Wednesday, 20 November 2019

क्रांतिकारी लोक अधिकार का सातवां सम्मेलन सम्पन्न

              

                                        
                     क्रांतिकारी लोक अधिकार का सातवां सम्मेलन सम्पन्न
     

          क्रांतिकारी लोक अधिकार का सातवां सम्मेलन 16 -17 नवम्बर को सम्प्पन हुआ। सम्मेलन में उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश के अलग अलग हिस्सों से प्रतिनिधियों ने इस सम्मेलन में भागीदारी की। सम्मेलन में पहले दिन राजनीतिक सांगठनिक रिपोर्ट पर चर्चा की गई। यहां राजनीतिक रिपोर्ट पर देश और दुनिया की अर्थव्यवस्था राजनीति व सामाजिक स्थिति पर चर्चा की गई। देश व दुनिया भर में घोर जनविरोधी आर्थिक नीतियों व जनविरोधी फासीवादी राजनीति पर गहरी चिंता व्यक्त की गई। रिपोर्ट में बताया गया कि साम्राज्यवादी मुल्कों के बीच बढ़ते अंतर्विरोध, पूंजीवादी साम्राज्यवादी लूट खसोट, इसकी आक्रमकता, तीसरी दुनिया के पूंजीवादी मुल्कों के शासकों का इनके साथ सांठगांठ ने स्थिति को जटिल बना दिया है इसके चलते एक ओर बड़े स्तर पर शरणार्थी संकट तो दूसरी ओर इसने सामाजिक संकट को गहरा दिया है। दुनिया के कई हिस्सों में उमड़ते जंससंघर्षों का हवाला देते हुए बताया गया कि फिलहाल क्रांतिकारी राजनीति बेहद कमजोर होने के चलते जंससंघर्षों  की सीमा बनी हुई है। वही सांगठनिक रिपोर्ट में अपनी कमियों को चिन्हित करते हुए इन्हें दूर करने के सम्बन्ध में कार्यदिशा प्रस्तुत की गई। सम्मेलन के अंतिम दिन देश के भीतर घटे तात्कालिक जनविरोधी हमलों व रुझानों पर प्रस्ताव पारित किए गए। शहीदों को श्रद्धांजलि, भीड़ हिंसा के सम्बन्ध में, कश्मीर से 370 को निष्प्रभावी किये जाने, फासीवादी हमलों के खिलाफ,  मज़दूर विरोधी वेज लेबर कोड बिल पर, यू.ए.पी.ए. में संशोधन ,  एन.आर.सी प्रक्रिया को रद्द किए जाने, सुप्रीम कोर्ट के बाबरी मस्जिद पर आए फैसले के सबन्ध में प्रस्ताव पारित हुए। इसके अलावा चुनाव हुए। नए पदाधिकारियों का चुनाव किया गया।
       इसके बाद सम्मेलन का खुला सत्र सम्पन्न हुआ। इसमें विभिन्न्न संगठनों के प्रतिनिधियों, आम जनता के बीच से लोगों ने शिरकत की।
      सम्मेलन में वरिष्ठ नागरिक गुलशन सूरी, बीमा कर्मचारी संघ से मनोज गुप्ता, बजाज मोटर्स कर्मकार यूनियन से कुंवर सिंह कंडारी, इंट्रार्क मज़दूर संगठन से सौरभ कुमार, भोजन माता संगठन से चम्पा, अधिवक्ता मो. यूसुफ, जनसत्ता से पत्रकार फलाश विश्वाश, मज़दूर सहयोग केंद्र से मुकुल, गुजरात अम्बुजा से कर्मकार यूनियन से रामजी , इंकलाबी मज़दूर केंद्र से खीमानंद, परिवर्तनकामी छात्र संगठन से महेंद्र, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र से रजनी, टेम्पो चालक यूनियन से कृष्णपाल, ठेका मज़दूर कल्याण परिषद से अभिलाख आदि ने बातें रखी। इसके अलावा माइक्रोमैक्स से नंदन सिंह, नेस्ले से महेंद्र सिंह, रिद्धि सिद्धि से कार्यकारिणी सदस्य जोशी जी, यजाकी से धर्मेंद्र तथा पीपल्स फ्रंट से ए पी भारती व आर डी एफ से कुंदन भी इस खुले सत्र में मौजूद रहे। समयाभाव के चलते कई साथी खुले सत्र को सम्बोधित नही कर सके।
   सभी वक्ताओं ने आज देश में रहे आर्थिक संकट, मज़दूरों-कर्मचारियों की छंटनी, बढ़ती बेरोज़गारी , बढ़ती महंगाई पर पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की साथ ही देश में सरकार द्वारा जनता के अधिकारों को कमजोर करने, जनता के अलग अलग हिस्सों के आंदोलनों को बदनाम करने व इनका दमन करने, जनता की निगरानी किये जाने, जनता के जीवन स्तर को और नीचे गिरने घोर जनविरोधी व पूंजीपरस्त नीतियों को लागू किये जाने के विरोध में अपना आक्रोश व्यक्त किया। हिन्दू- मुस्लिम, युद्ध का उन्माद पैदा कर मेहनकश जनता को बांटने उनके बीच गहरी नफरत पैदा किये जाने पर भी गहरी चिंता व्यक्त की इसे आम अवाम के खिलाफ खतरनाक कदम बताया।
        इसके बाद अंत में सत्यनारायण धर्मशाला से स्टेडियम तक सांकेतिक जुलूस कार्यक्रम किया गया। इसी के साथ संगठन का सातवां सम्मेलन जोश-ओ-खरोश व जनता जनवादी अधिकारों के लिए गोलबंद करने के दृढ़ संकल्पबद्धता के सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।
      
