Sunday, 22 November 2015

                     बिहार में भाजपा की पराजय 


दिल्ली के बाद अब बिहार में मोदी व अमित शाह के साथ साथ संघ जुगलबंदी की फिलहाल सत्ता पर हथियाने की भरपूर कोशिश बुरी तरह नाकाम हो गयी। 
 
संघी स्वयं सेवकों मोदी-शाह की जोड़ी को बिहार में नितीश-लालू की जोड़ी ने पटकनी दे दी । ये दोनों चारों खाने चित्त हैं और इनके साथ भाजपा के उन सारे बड़बोलों की बोलती बंद हो गई है जो पिछले डेढ़ साल से बेहद उद्धत ढंग और हिकारत से अपने हर विरोधी को लतिया रहे थे। इसमें उन्होंने देश के जाने-माने बुद्धिजीवियों और कलाकारों को भी नहीं बख्शा था। 

बिहार विधान सभा का चुनाव मोदी-शाह की जोड़ी के लिए बेहद अहम था। इसमें सफलता के बाद वे उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में भी सफलता की ओर बढ़ सकते थे। इसके जरिये वे राज्य सभा में भी बहुमत हासिल करने की ओर बढ़ सकते थे जिसके बिना अंबानी-अदानी की सेवा करने की उनकी मंशा परवान नहीं चढ़ पा रही है। इसी कारण उन्होंने यह चुनाव जीतने के लिए जमीन-आसमान एक कर दिया। 

जहां अमित शाह ने बिहार में महीनों से डेरा ही डाल दिया था वहीं मोदी ने भी ताबड़तोड़ रैलियां कर डालीं। ज्यादातर केन्द्रीय मंत्री इस चुनाव में झोंक दिये गये। पता नहीं कितने हेलीकाॅप्टर इनके चुनाव प्रचार में लगाये गये। रुपये-पैसों का तो कोई हिसाब-किताब ही नहीं था। 

व्यक्तिगत प्रयासों के साथ इन्होेंने अपनी चुनावी रणनीति में भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। जातिगत समीकरण बैठाने के लिए उन्होंने राम विलास पासवान और कुशवाहा को साथ लिया तो जीतन मांझी को नितीश से तोड़कर अपने साथ मिलाया। अपने हिसाब से उन्होंने पिछड़ों, दलितों और महादलितों को साथ ले लिया था, सवर्ण तो पहले से उनके साथ थे। 

लेकिन इस जातिगत समीकरण को बैठाने के बावजूद वे जीत के प्रति आश्वस्त नहीं थे। इसीलिए उन्होंने शुरू से ही धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करने की कोशिश की। नरेन्द्र मोदी ने गाय और ‘बीफ’ (गोमांस) पर ध्रुवीकरण करने की कोशिश की। नरेन्द्र मोदी ने गाय और ‘बीफ’ का मुद्दा उछाला। अंत में तो बेशरमी की हद पार करते हुए उन्होंने मुसलमानों को धर्म के आधार पर आरक्षण का मुद्दा छेड़ दिया। 

मोदी-शाह का यह जाना-माना हथकण्डा था। इसे वे लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में पूरी तरह दक्षता से इस्तेमाल कर चुके थे। उत्तर प्रदेश में एक ओर जहां उन्होंने कुछ पिछड़ी और दलित जातियों को साथ लेने के लिए गठबंधन से लेकर अन्य तरह के हथकण्डे अपनाए वहीं धर्म के नाम पर गोलबंदी के लिए सारी हदें पार कर दीं। इस सबसे उन्हें आशातीत सफलता भी मिली। 

