Sunday, 24 February 2013


      ``सामुहिक अन्त:करण’’ के नाम पर `फ़ासीवादी सोच’’ को तुष्ट करती  फैसले सुनाती  न्यायपालिका
                       
      13 दिसम्बर 2001 को संसद पर हुए हमले के आरोप में योजनाकार के रूप में अफ़ज़ल गुरु को अन्तत: 9 फ़रवरी की सुबह फ़ांसी दे दी गयी और इसके बाद फ़िर यहीं तिहाड़ जेल के भीतर दफ़ना दिया गया अफजल गुरु ऐसा शख्स था जो एक दौर  में कश्मीरी राष्ट्रीयता के पक्ष में अपनी आवाज बुलन्द  करता था और फ़िर बाद में जो प्रतिक्रियावादी होकर इस्लामिक कटटरपंथियों के साथ हो लिया यहां से मोह भंग होने पर 1993 में नियमित उग्रवादी होते हुए भी उसने स्वेच्छा से बी.एस.एफ़. के सम्मुख आत्मसमर्पण कर दिया यह  हथियार डाल चुका शख्स अब पूरी तरह से भारतीय सेना पुलिस की निगरानी में था घोर दबाव में इनके लिये मुखबिरी भी करता था सन 2000 के उत्तरार्ध में स्पेशल टास्क फ़ोर्स ने उसे ट्रेनिगं देकर फ़िर सर्टिफ़िकेट देकर  उसे : माह के लिये स्पेशल पुलिस ओफ़िसरबना दिया   
      13 दिसम्बर 2001 को जब  संसद पर हमला हो गया जिसमें एक माली सात सुरक्षाकर्मी मारे गये। तो उसके अगले ही दिन 14 दिसम्बर, 2001 को दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने दावा किया कि उसने ऐसे कई लोगों का पता लगा लिया है, जिन पर इस षडयंत्र में शामिल होने का संदेह है। एक दिन बाद, 15 दिसम्बर को उसने घोषणा की कि उसने मामले को सुलझा लिया था’ : पुलिस ने दावा किया कि हमला पाकिस्तान आधारित दो आतंकवादी गुटों, लश्कर--तैयबा और जैश--मोहम्मद का संयुक्त अभियान था। इस षडयंत्र में 12 लोगों के शामिल होने की बात कही गयी। जैश--मोहम्मद का ग़ाज़ी बाबा ( आरोपी नंबर -1), जैश--मोहम्मद का ही मौलाना मसूद अज़हर ( आरोपी नंबर 2), तरीक़ अहमद ( पाकिस्तानी नागरिक ), पांच मारे गये पाकिस्तानी आतंकवादी’( आज तक हम नहीं जानते कि वे कौन थे ) और तीन कश्मीरी मर्द एस..आर. गिलान, शौकत गुरू और मोहम्मद अफ़ज़ल। इसके अलावा शौकत की बीबी अफ़सान गुरू। सिर्फ़ यही चार गिरफ़्तार हुए। 
       और फ़िर 15 दिसम्बर, 2001 को श्रीनगर पुलिस ने अफ़जल को श्रीनगर बस स्टॉप से पकड़ लिया। दिल्ली पुलिस ने अपना आरोप-पत्र एक त्वरित-सुनवाई अदालत में दायर किया निचली अदालत ( ट्रायल कोर्ट ) ने 16 दिसम्बर, 2002 को गिलानी, शौकत और अफ़ज़ल को मौत की सज़ा सुनायी। अफ़सान गुरू को पांच वर्ष की कड़ी कैद की सज़ा दी गयी। साल भर बाद उच्च न्यायालय ने गिलानी और अफ़सान गुरू को बरी कर दिया। लेकिन शौकत और अफ़ज़ल की मौत की सज़ा को बरकरार रखा। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने भी रिहाइयों को यथावत् रखा और शौकत की सज़ा को 10 वर्ष की कड़ी सज़ा में तब्दील कर दिया। लेकिन उसने मोहम्मद अफ़ज़ल की सज़ा को बरक़रार रखा।
      4 अगस्त, 2005 के अपने फ़ैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने साफ़-साफ़ कहा कि इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि मोहम्मद अफ़ज़ल किसी आतंकवादी गुट या संगठन का सदस्य है। लेकिन न्यायालय ने यह भी कहा है : ‘जैसा कि अधिकांश षड्यंत्रों के मामले में होता है, उस सांठ-गांठ का सीधा प्रमाण नहीं हो सकता और है जो आपराधिक षड्यंत्र ठहरती हो। फिर भी, कुल मिलाकर आंके जाने पर परिस्थितियां अचूक ढंग से अफ़ज़ल और मारे गये फ़ियादीनआतंकवादियों के बीच सहयोग की ओर इशारा करती हैं।
      यानि सीधा कोई प्रमाण नहीं है, लेकिन परिस्थितिजन्य प्रमाण हैं।
      फ़ैसले के एक विवादास्पद पैरे में कहा गया  : ‘इस घटना ने, जिसके कारण कई मौतें हुईं, पूरे राष्ट्र को हिला दिया था और समाज का सामूहिक अन्तःकरण तभी संतुष्ट होगा जब अपराधी को मृत्युदंड दिया जायेगा।
