Wednesday, 28 March 2018

'23 मार्च' भगत सिंह शहादत दिवस के 87 वें साल पर

       
         '23 मार्च' भगत सिंह शहादत दिवस के 87 वें साल पर



          23 मार्च 1931 का दिन भगत सिंह , राजगुरु व सुखदेव को अंग्रेजी हुक्मरानों द्वारा फांसी दी गई थी तब से अब 87 साल गुजर चुके हैं । इन 87 सालों में देश के शासक बदल गए। भगत सिंह की बातों में कहा जाय तो गोरे अंग्रेज तो चले गए काले अंग्रेज सत्ता पर काबिज़ हो गए। एक खतरनाक दमन, अंग्रेजी हुकूमत के आतंक साथ ही दंगों का दौर आज़ादी से पहले गुजरा था। और आज़ादी के बाद आज जब 'सवाल' उठाने पर पहरे लग रहे हों ; अधिकारों की -रोजगार की-महंगाई की बात करना गुनाह हो। जब मेहनतकश दलितों-मुस्लिमों के पक्ष में आवाज उठाना देशद्रोह हो ; हर चीज को जब 'धर्म-संस्कृति-देशभक्ति' की चाशनी में परोसा जा रहा हो;  जब चौतरफा नफरत और दंगो की ही साजिश रची जा रही हो तब कहना ही होगा कि यह वक़्त बेहद खतरनाक है !
           अवश्य ही ! जिस समाज का ख्वाब भगत सिंह ने बुना था यह वैसा समाज नहीं है। भगत सिंह व उनके साथियों का ख्वाब था देश आज़ाद हो ; कि आज़ाद भारत समाजवादी देश बने। जिसमें अन्याय उत्पीड़न शोषण के लिए कोई जगह न हो ; जिसमें धर्म लोगों का निजी मामला हो, कोई गैरबराबरी ना हो; जिसमें पूंजी की जकड़न से समाज मुक्त हो; मेहनतकश जनता में भाईचारा हो ।
             ऐसे समाज के लिए भगत सिंह व उनके साथियों ने कुर्बानी दी। वह न केवल अंग्रेजो से लड़े बल्कि देश के काले अंग्रेजों के भी वह विरोधी थे। भगत सिंह कहते थे कुछ फर्क नही पड़ेगा यदि अंग्रेज पूंजीपति चले भी जाएं उनकी जगह देश के पूंजीपति जमीदार शासक बन जाएं तो। यही वजह थी कि 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी दे दी गई और साथ ही राजगुरु व सुखदेव को भी।
              ये नौजवान शहीद हो गए मगर इनके विचार को अंग्रेज सरकार न मार सकी । इनके कुर्बानी व विचारों की चर्चा घर घर होने लगी। बस स्थितियां ऐसी बनी कि देश आजाद तो हुआ लेकिन सत्ता काले अंग्रेजो को मिल गयी।
             इन काले अंग्रजों की बदौलत आज संसाधनों व जनता की लूट खसोट निर्मम हो चुकी है। नोटबंदी व जी.एस.टी की हकीकत हमारे  सामने है। बढ़ती महंगाई, बढ़ती बेरोजगारी को हर कोई महसूस करता है। फैक्ट्रियों में मज़दूर का भयानक  शोषण है तो उधर किसान आत्महत्याएं कर रहे है।  लेकिन चैनलों में "चमकता भारत" है "खुशहाल जनता" है । टी वी चैनलों की-अखबारों की क्या कहें ? वंहा से जनता के दुख दर्द गायब हैं जनता के मुद्दे गायब हैं । वंहा चीख-शोरगुल,गाली-गलौज के सिवाय क्या है ? यंहा बस "धर्म-राष्ट्र-संस्कृति-युद्ध" का उन्माद है। "धर्म-राष्ट्र-संस्कृति" के ठेकेदारों का ही अब चौतरफा आतंक है। ये हिटलर-मुसोलिनी के भक्त अपने आतंक से जनता को रौंद रहे है। इनके आतंक से मेहनतकश इंसान कसमसा रहा है। दूसरी ओर शासक पूंजीपतिवर्ग है उसके मुनाफे का कारोबार इन सबसे बढ़ती पर है, शेयर बाजार आसमान छू रहा है। हाल ये है कि देश की कुल संपदा का 73 % हिस्सा देश के 1 % पूंजीपतियों के कब्जे में जा चुका है जो कि पहले 58 % था। यही वो "विकास" है जिसके जश्न मनाये जा रहे है। यही जनता की "खुशहाली" है।