                                        
                                           

Tuesday, 12 November 2019

फासीवादी हिदू राष्ट्र की ओर बढ़ते कदम

फासीवादी हिदू राष्ट्र की ओर बढ़ते कदम
         
       अंततः बाबरी मस्जिद वाली कथित विवादित जमीन का मालिकाना न्यायालय ने हिन्दू पक्ष को देने के सम्बन्ध में अपना फैसला सार्वजनिक किया। 9 नवम्बर का दिन इस प्रकार फ़ासीवादियों के आगे न्यायिक संस्था के समर्पण का ऐतिहासिक दिन भी बन गया। यह फैसला अप्रत्याशित नहीं था पिछले साल भर से न्यायिक संस्था के रुख से यह साफ होने लगा था कि फैसला तथ्यों, तर्कों व संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर नहीं बल्कि यह आस्था के आधार पर होगा।
       न्यायालय द्वारा यह माना गया कि बाबरी मस्जिद ध्वंस होना ग़ैरकानूनी था गलत था इसी प्रकार यह भी कि 1949 में मस्जिद परिसर में मूर्तियां रखना गलत था, यह भी कहा गया कि मस्जिद के नीचे कुछ तो था मगर वहां मंदिर नहीं था और मस्जिद 16 वी सदी से बनी हुई थी। यह कहा गया कि अयोध्या में राम के जन्म को सभी हिन्दू मानते हैं यहां उनकी आस्था है हालांकि कोर्ट आस्था से नहीं चलता। मगर फिर फैसला आस्था के आधार पर दे दिया गया जिसमें 2.77 एकड़ जमीन हिन्दू पक्ष को दे दी गई। कहा गया कि सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड जमीन पर अपना मालिकाना हक को साबित नहीं कर सका इसे साबित करने के लिए दो- तीन सदी पुराने सबूत मांगे गये। सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड द्वारा प्रस्तुत राजस्व अभिलेख व गेजेट को खारिज कर दिया गया। हिन्दू पक्ष पर जमीन स्वामित्व से सम्बंधित कोई भी सबूत की मांग नहीं की गई।
      न्यायालय ने सरकार को मंदिर बनाने के सम्बन्ध में एक ट्रस्ट के गठन व इसमें निर्मोही अखाड़े को उचित प्रतिनिधित्व निर्देश दिया गया। मुस्लिम पक्ष के लिए 5 एकड़ जमीन अयोध्या में ही कहीं भी राज्य सरकार या केंद्र सरकार किसी भी द्वारा देने का निर्देश दिया गया। इस प्रकार सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के पास एक दौर में जो 67 एकड़ जमीन थी उसके अधिकांश का अधिग्रहण सरकार द्वारा 1993 में कर लिया गया था इसके बाद 2.77 एकड़ जमीन में से मात्र एक तिहाई  हिस्सा मुस्लिम पक्ष को देने का फैसला हुआ था अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने यह जमीन भी जो वक़्फ़ बोर्ड के पास थी जिसमें बाबरी मस्जिद थी पूरी तरह से छीन ली।
        इस फैसले से पहले संघियों ने कोर्ट के फैसला जो कुछ भी हो उसे स्वीकार किये जाने की खोखली बातें की थी। यह उन्हें पहले से ही भान था कि फैसला लगभग इसी ढंग का होगा। इसीलिए संघपरिवार के लोग मुस्लिम समुदाय से संबंधित संगठनों, बुद्धिजीवियों के बीच जाकर इस पक्ष में सहमत कराने व अपने पक्ष में सहमत कराने में जुटे थे। अब फैसला आ जाने के बाद 'एकजुट होने' 'मिलजुलकर  रहने', 'न किसी की जीत न किसी की हार होने' की पाखंडी, लफ़्फ़ाजीपूर्ण बातें कर रहे हैं। जबकि स्पष्टत: यह फ़ासीवादी ताकतों की जीत है। मौजूदा आर्थिक संकट के लिए तात्कालिक तौर पर जिम्मेदार व आम अवाम के जीवन को ज्यादा गहन संकट की ओर धकेलने वाली फ़ासीवादी ताकतें बाबरी मस्जिद जमीन के सम्बन्ध में मौजूदा फैसले से और ज्यादा ध्रुवीकरण करने की दिशा में कामयाब हुए हैं।
        जहां तक विपक्षियों का सवाल है सभी खुद को बहुसंख्यक आबादी यानी हिन्दू आबादी के पक्षधर दिखाने के खेल में व्यस्त हैं कॉंग्रेस तो खुद ही वर्तमान स्थिति के लिए जिम्मेदार है। सपा, बसपा, आप आदि सभी फैसले का स्वागत कर रहे है। इममें से कुछ तो यह भी कह रहे है कि कोर्ट के फैसले ने संघ परिवार से उनका मुद्दा छीन लिया है। ऐसा होने की एक वजह यह भी है कि ये भी जनवादी नही बल्कि भाजपा की ही तरह भ्रष्ट है। इन सभी को नरम हिंदुत्व को साथ लेकर चलने से कोई परहेज नही रहा है। सुधारवादी वामपंथी पार्टियां भी इस मसले पर 'धर्मनिरपेक्ष' व सही स्थिति लेने से कतरा रही हैं।
        कोर्ट का यह फैसला भले ही यह कहता है कि मस्जिद मंदिर तोड़ कर नहीं बनाई गई है। लेकिन इससे कोई विशेष फर्क नही पड़ता। क्योंकि फैसला संघियों के पक्ष में है इसे वह अपनी जीत के रूप में व हिंदुओं की जीत के रूप में दिखाने में कामयाब हैं। इनका यह घृणित मन्तव्य पूरा हुआ। हिंदुओं विशेषकर सवर्ण लोगों के दिमाग में लंबे वक्त से जो जहर संघ परिवार व इससे ग्रस्त मीडिया ने भरा है वह यह कि देश में कांग्रेस के दौर में सब कुछ मुस्लिमों के हिसाब से तय होता रहा है हिन्दू लोग सदियों से व कांग्रेस के दौर में उपेक्षित रहे है उत्पीड़ित रहे हैं।हिंदुओं के साथ भारी अन्याय हुआ है। इसे संघी शब्दावली में 'मुस्लिमों का तुष्टिकरण' कहा जाता है। इसलिए एक ऐसी घृणित व फासीवादी मनोदशा निर्मित कर दी गई है जिसका मकसद मुस्लिमों को उत्पीड़ित, अधिकारहीनता की स्थिति में धकेल देना है। हज सब्सिडी, तीन तलाक, एक देश में दो कानून, कश्मीर, बांलादेशी घुसपैठिये आदि आदि के जरिये यह बात जेहन में बिठाई गई है।
       कुलमिलाकर ये फैसला अल्पसंख्यक आबादी को असुरक्षा व अलगाव की ओर धकेलने वाला है इस फैसले ने पूरे तंत्र पर इनके भरोसे को बेहद कमजोर कर दिया है। अभी तक एक उम्मीद की किरण कोर्ट से थी मगर यह भी अब खत्म हो गई है। इसीलिए कइयों को यही कहकर खुद को तसल्ली देनी पड़ी "तुम्हारा शहर, तुम्हीं कातिल, तुम्ही मुंसिफ, हमें यकीन था, कसूर हमारा ही होगा" !
        यह फैसला केवल मुस्लिमों को दोयम दर्जे में धकेकने वाला नहीं है बल्कि देश की समग्र मज़दूर मेहनतकश आबादी के खिलाफ है यह इनके जनवादी व संवैधानिक अधिकारों को व्यवहार में खत्म करने की ओर जाता है। उन्हें भी दोयम दर्जे की ओर धकेलने वाला है।       