पर बिहार में वे यह अपनी उम्मीद के अनुसार सफल नहीं हो पाये। इसका सीधा सा कारण था कि बिहार में उनके प्रमुख विरोधी एक गठबंधन में एक हो गये। लोकसभा चुनावों में उत्तर-प्रदेश और बिहार दोनों में भाजपा की अप्रत्याशित जीत का प्रमुख कारण विरोधी खेमे का बिखराव था। इस बार नितीश-लालू-कांग्रेस गठबंधन ने जितनी सीटें जीती हैं वे उतनी ही हैं जितनी तब बनतीं जब वे लोकसभा चुनाव के दौरान मिलकर लड़े होते। बिहार में मोदी-शाह की इस अप्रत्याशित हार का कारण बिलकुल वही है जो लोकसभा चुनावों के दौरान उनकी जीत का था। फर्क केवल इतना था कि विरोधी तब बंटे हुए थे, अब एक हैं। 

इस तरह बात यह नहीं है कि नितीश कुमार के ‘सुशासन’ को इस बार बिहार की जनता ने स्वीकार कर लिया जबकि लोकसभा चुनावों में नकार दिया था। इस बार भी मतों के प्रतिशत में शायद ही कोई परिवर्तन हुआ हो। फर्क गठबंधन के होने या न होने का था। 

हेकड़ीबाज मोदी-शाह के गालों पर बिहार चुनावों में दनादन थप्पड़ पड़े हैं तो केवल इसी कारण कि वे अपनी लोकप्रियता के प्रति कुछ ज्यादा ही आश्वस्त हो गये थे। अन्यथा तो सच्चाई यह है कि भाजपा अभी भी बिहार में सबसे ज्यादा मत हासिल करने वाली पार्टी है। यानी भाजपा की व्यक्तिगत लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। यानी इन परिणामों से यह मान लेना कि यह भाजपा के पराभव को दर्शाता है, गलत है। 

दूसरे यह कि यदि कोई यह सोचता है कि मोदी-शाह की भाजपा बिहार चुनाव परिणाम से सबक सीखकर अपना रास्ता बदलेगी और हिन्दू साम्प्रदायिक फासीवाद को छोड़कर एक सामान्य दक्षिणपंथी पार्टी बनने की ओर बढ़ेगी तो यह खुशफहमी होगी। हिन्दू साम्प्रदायिक फासीवाद भाजपा के डी.एन.ए. में है। इससे भी ज्यादा यह मोदी-शाह के डी.एन.ए. में है। इसी के बल पर ये पिछले लोकसभा चुनावों में बहुमत हासिल करने में कामयाब रहे थे।

इसीलिए मोदी-शाह की भाजपा हिन्दू साम्प्रदायिक फासीवाद के एजेण्डे को नहीं छोड़ने वाली। आने वाले चुनावों में मोदी-शाह फिर यही करेंगे। उनके पास यही तुरुप का इक्का है। ‘विकास’ की सारी बातें भोले-भाले लोगों के लिए हैं या उन लोगों के लिए जो स्वयं को धोखे में रखना चाहते हैं। 

हां, यह हो सकता है कि इस चुनाव परिणाम के बाद भाजपा में मोदी-शाह की जोड़ी के एकक्षत्र अधिपत्य के प्रति विरोध के स्वर बुलंद हों और ऐसे दो-चार और झटकों के बाद इनमें से एक या दोनों की बलि चढ़ा दी जाये। तब भाजपा शायद वाजपेई टाइप भाजपा की ओर लौट आये जिससे नितीश कुमार जैसे ‘धर्मनिरपेक्ष’ ‘विकास पुरुषों’ को कोई परेशानी नहीं थी। 