                जनता की इस बर्बादी के लिए शासक पूंजीपति जिम्मेदार है । लंबे वक्त तक पूंजीपतियों ने कांग्रेस को सत्ता पर बिठाये रखा। अपने मुनाफे के कारोबार को बहुत बढ़ाया। मंदी का दौर आया तो पूंजीपतियों ने फासीवादी ताकतों को सत्ता पर बिठा दिया । 'अम्बानी-अडानी का हाथ अब मोदी-शाह के साथ' है इनके सर पर है। अब 'जनता को कंगाल बनाने -पूंजीपतियों को मालामाल करने' की स्कीम जोर शोर से चल रही है। इसीलिए 'पकोड़े बेचना' 'कबाड़ बेचना' 'गुब्बारे बेचना'  इनकी नज़र में रोजगार है। जनता इस लूट को न समझ पाए इसलिये 'फूट डालो-राज करो' का मंत्र हर ओर है।  इसीलिए दंगे अब कभी इधर तो कभी उधर बहुत जरूरी है। जनता 'हिन्दू -मुस्लिम' में बंट जाएं ऐसे मुद्दे बेहद जरूरी हैं । सीमाओं पर युद्ध जरूरी है। हथियारों के अरबों-खरबों के धंधे का सवाल जो है। फिर पड़ोसियों के खिलाफ घोर नफरत भी तो बहुत जरूरी है ताकि 'राष्ट्रवाद' का कारोबार चलता रहे और 'युद्ध' को जायज ठहराया जा सके । दोनों तरफ सीमाओं पर रहने वाले घरों में जो खौफ-दहशत व मौत पसरी रहती है उनको कोई क्यों सुने। इन दंगो में कौन मरता है ? सीमाओं पर कौन मरता है ? नोटबंदी से जो मरे वो कौन लोग थे ? क्या कोई पूंजीपति या नेता या बड़ा अधिकारी था ? नहीं । निश्चित तौर पर --मरने वाले मेहनतकश लोग थे। चाहे वह किसी भी धर्म के हों , जाति के हों या फिर क्षेत्र के हों । मेहनतकश जनता या उनके बच्चे ही सब जगह मारे जाते है।
                  मेहनतकश जनता मेहनत करती है संघर्ष में कुर्बानी देती है यही चीज है जो एकजुट करती है संगठित करती है। आज़ादी का संघर्ष हम मेहनतकशों की कुर्बानी को बताता है दुनिया हम मेहनतकशों की खून पसीने से ही रोशन है। इस खून-पसीने में कोई हिन्दू-मुस्लिम या ऊंची-नीची जाति नहीं बता सकता। यही वह चीज है बुनियाद है जो हमें ताकतवर बनाती है और जिससे शासक खौफ खाते है डरते हैं। अन्याय, शोषण और जुल्म से लड़ने में यही एकता मेहनतकश जनता का हथियार है । शहीद भगत सिंह इसी एकता की बात करते हुए अंग्रेजों से लड़ गए थे। यही आज की राह है।
                 इसलिए आज अंधेरे दौर में फिर से जरूरत है शहीद भगत को याद करने की। अपने दौर में भगत सिंह ने इन "धर्म-संस्कृति" के ठेकेदारों को खूब खरी खोटी सुनाई थी। भगत सिंह ने लिखा --“....जहाँ तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अख़बारों का हाथ है।.. यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर ....सिर-फुटौव्वल करवाते हैं...।....फायदा...इन दंगों से अत्याचारियों(अंग्रेजों को) को मिला है वही नौकरशाही-जिसके अस्तित्व को ख़तरा पैदा हो गया था....आज अपनी जड़ें ... मज़बूत कर चुकी है।.... .....संसार के सभी ग़रीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। .....तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताक़त अपने हाथ में लेने का यत्न करो।..1914-15 के शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग कर दिया था। वे समझते थे कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है, इसमें दूसरे का कोई दख़ल नहीं।...इसलिए गदर पार्टी-जैसे आन्दोलन एकजुट व एकजान रहे, जिसमें सिख बढ़-चढ़कर फाँसियों पर चढ़े और हिन्दू-मुसलमान भी पीछे नहीं रहे।"’( साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज " नामक लेख से)
              भगत सिंह की शहादत के 87 वें साल पर जरूरी है कि  विशेषकर युवा भगत सिंह की इस आवाज को सुनें जो भगत सिंह ने अपने दौर में युवाओं के लिए लिखी थी । भगत सिंह के शब्दों में ---
" चाहे तो त्यागी हो सकता है युवक, चाहे तो विलासी बन सकता है युवक।... वह इच्छा करे तो समाज और जाति को उद्बुद्ध(जगाना) कर दे..बड़े बड़े साम्राज्य उलट डाले।...अमेरिका के युवक विश्वास करते है कि अधिकारों को रौंदने वाली सत्ता का विनाश करना मनुष्य का कर्तव्य है। हे भारतीय युवक!... उठ, आँखें खोल,देख....गरज उठ !...( साप्ताहिक मतवाला में छपे लेख : "युवक" से )
आज वक़्त की जरूरत है कि शहीद भगत सिंह के विचारों की राह पर बढ़ा जाए ! संगठित हुआ जाय ! भगत सिंह के समाजवाद के ख्वाब को हकीकत में बदलने की दिशा में बढ़ा जाय।