Monday, 30 September 2019

जम्मू कश्मीर का भारत में विलय तथ्यों के आईने में

जम्मू कश्मीर का भारत में विलय तथ्यों के आईने में

 
        डोमिनियन देश के रूप में भारत व पाकिस्तान को आज़ादी हासिल होते वक़्त भारत स्वतंत्रता अधिनयम में यह प्रावधान तय था कि जो रियासतें अलग रहना चाहती हैं वह अलग रह सकती हैं और जो अपना विलय भारत या पाकिस्तान जिस डोमिनियन स्टेट में करना चाहती है वह विलय कर सकती है। आज़ादी से पहले जम्मू कश्मीर कई रियासतों की तरह एक अलग रियासत थी। जम्मू कश्मीर के राजा तब हरी सिंह थे। अंग्रेजी हुकूमत के दौर में यहां भी प्रजा सभा ( विधान सभा) का गठन किया गया था तब केवल 10 % सम्पति वाले लोगों को ही वोट देने का अधिकार था जैसे कि बाकि भारत में था। जिसमें 33 चुने हुए प्रतिनिधि तथा 42 प्रतिनिधि नॉमिनेट होने थे।
       जम्मू कश्मीर के राजा हरी सिंह व प्रधानमंत्री राम चन्द्र काक आज़ाद जम्मू - कश्मीर के पक्षधर थे वे भारत में विलय के पक्ष में नहीं थे। जबकि शेख अब्दुल्ला पाकिस्तान से विलय के धुर विरोधी थे वह राजशाही के भी खिलाफ थे एक लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर बनाई जाने वाली सरकार के पक्षधर थे। भारत के साथ स्वायत्तता के साथ रहने के पक्षधर थे।  1930-32 में शेख अब्दुल्ला की अगुवाई में ऑल जम्मू कश्मीर मुस्लिम कान्फ्रेंस बनी जो 1939 में नेशनल कॉन्फ्रेंस हो गई। यह एक अलग धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के लिए आन्दोलन कर रही थी। इस आंदोलन में सभी धर्म व जाति के लोग थे। यह एक सशक्त आंदोलन था। पंडित सुदामा सिद्धा , प्रेम नाथ बजाज, सरदार बुध सिंह आदि ने नेशनल कॉन्फ्रेंस का राष्ट्रीय मांग पत्र का ड्राफ्ट तैयार किया। यह आंदोलन राजशाही के खिलाफ भी था । मई 1946 में शेख अब्दुल्ला की अगुवाई में नेशनल कांफ्रेंस ने 'कश्मीर छोड़ो ' का आंदोलन  शुरू हो गया । यह आंदोलन राजशाही के खिलाफ भी था। राजशाही ने शेख अब्दुला समेत कइयों को गिरफ्तार कर लिया। फिर 29 सितम्बर 1947 को छोड़ा गया। इस रिहाई में भारत सरकार की  भूमिका रही थी।
       जब भारत व पाकिस्तान आज़ाद हो गये थे। जम्मू कश्मीर की स्थिति  स्वतंत्र रियासत ( मुल्क ) की तरह थी। हरि सिंह ( जम्मू कश्मीर ) की  पाकिस्तान के साथ स्टैंडस्टिल ( कुछ वक्त तक रुके रहने  ) समझौता हुआ था। ।  मगर पाकिस्तान की कबायली सेना ने 22 अक्टूबर 1947 में जम्मू कश्मीर पर हमला कर दिया तब राजा हरी सिंह ने गवर्नर लॉर्ड माउंटबेटेन के लिए पत्र लिखकर आर्मी की मदद मांगी व विलय के दस्तावेज दिए।  गवर्नर जनरल माउंटबेटेन ने विलय के दस्तावेज को स्वीकार कर लिया इस प्रकार 26 अक्टूबर 1947 को समझौता हुआ। आर्मी भेजने का तय हुआ। चूंकि शेख अब्दुल्ला धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारत के साथ रहने के पक्षधर थे । अब इस स्थिति में जबकि हरी सिंह ने भारत में विलय के लिए बात शुरू कर दी तब गवर्नर माउंटबेटेन ने राजा हरी सिंह को अंतरिम सरकार का गठन करने तथा शेख अब्दुल्ला को प्रधानमंत्री बनाने को कहा । माउंटबेटेन द्वारा कहा गया कि विलय की प्रक्रिया में रियासतों में  किसी प्रकार के विवाद होने पर वहां की जनता द्वारा ही इस पर (विलय) फ़ैसला लिया जाएगा। 
        पाकिस्तानी हमले से निपटने के लिए शेख अब्दुल्ला की अगुवाई में आपातकालीन प्रशासन का गठन किया गया। शेख अबदुल्ला द्वारा एक मिलिशिया ( स्वयं सेवक सेना ) का गठन किया गया जिसने पाकिस्तानी की कबायली सेना से निपटना शुरू कर दिया। बाद में भारत की सेना भी  यहां पहुंच गई। 