इन चुनावों में हिन्दू साम्प्रदायिक फासीवाद के विरोधी खुश हो सकते हैं पर उन्हें लालू-नितीश-राहुल के प्रति कोई भी नरमी नहीं बरतनी चाहिए। भारतीय पूंजीपति वर्ग के ये सेवक भी मजदूर-मेहनतकश जनता के लिए कोई कम खतरनाक दुश्मन नहीं हैं। स्वयं हिन्दू साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर भी ये बेहद अवसरवादी रुख अपना सकते हैं जैसा कि इनका इतिहास बताता है। 
बिहार में मोदी-शाह के चारों खाने चित्त पड़ने के बावजूद न तो देश में हिन्दू साम्प्रदायिक फासीवाद का खतरा कम हुआ है और न लालू-नितीश-राहुल के जीतने से प्रगतिशील ताकतों को कोई बढ़ावा मिला है। यह सड़े-गले पूंजीवाद के भीतर चलने वाली उठा-पठक में से एक है। इसे इसी रूप में लेते हुए मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी गोलबंदी पर सारा ध्यान केन्द्रित करने की जरूरत है। हिन्दू साम्प्रदायिक फासीवाद को असल चुनौती लालू, नितीश, राहुल और केजरीवाल से नहीं बल्कि मजदूर वर्ग से और उसकी क्रांतिकारी पार्टी से ही मिलेगी                         

Friday, 30 October 2015

                                Repression of Occupy UGC’ movement
Delhi --- The students’of Delhi’s universities and J N U were  protesting against the University Grants Commission’s (UGC’s) . This struggle started against the decision to discontinue the non-National Eligibility Test (NET) Fellowship for research scholars.  But instead of hearing their voice the government deployed there police and paramilitary personnel with the intention of crack down on “Occupy UGC” movement. A group of protesters was picked up by ITBP and CRPF personnel from the UGC office premises and detained, while another group faced lathicharge at ITO .
        The decision of U G C was a blow for the students who were not NET qualified .  So The students have been asking for not just the reinstatement of the fellowship of Rs 5,000 and 8,000 per month, respectively for MPhil and PhD students, but also its increase. A delegation of students met UGC officials in the evening, but were not satisfied with the response. The protesters decided to organise an indefinite gherao of the UGC office . The UGC, meanwhile, decided to refer its decision to scrap the fellowship to an expert committee after the HRD ministry stepped in. According to ministry sources, the UGC justified scrapping of the fellowship on the grounds that there was little transparency and accountability in this scholarship programme. 
        The logic behind the decision was given by the ministry as  “Last year, the UGC disbursed Rs 99.16 crore under the non-NET fellowship. This is a huge amount and it was spent without any transparency. On one hand, we expect students to qualify NET to get fellowship and on the other we have students who don’t need to take any test to get financial aid. The UGC felt this amounted to double standards and decided to discontinue the non-NET fellowship,” said a ministry source.
        The protesters were “forcibly picked up” put in buses and taken to Bhalswa Dairy police station, nearly 20 km away.
        Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad (ABVP) activists who had kept away from the protest stayed put outside the UGC office. They were not touched by the paramilitary or police forces.
        A B V P exposed itself in this struggle .  ABVP pesident blamed that occupy UGC movement blaming central government for this decision
        The U G C decision is not a secret . it is apparent and everyone who know about the new economic reforms can get through it easily. Modi gov systematically cutting down the budget in favour of monopoly capital with fast pace. In financial year 2014-15 the government given a rebate in tax of 6 lakh carore to the capitalist . in additon to this Modi gov. cut down more than 2 lakh crore from the budget in favour of corporate.

        The decision to discontinue the non-National Eligibility Test (NET) Fellowship for research scholar and brutal repression of the agitators and the logic to nullify all the struggles being given by the sangh family and Modi gov again indicated clearly the faasist trend of Modi gov. 