                         

 

Friday, 15 December 2017

काकोरी के शहीदों की स्मृति में

    
         





     काकोरी के शहीदों की स्मृति में
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   अशफाक-बिस्मिल की विरासत को आगे बढ़ाओ!

 
         हर साल का दिसम्बर महिना काकोरी के शहीदों की याद हमें दिलाता है।  काकोरी के शहीदों का एक संगठन था - ' हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन'( एच आर ए ) ।  जिसका मकसद था  -संगठित व हथियार बंद होकर अंग्रेजी हुकूमत से देश को आज़ाद कराना ; आज़ाद भारत को 'संघीय व धर्मनिरपेक्ष गणतन्त्र ' बनाना जिसमें सभी प्रकार के  लूट-शोषण पर पाबंदी हो, कोई गैरबराबरी ना हो , भेदभाव ना हो।
   इस संगठन को आगे बढ़ाने के लिए, हथियार खरीदने के लिए पैसे की भी बहुत जरूरत थी । इसलिए संगठन ने तय किया कि सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन में जाने वाले सरकारी खजाने को लूट लिया जाय। और फिर 9 अगस्त 1925 को लखनऊ से पहले काकोरी स्टेशन के पास ट्रेन लूट ली गई। फिर अंग्रेज सरकार लूट में शामिल लोगों को पकड़ने के लिए दिन रात एक करने लगी। 40 लोग गिरफ्तार किए गए  फिर 17 लोगों को सजा सुनाई गई । इनमें से 4 लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई। 17 दिसम्बर 1927 को राजिंदर लाहिड़ी को फांसी दे दी गई । 19 दिसम्बर 1927 को अशफाक उल्ला खां, रोशन सिंह ,रामप्रसाद बिस्मिल को फांसी दे दी गई।
यह वह दौर था जब कॉंग्रेस भी 'आज़ादी'का नारा लगा रही थी। कांग्रेस भारतीय पूंजीपतियो व जमींदारों की पार्टी थी । ये  चाहते थे अंग्रेज चले जाएं और सत्ता इनके  हाथ में आये। इन्ही को शहीद भगत सिंह ने "काले अंग्रेज" कहा था।
  दूसरी ओर अंग्रेजों की 'फुट डालो-राज करो' तेजी से आगे बढ़ रही थी। अंग्रेजों को याद था -1857 का पहला स्वतन्त्रता संग्राम । जिसमें हिन्दू-मुस्लिम के एकजुट संघर्ष ने अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दी थी। हिन्दू-मुस्लिम जनता की एकता को तोड़ने के लिए अंग्रेजो ने हर चाल चली। हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक संगठन इनके हथियार बन गए। मुस्लिम लीग, आर-एस-एस व हिन्दू महासभा जैसे साम्प्रदायिक संगठन उसी समय के हैं ।