        17 मार्च 1948 को शेख अब्दुल्ला प्रधानमंत्री बने जबकि हरी सिंह के बेटे कर्ण सिंह को 'सदर -ए -रियासत ' बने। भारत व जम्मू कश्मीर के बीच समझौते में तय हुआ कि रक्षा, मुद्रा , संचार, विदेश नीति के मामले केंद्र की सरकार यानी भारत के पास रहेंगे, बाकी शेष मामले जम्मू कश्मीर की सरकार तय करेगी इसकी अपनी संविधान सभा होगी, इसका अलग झंडा व अलग प्रधानमंत्री होगा। संविधान सभा को ही बाकी सारे अधिकार होंगे। यह भी समझौता था कि जम्मू कश्मीर का वह हिस्सा जो पाकिस्तान ने कब्जा लिया था उसे भारत सरकार कश्मीर की सरकार को वापस दिलाएगी। 1951 में जम्मूकश्मीर में सार्विक मताधिकार के आधार पर संविधान सभा के लिए चुनाव हुए।
         जम्मू कश्मीर के विलय की इस विशेष स्थिति के चलते अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा दिया गया। अनु 370 उसी समझौते का परिणाम था जो कि जम्मू कश्मीर व भारत के बीच हुआ था। अनु. 370 में साफ दर्ज था कि राष्ट्रपति कोई भी आदेश संविधान सभा की सहमति के बाद कर सकते हैं। समझौते के हिसाब से शेख अब्दुल्ला को जम्मू कश्मीर का प्रधानमंत्री बनाया गया। आर एस एस धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के लिए शेख अब्दुल्ला द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन का धुर विरोधी था तथा राजशाही के समर्थन में था इसलिए शुरुवात में यह जम्मू कश्मीर के स्वतंत्र देश के बतौर रहने के राजा हरी सिंह के फैसले का पक्षधर था भारत से विलय के पक्ष में नहीं था। मगर बाद में जब परिस्थितियां बदल गयी तब यह भारत में इसके पूर्ण विलय की बात करने लगा। इसने यहां नवम्बर 1947 में चुनाव में प्रजा परिषद नाम की  पार्टी खड़ी करके चुनाव में भागीदारी करनी शुरू कर दी । प्रजा परिषद का 1963 में जनसंघ में विलय हो गया।  इस दौर में यानी 1948 भारत सरकार इस मामले को संयुक्त राष्ट्र संघ में भी ले गई खुद नेहरू की ओर से इस मामले पर जनमत संग्रह का प्रस्ताव भी रखा गया क्योंकि उस समय उन्हें यह भारत के फेवर में पक्ष में जाता लग रहा था शेख अब्दुला ने संयुक्त राष्ट्र संघ में इस पक्ष में जोरदार दलील भी दी। पाकिस्तान ने तब इसका विरोध किया।  बाद में भारत जनमत संग्रह से पीछे हट गया। 1951 के संविधान सभा के कश्मीर में हुए चुनावों को ही भारत सरकार जनमत संग्रह के रूप में प्रस्तुत कर रही थी।
          1952 में जम्मू कश्मीर की अर्थव्यवस्था भारत के साथ पूरी तरह शेख अब्दुल्ला ने एकीकृत कर दी थी अब व्यापार व लोगो की आवाजाही पर जो पाबंदी थी भारत व कश्मीर के बीच वह हट गई। इस दौर में राजशाही खत्म कर दी गई । इस दौर में भारत सरकार पर आरोप लगे कि उसकी मंशा कुछ और ही थी कि वह इस समझौते को बेहद कमजोर या खत्म कर देना चाहती थी।
          इन आरोपों के बीच ही अचानक 'कश्मीर षड्यंत्र' के फर्जी आरोप में   1953  में प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला सहित 22 लोगो को गिरफ्तार कर लिया गया व जेल में डाल दिया गया। आरोप यह लगाया गया कि शेख अब्दुल्ला आजाद कश्मीर के लिए पाकिस्तान के साथ मिलकर साजिश रच रहे है। 11 सालों तक शेख अब्दुल्ला को जेल में रखा गया।   मिर्जा अफ़ज़ल बेग को 1954 के नवम्बर माह में रिहा कर दिया गया। जी एम हमदानी के साथ मिर्जा बेग ने 'जनमत संग्रह मंच' बनाया इसकी मांग सँयुक्त राष्ट्र संघ की निगरानी में जनमत संग्रह के जरिये जम्मू कश्मीर की जनता के आत्मनिर्णय के अधिकार ( जनता को अपने राज्य या देश की राजनीति आदि को तय करने का अधिकार ) की थी। इसका समर्थन 'कश्मीर राजनीतिक कान्फ्रेंस' 'कश्मीर जनतांत्रिक यूनियन ' तथा प्रजा सोशलिस्ट पार्टी' (जय प्रकाश नारायण व आचार्य नरेंद्र देव आदि की) ने भी किया।