      और फ़िर  सामूहिक अन्तःकरण की संतुष्टि के नाम पर तर्क तथ्योंके आधार पर फ़ैसला सुनाने की   निर्णय लेने की परिपाटी को ठेंगा दिखाते हुए मौतका फ़रमान दे दिया गया। और इस प्रकार यह फ़ैसला समाज के उस फ़ासीवादी रुझान को जिसे शासक वर्ग पैदा कर  लगातार  इसे खाद पानी मुहया कर रहा है को तुष्ट करता है|शासक वर्ग  इस फासीवादी रुझान को और मज़बूत करता है फ़िर इसका इस्तेमाल करता है अपने व्यवस्था के संकटों को हल करने के लिये इसीलिये फ़ासीवादी संगठन इस पर जश्न भी मना रहे हैं। इसीलिये फ़ांसी की यह सजा महज कानूनी प्रश्न होकर राजनीतिक प्रश्न  है।कसाब इसके बाद अफ़जल इतने कम समय में दो फ़ांसी। यह निकट भविष्य में वाले संसदीय चुनावों के मद्देनजर लिया गया फ़ैसला भी है|
       इस फ़ैसले के तुरन्त बाद हीसशस्त्र बल विशेषाधिकार कानूनके तहत संगीनों के साये में पहले से ही रह रही अवाम पर  इस बार फ़िर पूरी ही तरह से शिकंजे में ले लिया गया | विरोध करने पर फ़िर वही दमन जिसमें लोग मारे गये घायल हुए| उन्हें फ़िर अलगाव में डालने वाली कार्यवाही की गयी| इसलिये  कश्मीरी अवाम को उसका सम्मान दिये बगैर, उसके अधिकारों को सम्मान दिये बिना उस अलगाव को जो भारतीय शासकों ने पैदा किया है उसको खत्म किये बगैर ना तो कश्मीर समस्या का ना ही फ़िर इससे उपजने वाले अलगाववाद कट्टरपंथी आतंकवाद को खत्म किया जा सकता है|
      लेकिन भारतीय शासकों के लिये यह संभव नहीं| पूंजीवादी लूट खसोट के लिये  जो शोषण-उत्पीड्न-दमन इन्होंने किया है ये उसे और जोर -शोर से आगे बढ़ाने के लिये आतुर हैं। इसलिये समाजवादी व्यवस्था की स्थापना के बगैर आत्मनिर्णय के अधिकार का लागू होना मुमकिन नहीं है।और यह अलगाववाद कट्टरपंथी आतंकवाद भी इसीलिए इस शोषण-उत्पीड्न-दमन के बने रहते हुए खतम नहीं हो सकता |

voice against repression



Wednesday, 20 February 2013

STOP REPRESSION OF PEOPLE'S MOVEMENT


People's movements are facing unprecedented repression not witnessed  in recent past. This bourgeois state is violating its own norms and written constitution. 'Rule of law' is long established principle , however we see  that  it is always ignored when people's movement armed with constitutional rights  pose a challenge  to anti-people state policies . Whether, it is movement against price-rise, demand for basic facilities i.e. water, power, education , employment or against corporate plunder of natural resources, trade union rights, state response is almost same.  
Recently , when women, students and other democratic organisations were protesting against Delhi gang rape case at India Gate , a curfew like situation was created. In the entire new Delhi district section 144 of Cr.P.C. was imposed  in order to clamp the entire area. 55000 activists  who were opposing nuclear project in Kudankulam  in Tamilnadu were booked under sedition law , those who are opposing plunder of natural resources is being subjected to 'oppression  green hunt'. Industrial workers have been ruined with protection they were having under pre-liberalization era of so-called  welfare state .  


अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम

  अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम        अंततः अमेरिकी साम्राज्यवादियों को फिलहाल पीछे हटना ...