अशफाक-बिस्मिल जैसे नौजवान हिन्दू-मुस्लिम एकता की भी मिसाल थे। अशफ़ाक़ मुस्लिम थे तो बिस्मिल हिन्दू।  अशफ़ाक़-बिस्मिल-रोशन-लाहिड़ी को अंग्रेजी हुकूमत ने षडयंत्र रचने के आरोप में फांसी दे दी । लेकिन इनके बलिदान ने देश में संघर्ष को क्रांति को और आगे बढ़ा दिया । भारी तादाद में खासकर नौजवान आज़ादी के संघर्ष में कूद पड़े। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ पूरे देश में नफरत व गुस्सा बहुत बढ़ गया। मज़दूरों-किसानों-नौजवानों के क्रांतिकारी संघर्षों की लहरें बढ़ते गई। औऱ फिर हुआ यह कि अंग्रेज देश के पूंजीपतियों-जमींदारों (काले अंग्रेजों)  को सत्ता सौंप कर चल दिए। इनकी पार्टी 'कांग्रेस पार्टी' की सरकार बन गयी।
तब से बीते 60-70 सालों में कांग्रेस के अलावा अन्य पार्टियों की सरकारें भी बनी है या वे सरकार बनाने में शामिल रही है अब तो तीन साल से मोदीमय भाजपा बहुमत से सरकार चला रही है। 
 इन सभी पार्टियों ने देश के बड़े बड़े पूंजीपतियों के हितों को ही आगे बढ़ाया है। चंद करोड़ रुपये की पूंजी के मालिक 70 सालों में कई लाख करोड़ की पूंजी के मालिक बन चुके है। अब इनमें अम्बानी-अडानी-पतंजलि-अज़ीमप्रेम ज़ी आदि भी शामिल हैं।
उद्योगपतियों (पूंजीपतियों)व उनकी पार्टियों के बीच पहले एक पर्दा जो लगा रहता था मोदी जी व उनकी सरकार ने इसे भी फैंक दिया है। आज हर कोई कह सकता है देश को अम्बानी-अडानी चला रहे है कि मोदी सरकार अम्बानी -अडानी की सरकार है।  बैंकों का 8-12 लाख करोड़ रुपए कर्ज फंसा हुआ है इसका बड़ा हिस्सा देश के 8-10 पूंजीपतियो के पास है ये इसे वापस नहीं लौटा रहे है। मोदी जी व उनकी सरकार की योजना है कि इस कर्ज की रकम को बट्टा खाते में डाल दिया जाए। वसूली या संपत्ति को जब्त करने के बजाय सरकार 2 लाख करोड़ रुपए बैंकों में डालेगी। साफ है आम जनता की मेहनत की लूट से इसे वसूला जाएगा। यही नही ! बैंकों में जनता की जमा रकम पर डकैती डालने के लिए नया कानून एफ.आर.डी.आई. बनाया जा रहा है।
 मोदी व मनमोहन की नीतियों में कोई फर्क नहीं है। मोदी सरकार मनमोहन सरकार की नीतियों को धड़ल्ले से आगे बढ़ा रही है। आधार कार्ड , जी एस टी ये कांग्रेस के जमाने की ही चीजें थी। मोदी जी व भाजपा   पहले इनका खूब विरोध करते थे। लेकिन सत्ता हासिल होते ही जी.एस.टी लागू कर दिया जबकि आधार कार्ड हर नागरिक के लिए अघोषित तौर पर अनिवार्य कर दिया गया है।