दूसरी ओर शेख अब्दुल्ला आदि को तब जेल से  छोड़ा गया जब वह और उनकी पार्टी ने एक प्रकार से समर्पण कर दिया। 1964 में इनकी रिहाई हुई और जिन फर्जी मुकदमों पर 1953 में इनकी गिरफ्तारी हुई थी उन्हीं को अप्रेल 1964 में रहस्यमय तरीके से भारत सरकार ने वापस ले लिया। इस बीच 1954 में राष्ट्रपति के आदेश से 35 A जोड़ा गया था कहा जाता है कि यह पहले से ही कश्मीर में भिन्न रूप में था। 1956 में संविधान सभा भंग कर दी गई इसने 1956 में संविधान (जम्मू कश्मीर का) बनाया तथा इसमें अब  जम्मू कश्मीर को भारत का हिस्सा बताया गया।  संयुक्त राष्ट्र संघ ने संविधान सभा के 1951 के चुनाव को जनमतसंग्रह का विकल्प मानने से इंकार कर दिया। 1957 में इसकी जगह विधान सभा बना दी गई। बाद के समय में सदर-ए-रियासत तथा प्रधानमंत्री का पद खत्म कर दिया गया। इसकी जगह राज्यपाल व मुख्यमंत्री हो गया। दूसरी ओर जम्मू कश्मीर की सरकार को वायदे के मुताबिक वह हिस्सा जिसे पाकिस्तान ने कब्जा लिया था कभी वापस नही दिलाया गया यह पाकिस्तान के पास है इसे पाक अधिकृत कश्मीर कहा जाता है।
        यह आरोप है कि इसके बाद फिर भारत सरकार लगातार ही समझौते को और ज्यादा कमजोर करते गई। 1956-57 में जम्मू कश्मीर को भारत का हिस्सा घोषित कर दिया गया। बाद में राष्ट्रपति के आदेश से तथा विधान सभा को अपने हिसाब से ढालकर कई आदेशों के जरिये देश के तमाम कानून वहां लागू करा दिए गए ।1956 से 1994 के बीच  राष्ट्रपति के 47 निर्देश जम्मू कश्मीर के संबंध में जारी हुए लगभग 97 में से 94  संघीय विषय केंद्र सरकार के जरिये वहां लागू हो गए जो कि संविधान के 395 अनुच्छेदों में से 260 अनुच्छेद समेट लेती थी । 1965-66 में अनु 356 व 357 को लागू कर दिया गया। ये तथ्य साफ दिखाते है कि भारत सरकार पर जम्मूकश्मीर को छल बल से अपने में मिला लेने के आरोप हवाई नहीं थे। दूसरी ओर नेशनल कॉन्फ्रेंस की अवसरवादी व कमजोर भूमिका के चलते तथा भारत सरकार के विलय के प्रति रुख के चलते अलग आज़ाद धर्मनिरपेक्ष जम्मू कश्मीरी राष्ट्र के लिए जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट की अगुवाई में एक संघर्ष खड़ा हो गया था।  यह समूचे जम्मू कश्मीर यानी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को अपने दायरे में समेट लेता था । यह आंदोलन व्यापक होता गया। इसकी शुरुवात तो 65 से ही हो गई थी मगर यह संगठन 1977 में बना। यहीं से फिर इस आंदोलन को कमजोर करने के लिए आतंकवाद को पैदा करने पालने पोसने के आरोप भी सरकार पर लगे । भारत व पाकिस्तान दोनो की इसमें भूमिका होने के आरोप लगे। दोनो के अपने अपने निहित स्वार्थ थे। फिर आतंकवाद को खत्म करने के नाम पर भारी मात्रा में फौज की तैनाती वहां कर दी गई । चप्पे चप्पे पर फौजी जवान खड़े हो गए। इसे टाडा तथा पब्लिक सेफ्टी बिल व सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून के तहत दमन के लिए जो कुछ भी सम्भव हो वह करने की छूट दी गई । पिछले 45 सालों से जम्मू कश्मीर की अवाम संगीनों के साये में जी रही है । इनके जरिए सीधे सीधे केंद्र सरकार ही यहां शासन कर रही थी। 'विधान सभा भंग कर देना' 'राष्ट्रपति शासन लगा देना' यह सामान्य बन गया।  दूसरी ओर जे के एल एफ तो कुछ सालों बाद बहुत कमजोर हो गया। मगर आतंकवाद व अलगाववाद बढ़ता गया। एक प्रतिक्रियावादी आंदोलन भी इस दौर में पैदा हो गया या पैदा कर दिया गया जो इस्लामिक कट्टरपंथी आंदोलन था यह जम्मू कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाये जाने की वकालत करता था ।
        साफ है कि कोई भी जम्मुकश्मीर के आत्मनिर्णय के अधिकार का पक्षधर नही था। जम्मू कश्मीर की अवाम क्या चाहती है उसकी इच्छा आकांक्षा क्या है इससे किसी को कोई सरोकार न था। दोनो ही देशों के शासक इसे निगलने को तैयार थे। दोनों के लिए मात्र यह जमीन का टुकड़ा था मात्र एक बाजार था, प्राकृतिक संसाधन था व इसका इनके लिए एक भूरणनीतिक महत्व था। इनके बीच इसी को लेकर तीखे अंतर्विरोध भी थे। इसी को "राष्टवाद" की चाशनी में लपेट कर परोसा जाता है। साम्प्रदायिक उन्माद का खेल खेला जाता है।