                                                                शर्मनाक ! मगर ये हमारे दौर का सच है ।
       अच्छे दिनों का ख्वाब दिखाने वाले मोदी व उनकी सरकार उनके पीछे काम कर रही ताक़तें जिस मकसद से सत्ता पर आई हैं उस एजेंडे पर वह काम कर रही हैं । उस एजेंडे पर जितनी तेजी से वह आगे बढ़ जाना चाहते हैं उस पर भांति भांति के अवरोध हैं इसलिए वह आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं ।
                एकाधिकारी पूँजीपतियों की सेवा में नतमस्तक मोदी , मोदी सरकार  व संघ परिवार उनके अच्छे दिनों के लिए समाज का फासीवादीकरण लगातार कर रही हैं ।
                मोदी, भाजपा व संघ परिवार को देश का मतलब एकाधिकारी पूंजीपति के अलावा कुछ नहीं हैं । आज़ादी से पहले भी उनका कोई इतिहास खंगाले तो साफ हो जाएगा जिसका नतीजा आज उनके लिए यही है कि उनके पास अपना कोई नेता नहीं हैं । वह क्रांतिकारियो पर या  सुभाष , पटेल जैसे कांग्रेसी नेता को कब्जाने की कोशिश करते हैं।
                एक दौर में ब्रिटिश पूँजीपतियों व भारतीय सामंतों जमींदारों के लिए काम करने वाले आज अंबानी,अदानी टाटा जैसे इजारेदार पूँजीपतियों की सेवा में तल्लीन हैं ।
                आर्थिक सुधारों के जिस एजंडे को यह झटके से आगे बढ़ाना चाहते हैं इसमें यह मुंह की खा रहे हैं । एक तरफ खुद शासक वर्ग के बीच से दूसरी तरफ जनता के अलग अलग हिस्सों की ओर से तेज सुधारों के विरोध में आवाज उठ रही हैं ।
                दूसरी तरफ इन एक सालों में मोदी व मोदी सरकार बेनकाब भी हुई हैं । दिल्ली के चुनाव में 3- 4 सीट तक सीमटने वाली मोदी सरकार- मोदी-अमित शाह व संघ परिवार के मुंह पर यह एक करारा तमाचा था । यह अलग बात है कि यह तमाचा किसी क्रांतिकारी विकल्प की ओर से नहीं बल्कि खुद शासकों की ही अपनी पार्टी की ओर से मिला था ।
                अब बिहार चुनाव का दर चल रहा है । मोदी संघ की जुगलबंदी ने फिर से इन दिनों सांप्रदायिक एजंडे  को तेजी से आगे बढ़ाया है । यह वैसे भी उनकी जरूरत हैं और बिहार विधान सभा के चुनाव तथा फिर 2017 के उत्तर प्रदेश के चुनाव इन दोनों के मद्देनजर यह विकास व सांप्रदायिकता की खिचड़ी उबल रही हैं । और इससे भी ज्यादा यह आज के दौर के लम्पट अंबानी अदानी जैसे कॉर्पोरेट घरनों  की जरूरत है । इससे भी आगे बढ़कर यह आज के दौर के संकटग्रस्त पूंजीवाद की जरूरत है ।
                इसी जरूरत को संघ – भाजपा कभी आगे बढ़ते हुए  तो कभी पीछे हटाते हुए पूरी कर रहे हैं ।
                ना तो संघ को  ना ही मोदी को ना ही भाजपा को गाय से विशेष मोहबब्त हैं , ना ही देश की मेहनतकश आबादी से । ना ही उन्हें देश से प्यार है यदि देश का मतलब  बहुसंख्यक मेहनतकश जनता से है।  उनके लिए सब कुछ कॉर्पोरेट घराने हैं । देश का पूंजीपति है । पूंजीवादी व्यवस्था है ।
                 लव जिहाद के बाद आजकल ये बीफ या गौमांस के जरिये यही काम कर रहे हैं । अखलाक की मौत के लिए जिम्मेदार भी यही लोग हैं । दादरी में अखलाक बाद मेनपुरी व अन्य जगहों पर भी यही घटनाएँ हो चुकी हैं ।
                देश में इस असहिष्णु सांप्रदायिक  माहौल के खिलाफ जो विरोध के स्वर फूट हैं । उनका स्वरूप जैसा भी हो लेकिन चूंकी वह सत्ता पर बैठी हुई  फासिस्ट ताकतों के खिलाफ है ।  इसलिए संघी ताक़तें इसको हर तरह से नल्लीफ़ाई करने में लगी हुई हैं ।
                यानी अब विरोध का स्वरूप क्या हो,? कितना हो ?, किस मुसद्दे पर हो ? किस समय हो व  कहाँ हो  यह भी मोदी व संघ परिवार तय करेंगे व उनकी पसंदगी वाला विरोध विरोध होगा जबकि नापसंदगी वाला विरोध विरोध नही होगा । 
               