नोटबंदी के लिए मोदी सरकार ने कहा था कि 4-5 लाख करोड़ रुपये वापस नहीं आएगा । क्योकि इनके हिसाब से 4-5 लाख करोड़ रुपये काला धन  था। लेकिन 1 करोड़ लोगों के बेरोजगार होने, 100 से ज्यादा लोगों की मौत व चौतरफा नुकसान के अलावा क्या हासिल हुआ ? कुछ भी नहीं। 16000 करोड़ रुपए हासिल हुए लेकिन इससे काफी ज्यादा पैसा तो नोट छापने व लोगो को व्याज देने में चला गया। इस नोटबंदी के दौरान दौलत किसकी बढ़ी ? अम्बानी से लेकर पतंजलि तक की । देश के 10 शीर्ष पूंजीपतियों की पूंजी में 50% से लेकर 170% तक की वृद्धि  हो गई।
सचमुच  हालात और खराब होते जा रहे हैं। 'फुट डालो-राज करो' अंग्रेजी हुकूमत के नारे को आज जमकर इस्तेमाल किया जा रहा है। आज 'महंगाई' 'रोज़गार'  'महंगी शिक्षा' 'महंगे इलाज' और अधिकारों के सवाल गायब कर दिए गए है। आज मेहनतकश जनता के एक हिस्से को मेहनतकश जनता के दूसरे हिस्से के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है। एक दूसरे के खिलाफ नफरत की दीवार खड़ी की जा रही है। आज हर तरफ 'गाय' 'हिन्दू' 'मुस्लिम' 'बीफ' 'राम मन्दिर' का शोर है। कोई क्या पहनेगा , क्या खायेगा , क्या पसंद करेगा, किसकी व कितनी आलोचना करेगा ? यह सब भी सरकार  उसकी पार्टी व संगठन तय कर रहे हैं। कुल मिलाकर फ़ासिस्ट हिटलर की चाल आज देश में दोहराई जा रही है। जर्मनी के थाइसेन व क्रूप्स जैसे बड़े बड़े पूंजीपतियो ने हिटलर व नाज़ी पार्टी को पाला पोसा था । फिर 1933 में सत्ता पर बिठा दिया । हिटलर ने प्राचीन जर्मन देश के महान होने के बात की ; जर्मन नस्ल के महान होने की बात जनता में की। यहूदी लोगों के खिलाफ नफरत पैदा की व दंगे आयोजित किये।  जर्मन जनता का एक हिस्सा इन बातों को सच मानने लगा । वह हिटलर व नाज़ी पार्टी के साथ हो लिया। फिर हिटलर के राज में लाखों यहुदियों का क़त्लेआम किया गया; ट्रेड यूनियनों, संगठनों, मज़दूरो,किसानों व छात्रों पर जानलेवा हमले किये गए । जनता के अधिकारों को रौंद दिया गया। यही नही हिटलर की पार्टी व दस्ते के बहुत सारे लोगों का भी सफाया कर दिया । चुनाव खत्म हो गए। इस प्रकार हिटलर ने आतंकी तानाशाही कायम कर दी ।
   आज यही खतरा एकदम हमारे निकट भी है । देश के बड़े बड़े पूँजीवादी घराने उसी दिशा की ओर बढ़ रहे है। जिस दिशा की ओर कभी जर्मनी गया था।
 इसलिए आज जरूरत है काकोरी के उन शहीदों से प्रेरणा लेने की ; एकजुट होकर संघर्ष करने की जिन्होंने महान उद्देश्य के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। जरूरत है मेहनतकश जनता को बांटने वाली ताकतों के खिलाफ एकजुट हुआ जाए। मेहनतकश जनता के राज समाजवाद की ओर बढ़ा जाए।