         इस प्रकार देखा जाय तो जो समझौते जम्मू कश्मीर व भारत के बीच हुए थे। उन समझौते को बेहद कमजोर कर दिया गया।  370 के तहत जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिया गया मगर संविधान में इसे अस्थायी उपबन्ध के बतौर रखा गया था। हालाकि अनु 370 को हटाने के लिए राष्ट्रपति का आदेश तथा कश्मीर की संविधान सभा की सहमति जरूरी थी। लेकिन संविधान सभा तो 1956 में ही भंग हो गई । अब मौजूदा दौर में मोदी शाह की सरकार ने राष्ट्रपति के जरिये एक गैजेट नोटिफिकेशन जारी करवाया और 370 को खत्म करने का आदेश कर दिया। फिर इस पर तीन बिल लाकर भाजपा ने राज्य सभा व लोक सभा में इसे पास करवा लिया। 370 का खत्म किया जाना खुलेआम प्रक्रिया का उल्लंघन था। जम्मू कश्मीर की संविधान सभा की सहमति के बिना यह फैसला नहीं लिया जा सकता था जो कि अब वज़ूद में है नहीं। यदि संविधान सभा को विधान सभा माना जाय तो भी इस वक़्त कश्मीर में राष्ट्रपति शासन था विधान सभा भंग थी। राज्यपाल तो चुना हुआ प्रतिनिधि होता नही वह केंद्र सरकार का प्रतिनिधि होता है उसकी सहमति के कोई मायने नही। इस प्रकार मोदी-शाह की सरकार ने जम्मू कश्मीर की अवाम को बिना विश्वास में लिए अपने फासीवादी अंदाज में संविधान सभा या विधान सभा के माध्यम से नहीं बल्कि भारी मात्रा में वहां फौज भेजकर सारे जनवादी अधिकार छीनकर, कर्फ़्यू  जैसी स्थिति पैदा करके, एक प्रकार से जम्मू कश्मीर के नागरिकों व चुने हुए कई नेताओं को बंधक बनाकर राष्ट्रपति के आदेश को सीधे संसद में अपने बहुमत के जरिये पास करवाकर लागू करने की ओर बढ़ चुकी है यही नहीं इसके दो टुकड़े करके केंद्र शासित क्षेत्र में बदल देने का प्रावधान भी किया गया है। इस प्रकार शासक वर्ग ने जम्मू कश्मीर का भारत में पूरी तरह विलय करने की अपनी कुत्सित मंशा को 1948-52 से धीरे धीरे 70 सालों में मुकम्मल कर लिया। यह कहना ज्यादा सही होगा कि कांग्रेस ने 60 सालों में विशेष राज्य के दर्जे को इतना कमजोर कर दिया था कि मोदी शाह की भाजपा के लिए 370 को खत्म करना बेहद आसान हो गया। हालांकि कोर्ट में मामला गया है वह इसी आधार या तर्क पर है कि मोदी शाह सरकार की पूरी प्रक्रिया असंवैधानिक है क्योंकि इसमें विधान सभा से भी कोई सहमति  नही हुई है। कोर्ट का रुख क्या होगा यह आने वाला वक़्त ही बताएगा। जो भी हो। यह ध्रुवीकरण के लिए खतरनाक हथियार का काम और ज्यादा करेगा। साथ ही कश्मीरी अवाम के कष्ट दुख दर्द कई गुना और बढ़ जाएंगे।
          भाजपा व संघ परिवार के द्वारा ऐसे समय में जबकि अर्थव्यवस्था की मंदी की ओर बढ़ने, 45 साल में सबसे ज्यादा बेरोजगारी होने, उद्योगों की सेल में भारी गिरावट तथा बड़े पैमाने पर मज़दूरों की छटनी तथा विनिवेशीकरण व कर्मचारियों की छंटनी की खबर के बीच यह फासीवादी एजेंडा सचेतन चला गया कदम है। यह यहीं पर रुकने वाला नहीं है। यह अर्थव्यवस्था के संकट व जनसंघर्षों से निपटने का खतरनाक रास्ता है इस बात की संभावना है कि अमेरिकी साम्राज्यवादी  तथा इजरायल के साथ और ज्यादा सटने व उनके समर्थन से यह दांव चला गया हो।  इसमें चीन व पाकिस्तानी शासक भी इसे यूं नहीं जाने देंगे। अमेरिकी शासक इसके जरिये भारतीय शासकों को दबाव में लेने का काम करेंगे भले ही अभी वह समर्थक हों । इसी ढंग से रूसी साम्राज्यवादी भी। इसीलिए यह मुद्दा लंबे वक्त के लिए जनता को अंधराष्ट्रवादी उन्माद में धकेकने का जरिया बनेगा। शासक वर्ग के लिए यह बहुत फायदे की चीज है  विशेषकर जब अर्थब्यवस्था मंदी की ओर बढ़ रही हो। यह तात्कालिक तौर पर जनता के संघर्षों को कमजोर करने का जरिया भी है। संघ परिवार इसके जरिये अपने 'एक देश- एक झंडा- एक विधान' को पूरा करके खुद को "राष्ट्रवादी' के बतौर प्रचारित करने में कामयाब है जो कि अन्धराष्ट्रवाद के सिवाय कुछ नहीं है। अब यह अपने चरम आतंकी तानाशाही (फासीवाद) कायम करने की ओर बढ़ेगा। फिर जो कश्मीर में हो रहा है वह देशव्यापी हो जाएगा जिसके निशाने पर मज़दूर मेहनतकश अवाम होगी।