                 
           



             धर्मनिरपेक्षता का मखौल बनाम् वास्तविक धर्मनिरपेक्षता


    कहा जाता है कि किसी सच को झूठ से ढंकना हो तो उस झूठ को 100 बार दोहराया जाना चाहिए। भारत की संघ-भाजपा मंडली इस काम में सिद्धहस्त है और सबसे ज्यादा सिद्धहस्त हैं इसके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। पिछले लोकसभा चुनावों में इनके बारम्बार झूठ से गुजरात के विकास माॅडल को स्थापित किया गया और गुुजरात हर किसी को विकसित नजर आने लगा। लोकसभा चुनावों के एक वर्ष बाद भी प्रधानमंत्री अपनी वाक् कला से यह झूठ फैलाने का प्रयास कर रहे हैं कि देश गत एक वर्ष में अभूतपूर्व ढंग से विकास की राह पर बढ़ चला है और पूंजीवादी मीडिया की मेहरबानी से वे इस काम में भी कुछ हद तक सफल रहे हैं। हालांकि एक बड़ी आबादी का विकास की लफ्फाजी से मोहभंग भी हो चुका है और ऐसे लोगों में कई पूंजीपति भी हैं।
           
  संघ मण्डली और उसके प्रधानमंत्री अब इसी तरह का एक नया प्रयोग अंजाम दे रहे हैं। यह प्रयोग है किसी शब्द का इतना मखौल उड़ाया जाये कि वह अपना अर्थ खो दे। संघ व उसके चहेते मोदी दोनों को भारतीय संविधान में भारत को धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) घोषित किये जाने पर आपत्ति है। संघ तो देश को खुलेआम हिदू राष्ट्र बनाना ही चाहता है। ऐसे में इन शख्सियतों की इतनी हिम्मत तो है नहीं कि वे संविधान बदल दें इसलिए वे चोर दरवाजे से दूसरी रणनीति को अंजाम दे रहे हैं। 
           
यह रणनीति है कि सेक्युलरिज्म का इतना मखौल उड़ाया जाय कि लोग धीरे-धीरे यह भूल जायें कि भारत का संविधान भारत को एक सेक्युलर देश बताता है। कि लोग इस बात को धीरे-धीरे मान लें कि धर्म निरपेक्ष कहलाना एक मजाक बन जाये। इसमें कोई भूल कर भी यह सवाल न उठा पाये कि देश के प्रधानमंत्री जब धर्मनिरपेक्षता का मजाक उड़ाते हैं तो वे खुलेआम भारतीय संविधान का भी मखौल बनाते हुए एक अपराधिक कृत्य करते हैं। इसीलिए जब मोहन भागवत देश को हिंदू राष्ट्र करार देते हैं तो कोई भी आवाज इसे एक अपराधिक वक्तव्य ठहराने की नहीं उठती। 
           
  संघ मंडली ने सेक्युलरिज्म का मखौल उड़ाने का मुख्य जिम्मा प्रधानमंत्री मोदी को ही दे रखा है। अभी मोदी को देश के भीतर तो यदा कदा ही सेक्युलरिज्म का मजाक बनाने का मौका मिला पर जब भी उन्होंने विदेशों में अनिवासी भारतीयों को सम्बोधित किया तो इसका मजाक बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ा। 
           