           

Friday, 10 November 2017

महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति शताब्दी वर्ष पर

महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति शताब्दी वर्ष पर
यह वक्त संकल्प लेने, काम में जुट जाने का है
    
      ‘महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति’ के सौ वर्ष पूरे हो गये। पिछले एक वर्ष से भारत सहित पूरी दुनिया में इस क्रांति के शताब्दी वर्ष को न केवल मजदूर वर्ग द्वारा याद किया गया बल्कि पूंजीपति वर्ग द्वारा अपने ही ढंग से याद किया गया। यहां तक कि रूस के आज के साम्राज्यवादी शासकों ने भी क्रांति को रूसी समाज की एक उपलब्धि के रूप में याद किया। इसे याद करने में कुछ ऐसा है जैसे कोई मौत के मुंह से बच गया हो।
        ‘महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति’ बीसवीं सदी की सबसे निर्णायक घटनाओं में ही एक नहीं थी बल्कि यह मानव इतिहास की सबसे निर्णायक घटनाओं में से भी एक साबित हुई है। इस क्रांति ने साबित कर दिया था कि शोषित मजदूर, किसान अपनी सत्ता कायम कर सकते हैं और शोषण-उत्पीड़न का समाज से नामोनिशान मिटा सकते हैं। इस क्रांति ने न केवल कई क्रांतियों को जन्म दिया बल्कि गुलाम देशों को अपनी आजादी हासिल करने में पे्ररणा से लेकर सीधी मदद की।
     ‘महान अक्टूबर क्रांति’ ने रूस के जनगण को वह सब कुछ दिया जो कि फ्रांसीसी या इंग्लिश या अमेरिकी क्रांति ने अपने नागरिकों से वायदा किया था। यह इतिहास की सच्चाई है आजादी, बराबरी, भाईचारे आदि की बातें करने वाली ये क्रांतियां महज पूंजीपति वर्ग की सत्ता प्राप्ति का जरिया बन गयीं। क्रांति में प्राण-प्रण से लगने वाले मजदूर, किसान, बुद्धिजीवी ठगे और छले गये। इसके उलट अक्टूबर क्रांति ने पहले ही क्षण आजादी, बराबरी, भाईचारे के नारे को पूर्णता प्रदान कर दी। फिनलैंड को जारशाही साम्राज्य से आजाद किया, सदियों से उत्पीड़ित स्त्रियों को पूर्ण बराबरी प्रदान की और समाजवादी रूस में सभी शोषित-उत्पीड़ित भाईचारे के अभिनव सूत्र में बंध गये।    
       ‘महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति’ का विजय रथ आगे न बढ़ सके इसके लिए उस वक्त के जालिम शोषकों ने हर कोशिश की। फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और जर्मनी जैसे देशों ने रूस में कायम हो चुकी मजदूर-किसान सत्ता को नष्ट करने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। वर्षों समाजवादी राज्य को देशी-विदेशी शत्रुओं से भीषण लड़ाई लड़नी पड़ी। शोषक किसी भी कीमत पर नहीं चाहते थे कि रूस में समाजवाद कायम हो। साम्राज्यवादी भयभीत थे कि कहीं उनके घर भी क्रांति की आग से न जल जायें।