Wednesday, 17 July 2019

बजट: जूता सूंघाकर मूर्च्छा तोड़ने कीकोशिश

 बजट: जूता सूंघाकर मूर्च्छा तोड़ने कीकोशिश


बजट के दिन अजब-गजब नजारा था। संसद में वित्तमंत्री के बजट भाषण पर देश के प्रधानमंत्री मेज थपथपा रहे थे और शेयर बाजार में निवेशक अपनी छाती पीट रहे थे। अखबारों में बजट की भूरि-भूरि प्रशंसा और चैनलों में बजट की वाह-वाही के बीच आम आदमी पेट्रोल-डीजल के दाम में हुयी वृद्धि के बीच समझ नहीं पा रहा था कि बजट कैसा है।

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट भाषण से स्पष्ट कर दिया कि वह पूर्व वित्तमंत्रियों अरुण जेटली और पी चिदम्बरम से किसी मामले में कम नहीं हैं। शेरों-शायरी, उपमायें और किस्म-किस्म के बिम्बों से कैसे आम लोगां की आंखों में धूल झोंकी जाती है, उन्होंने इसका अच्छा उदाहरण पेश किया। और जो कसर बची थी उसे अगले दिन अखबारों ने पूरा कर दिया। ‘नारी तू नारायणी’ जैसे जुमले उछालकर बता दिया कि वह मोदी सरकार की काबिल मंत्रियों में है।