पिछले वर्ष टोकियों में मोदी ने जब जापानी राजा को गीता भेंट की तो साथ ही यह भी कह डाला कि हमारे सेक्युलर मित्र इस पर तूफान खड़ा कर देंगे कि मोदी खुद को क्या समझता है। वे गीता को अपने साथ लाने पर उन्हें साम्प्रदायिक करार देंगे। इसके बाद बर्लिन में यह कहा कि किसी जमाने में जर्मन रेडियो संस्कृत में एक बुलेटिन प्रसारित करता था पर भारत में इस पर सेक्युलरिज्म के ऊपर इतना तूफान मच जाता कि संस्कृत भी विवाद में फंस जाती। और अभी हाल में 23 सितम्बर 2015 को आयरलैण्ड के डबलिन में मोदी का स्वागत संस्कृत के श्लोक व गीत से किये जाने पर उन्होंने टिप्पणी की कि अगर भारत में ऐसा करने का प्रयास किया जाए तो सेक्युलरिज्म पर सवालिया निशान खड़ा हो जाता।          
             इन सब वाकयों में मोदी गीता और संस्कृत को कुछ इस रूप में प्रस्तुत करते हैं कि ये हिन्दू धर्म से सम्बन्ध नहीं बल्कि भारतीय पहचान की चीजें हैं। क्या किसी धर्मनिरपेक्ष देश का प्रधान गीता व संस्कृत की वकालत करता नजर आना चाहिए। इसका जवाब स्पष्टतया यही होगा कि ऐसा होना ही यह दिखलाता है कि धर्मनिरपेक्षता वास्तव में स्थापित ही नहीं है। 
           
आजाद भारत में धर्मनिरपेक्षता को कभी वैज्ञानिक अर्थों में परिभाषित ही नहीं किया गया। किसी राज्य के धर्मनिरपेक्ष होने का सीधा अर्थ यह होता है कि राजकीय मसलों- राजनीति- शिक्षा आदि में धर्म का हस्तक्षेप बन्द कर दिया जाये। लोगों को व्यक्तिगत तौर पर जिस धर्म को वे चाहें मानने की स्वतंत्रता हो पर राज्य या सार्वजनिक जीवन में धर्म का कोई हस्तक्षेप न हो। राज्य वैज्ञानिक व तार्किक चिंतन को लगातार समाज में, शिक्षा में स्थापित करें। 