        हकीकत में 1918 में यूरोप के कई देशों में ऐसा हुआ भी था। जर्मनी, हंगरी, इटली और आस्ट्रिया उन देशों में प्रमुख थे जहां मजदूर क्रांतियां दस्तक दे रही थीं। ‘सारी सत्ता सोवियतों को दो’, ‘समाजवाद जिंदाबाद’ जैसे नारे गली-गली में लगाये जा रहे थे। क्रांतियों की इस श्रृंखला का दमन पूंजीपति वर्ग भारी दमन व षड्यंत्रों के दम पर ही कर पाया। सौ वर्ष पहले मजदूरों ने शोषक पूंजीपतियों को दिन में ही तारे दिखा दिये थे। इसलिए क्रांतियों की काट करने के लिए उसने फासीवाद, नाजीवाद का सहारा लिया। इसीलिए वह अब जैसे ही संगठित क्रांतिकारी मजदूर आंदोलन का थोड़ा भी दर्शन करता है तो पूरी ताकत से बर्बरता पर उतर आता है। वह अपने संविधान को ताक पर रखकर तुरंत आपातकाल की घोषणा करने लगता है। लोकतंत्र, मानवाधिकार, प्रेस सभी निलंबित कर दिये जाते हैं।
       ‘महान अक्टूबर क्रांति’ से पैदा हुई ऊर्जा का विश्वव्यापी प्रसार पूंजीवाद के सारे हथकंडों के बावजूद उस जमाने में तेजी से हुआ। दूसरे विश्व युद्ध के बाद तो समाजवाद शब्द हर आजाद देश की जुबान पर चढ़ गया। चीन, कोरिया, वियतनाम की क्रांतियों ने समाजवाद को एक नई जमीन प्रदान की। यह ‘महान अक्टूबर क्रांति’ की प्रेरणा और मदद से ही संभव हो सका था।
       इतिहास की गति देखिये सौ वर्ष पूर्व दुनिया में कहीं समाजवाद नहीं था और आज सौ वर्ष बाद भी दुनिया में कहीं भी समाजवाद नहीं है। सौ वर्ष पूर्व पूंजीपति वर्ग अपनी सत्ता को लेकर पूर्ण आश्वस्त था आज वह अक्सर समाजवाद, मार्क्सवाद की चर्चा उपहास उड़ाने के लिए करता है। फिर क्या क्रांतियां अतीत की बात हो गयी हैं? क्या क्रांतियों का युग बीत चुका है?
     सच्चाई एकदम उलट है। क्रांतियां प्रकृति से लेकर मानव जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। वे लीक से हट कर होती हैं। और अपने चरित्र में वे सर्वदा अनुपम होती हैं। वे जब जन्म ले और विकसित हो रही होती हैं तब शोषक उनसे अंजान और लापरवाह बने रहते हैं। जब वे प्रकट होती हैं तो शोषक हक्के-बक्के और बदहवास हो जाते हैं। सौ वर्ष पूर्व जार, पूंजीपति जमींदारों ने कभी नहीं सोचा था कि उनके दिन पूरे हो चुके हैं। आगे बढ़े हुए, क्रांति कर्म में लगे मजदूरों ने नहीं सोचा था कि क्रांति के जरिये मुक्ति हासिल की जा सकती है। क्रांति उतनी ही सच साबित होती गयी जितना उसको लाने के लिए सारी मजदूर, किसान बहुसंख्यक आबादी काम करने लगी।
      ‘महान अक्टूबर क्रांति’ का सौवां वर्ष इस क्रांति को याद करने, सबक निकालने, संकल्प लेने का वर्ष है। पूंजी की गुलामी से मुक्ति की राह आसान नहीं है। पिछले सौ वर्षों में पूंजीपति वर्ग ने अपनी व्यवस्था की दीर्घजीविता के लिए बहुत सबक निकाले हैं। बहुत युक्तियां खोजी हैं। दुश्मन पहले से ज्यादा बलवान हुआ है पर महान अक्टूबर क्रांति हमें सिखलाती है कि इतिहास में सबसे बड़ी ताकत मजदूर, किसान है, जनता है। क्रांतिकारी जनता के सामने हर ताकत बौनी है। शासकों की सारी तिकड़में, युक्तियां उसके सामने फेल हैं।।    साभार -enagrik.com

