पीने के कुछ घंटों बाद आँखों की रोशनी चले जाती है और अंततः मौत हो जाती है। हालांकि जल्द उपचार मिलने पर एंटीडोट से बचाया भी जा सकता है।
शराब के अवैध कारोबार का पूरा का पूरा एक नेटवर्क बनता है इसमें आबकारी विभाग से लेकर पुलिस अधिकारी, शराब के अवैध कारोबारी व विधायक तक संलिप्त मिलेंगे। यह सस्ती व घटिया मिलावटी शराब गरीब मेहनतकशों तक पहुँचती है और इनके लिए जानलेवा साबित होती है।
इन मौतों के लिए यह मौजूदा व्यवस्था जिम्मेदार हैं शासक वर्ग जिम्मेदार है। मज़दूर मेहनतकश जन को शासकों व इनकी व्यवस्था ने कंगाल दरिद्र बना दिया है कि ये हर बेहतर चीज से महरूम हैं। सबसे ज्यादा घटिया निकृष्ट कोटि की चीज ही इन्हें मयस्सर है। खान पान से लेकर रहन सहन तक या फिर इलाज, यातायात व मनोरंजन के साधन ! किसी भी चीज को उठा कर देख लीजिए ! सबसे खराब गुणवत्ता वाली चीज का उपभोग करते ये गरीब मज़दूर मेहनकश जन मिलेंगे। यही स्थिति शराब के सम्बन्ध में भी सच है। सस्ती घटिया जानलेवा शराब ही इन्हें मिलती है।
जिंदगी की हताशा, निराशा, कुंठा व क्षोभ जो इस सिस्टम से पैदा होता है यह इन्हें नशाखोरी की ओर धकेलता है।
 शासक वर्ग के पास शराब को महंगा करने या फिर शराबबंदी करने के अलावा 'नशाखोरी' का कोई इलाज नहीं है। इन दोनों  कदमों का ही नतीजा भी होता है कि अवैध शराब का कारोबार का मार्केट छलांग लगाने लगता है। साथ ही बड़े स्तर पर कच्ची शराब भी बनने लगती है। यहीं फिर जहरीली शराब की संभावना बन जाती है। यह घटिया व सस्ती शराब गरीब बस्तियों तक पहुंचती है इसका नतीजा सहारनपुर रुड़की जैसी घटना में होता है। पूँजीवाद के रहते मज़दूर मेहनतकशों की ज़िंदगी इसी तरह रहनी है।

अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम

  अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम        अंततः अमेरिकी साम्राज्यवादियों को फिलहाल पीछे हटना ...