    पर भारत में धर्मनिरपेक्षता की उपरोक्त व्याख्या के बजाय सर्वधर्म समभाव के रूप में व्याख्या की गयी यानि राज्य सभी धर्मों के प्रति समान भाव रखे। सब धर्मों के आयोजनों को वह समान रूप से प्रश्रय दे। भारत के स्वाधीनता संघर्ष में कांग्रेस के तिलक-गांधी नुमा नेताओं की पृष्ठभूमि में धर्मनिरपेक्षता के वैज्ञानिक अर्थ ग्रहण करने की संभावना क्षीण ही थी क्योंकि ये नेता अक्सर हिंदू प्रतीकों का इस्तेमाल करते पाये जाते थे। 
             फिर भी आजादी के वक्त नेहरू के धर्मनिरपेक्ष भारत से आज तक लम्बी यात्रा तय की जा चुकी है। नेहरू ने अपने वक्त में देश के राष्ट्रपति को, मंत्रियों को गीता-कुरान दूसरों को भेंट देने से यह कहते हुए रोक दिया था कि धर्म निरपेक्ष देश के राष्ट्रपति, मंत्री को धार्मिक प्रतीक भेंट नहीं करना चाहिए। नेहरू ने राष्ट्रपति को किसी मंदिर के उद्घाटन तक में राष्ट्रपति की हैसियत के बजाय व्यक्तिगत तौर पर शामिल होने की सलाह दी थी। 
             आज नेहरू सरीखे व्यवहार की उम्मीद भाजपा नेताओं से तो दूर कांग्रेसी व अन्य दलों के नेताओं से भी किये जाने की उम्मीद बेमानी है। दरअसल वोट बैंक मजबूत करने के लिए अपने को धर्मनिरपेक्ष कहलाने वाली पार्टियां कांग्रेस-जनता दल आदि क्रमशः नरम हिंदुत्व की ओर झुकती चली गयी हैं। धर्मनिरपेक्षता की सर्वधर्म समभाव की व्याख्या ने इसमें मदद की है। यहां तक कि संशोधनवादी कम्युनिस्ट भी इस दौर में ‘नास्तिकता’ से डगमगाने लगे हैं। इसीलिए राजीव गांधी राम मंदिर के ताले खुलवाते हैं तो सोनिया बुखारी से वोट मांगने जाती हैं और कांग्रेस सेक्युलर होने का ढोल पीटती रहती है।            
             तथाकथित सेक्युलर पार्टियों के व्यवहार ने भी सेक्युलरिज्म का मखौल बनाने की मोदी की कोशिश में भरपूर मदद की है। ये पार्टियां खुद धर्म के आधार पर वोट जुटाने की तिकड़में करती हैं। हिन्दू वोट बैंक खिसक न जाये इस हेतु संघ के जहरीले वक्तव्यों के विरोध से डरती हैं और खुद को सेक्युलर करार देती हैं। संसदीय वामपंथी भी धर्मनिरपेक्ष ताकतों के तौर पर इनके साथ मोर्चा बना मोदी के धर्मनिरपेक्षता का मखौल बनाने का काम आसान कर देते हैं। 
             प्रधानमंत्री मोदी अभी भले ही विदेशों में सेक्युलरिज्म का मजाक बना रहे हों पर शीघ्र ही वे देश के भीतर भी यह हरकत बारम्बार करेंगे। वे सेक्युलर होने को एक गाली के बतौर स्थापित कर संघ की हिन्दू पहचान को मजबूती से स्थापित करना चाहते हैं। देश का शासक पूंजीपति वर्ग भी मोदी की इस कवायद में उसके साथ इस उम्मीद में खड़े हैं कि मोदी उनकी मुनाफे की राह सुगम बनायेंगे। इसीलिए मोदी एक ओर धर्मनिरपेक्षता का मखौल बनाते हैं तो दूसरी ओर संघी संगठनों के लोग धर्मनिरपेक्ष-तार्किक चिन्तकों की हत्यायें कर रहे होते हैं और शासक पूंजीपति वर्ग मौन धारण कर मोदी प्रशंसा में जुटा रहता है। 
           
संघ व एकाधिकारी पूंजी के गठजोड़ के इस चरण में इससे भिन्न व्यवहार की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। यह बात ही इस ओर संकेत करती है कि आज पूंजीवादी दायरे में धर्मनिरपेक्षता-तार्किकता को स्थापित करने की हर कवायद निष्फल होनी तय है क्योंकि यह नेहरू का नहीं मोदी का जमाना है। पूंजीपति वर्ग का हाथ अब नेहरू के सिर पर नहीं मोदी के सिर पर है। धर्मनिरपेक्षता को वास्तविक अर्थों (सार्वजनिक जीवन, राजकीय मसलों से अलग धर्म को व्यक्तिगत मसला घोषित करना) में स्थापित करने वाले सभी बुद्धिजीवियों-चिन्तकों को इसके लिए पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ खड़ा होना पड़ेगा। मजदूर वर्ग के नेतृत्व में चल रहे समाजवाद के लिए संघर्ष का हमराह बनना होगा। समाजवाद में ही धर्मनिरपेक्ष भारत का निर्माण होगा तब तक मोदी के सेक्युलरिज्म विरोध के साथ अन्य पूंजीवादी दलों के छदम सेक्युलरिज्म का पर्दाफाश करना होगा।  


अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम

  अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम        अंततः अमेरिकी साम्राज्यवादियों को फिलहाल पीछे हटना ...