Friday, 6 October 2017

बी एच यू की छात्राओं का संघर्ष और उसके निहितार्थ

बी एच यू की छात्राओं का संघर्ष व इसके निहितार्थ

     बनारस हिंदू विश्व विद्यालय की छात्राओं ने सितंबर माह के तीसरे हफ्ते में अपना संघर्ष शुरू किया था। यह संघर्ष सामान्य से असामान्य हो गया।
एक छात्रा के साथ यौन उत्पीड़न की घटना हुई। इसके विरोध में तत्काल ही छात्राएं एकजुट हुई। प्रॉक्टर से शिकायत हुई, कुलपति से शिकायत हुई। दोनों का ही जवाब तिलमिलाने वाला था पुरुष प्रधान मानसिकता से ग्रसित था। कुलपति तो संघ परिवार से जो था उसके नस नस में स्त्री विरोधी रुख था। छात्राओं से कहा गया कि होस्टल से 6 बजे के बाद बाहर मत निकलें।
छात्राओं की मांग थी सुरक्षा की, होस्टल परिसर में सी सी टी वी लगाने की। लेकिन इन्हें कुलपति व विश्वविद्यालय प्रशासन ने कान ही नही दिए।
अन्ततः छात्राओं को धरने पर बैठना पड़ा। एक मुद्दा जिसे तत्काल ही सुल्टाया जा सकता था उसे फासिस्ट मानसिकता ने दूसरे धरातल पर पहुंचा दिया।प्रोक्टरीयल बोर्ड के अपने लठैतों भी छात्राओं को डराने धमकाने का काम किया। छात्राओं के परिजनों को फोन के जरिये दबाव बनाने के प्रयास हुए। होस्टल छात्रावास में पानी, बिजली को भी बाधित किया गया। लेकिन संघर्ष में बाकी छात्र-छात्राएं भी शामिल होती गए।
इस दौरान प्रधानमंत्री भी वंहा से होकर गुजरे। आंदोलनकारियों को उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री महोदय जो कि बनारस के सांसद है कम से कम सांसद होने के नाते तो उनके बीच आएंगे, बात सुनेंगें। लेकिन उम्मीद ! वह भी फासिस्टों से !! इस उम्मीद को पूरा तो होना न था। इस सबने संघर्ष को आगे बढ़ाने का काम ही किया।
कुलपति, विश्वविद्यालय प्रशासन कुछ भी सुनने को तैयार न था। न ही योगी सरकार कोई हस्तक्षेप कर रही थी। वह भी सब कुछ होने दे रही थी। अंततः सबने मिलकर इस आवाज को खामोश करने के लिए अपने हाथ बढ़ाये।
तुरंत ही भारी तादाद में पुलिस फोर्स व अर्धसैनिक बल तैनात कर दी गई। महिला पुलिस की तैनाती नही की गई। यह सब मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए भी था लेकिन आंदोलन को इसने आगे बढ़ाने का ही काम किया।
साफ साफ तौर पर अब एक तरफ जनवाद, न्याय व प्रगतिशीलता के लिए बुलन्द आवाज थी दूसरी तरफ दमनकारी, जनवाद विरोधी, स्त्रीविरोधी प्रतिक्रियावादी ताकते थी। अन्ततः दमन चक्र चलाया गया। आंदोलन तात्कालिक तौर पर बिखरने के साथ-साथ कुछ हासिल कर गया साथ ही भविष्य के संदर्भो में नई उम्मीदों को भी जगा गया। प्रॉक्टर को इस्तीफा देना पड़ा। कुलपति को प्रकारांतर से हटना पड़ा नए कुलपति को लाना पड़ा। इस संघर्ष के साथ साथ अब यह भी तय हो गया कि आने वाले समय में ऐसी टकराहटें और भी बढेंगी। व्यक्तिगत मसलों पर जनवाद के भाव के चलते ही सही फासिस्ट ताकतों का नौजवान छात्र छात्राएं जबरदस्त प्रतिरोध करेंगी ।


अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम

  अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम        अंततः अमेरिकी साम्राज्यवादियों को फिलहाल पीछे हटना ...