सच भले ही यह हो कि देश में कृषि क्षेत्र में तेज िंगरावट हो, औद्योगिक क्षेत्र मंदी की चपेट में हो पर मोदी सरकार यह सब्ज बाग दिखाती है कि 2024 तक भारत की अर्थव्यस्था 5 ट्रिलियन डालर की हो जायेगी। यानी आज की लगभग दुगुनी। और जब इस हवाबाजी की आलोचना शुरू हुयी तो आलोचकों की जुबान चुप कराने के लिए कहा गया कि वे ‘‘पेशेवर निराशावादी’’ हैं। और आलोचक पलटकर यह नहीं कह सके कि आप ‘‘पेशेवर लफ्फाजी’’ हैं और वित्तमंत्री ने आपकी शागिर्दी में यह हुनर बहुत जल्दी हासिल कर लिया है। वे भी अच्छी लफ्फाज बन गयी हैं।

सच भले ही यह है कि राजस्व घाटा बढ़ रहा है, निर्यात नीचे गिर रहा है। पूंजी निर्माण की दर निम्न है पर मोदी सरकार का दावा है कि भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। यह दीगर बात है मोदी सरकार के मंत्रियों और संघ-भाजपा के सूरमाओं के अलावा हर कोई इसका उल्टा महसूस करता हो। नामी गिरामी अर्थशास्त्रियों, पूंजीपतियों के अलावा सामान्य मजदूर भी महसूस करते हैं कि हालात ठीक नहीं है। आंकड़े बता रहे हैं कि बेरोजगारी चरम पर है, क्रय शक्ति घट गयी है, व्यापार ठण्डा है। आमदनी गिर गयी है।

यह सरकार राष्ट्रवाद की बात बहुत करती है। पर इस बजट में वित्तमंत्री के हाथ में कटोरा पकड़ने का पूरा जुगाड़ है। सरकार अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिये विदेशों से कर्ज लेगी। यह कर्ज इसलिये लिया जायेगा ताकि भारत के भीतर कर्ज लेने वालों को दिक्कत न हो। क्योंकि सरकार के देश के भीतर से कर्ज लेने से देश के भीतर कर्ज वालों को दिक्कत होती है। ब्याज की दरें चढ़ जाती हैं। क्या गजब का तर्क है। सच्चाई यह है कि सरकार ने देश के भीतर की संस्थाओं का ढंग से दोहन कर लिया है और उसे और निचोड़ने की सम्भावना कम है। और सबसे बड़ी बात विदेशी संस्थाओं से ऋण से मतलब सरकार रामबाण औषधि समझती है। विदेशी संस्थाओं से ऋण से मतलब होता है कि सरकार की बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के लिये धन की उपलब्धता बने और उन कम्पनियों को यहां से मुनाफा कमाने का मौका मिले जो इस वक्त मंदी के दौर से गुजर रही हैं। फायदा देशी-विदेशी पूंजीपतियों और वित्तीय संस्थाओं का होगा पर कर्ज का मूल और सूद भारत के मजदूर-मेहनतकश चुकायेंगे। भारत को कर्ज जाल में फंसाना, क्या बढ़िया राष्ट्रवाद है।

यह राष्ट्रवाद तब-तब मजबूत होता है जब-जब विदेशी कम्पनियां इस देश में निवेश करती हैं। और लूट-लूट कर मोटा मुनाफा ले जाती हैं। यह राष्ट्रवाद बताता है कि लुटेरे फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों की हथियार कम्पनी का राफेल लड़ाकू विमान देश की सुरक्षा के लिए कितना जरूरी है। और यह राष्ट्रवाद बताता है कि यह भी बहुत जरूरी है कि भारत के सैन्य अड्डों, बन्दरगाहों में अमेरिकी साम्राज्यवादियों की सेना घूमा करे। इस बजट में हथियारों की खरीद-फरोख्त आसानी से रूस, अमेरिका, फ्रांस जैसे लुटेरों साम्राज्यवादियों की कम्पनियों से हो सके इसका बड़ा प्रबंध किया गया है। इतने अनोखे ढंग से शायद ही कभी कोई देश इतिहास में मजबूत और सशक्त हुआ हो। पर भारत के राष्ट्रवादियों की हर बात अनोखी है। ऐतिहासिक है।

अपने पिछले कार्यकाल में मोदी सरकार ने अर्थिक सुधारों को जो गति दी, नोट बंदी की और जी.एस.टी. को लागू किया उसका नतीजा यह निकला कि देश के छोटे-मझौले उत्पादक यानी मुख्य तौर पर किसान, दस्तकार और छोटे व्यापारी और कारोबारी बरबाद होते गये। बरबादी को ये लोग महसूस न करें इसके लिये इन्हें राष्ट्रवाद का रासायनिक घोल पिलाया गया था पर फिर भी असर कहीं बीच में खत्म न हो जाये इसके लिये कुछ अन्य तरीके भी ईजाद किये गये। मसलन जब देश में एक तरफ कृषि व डीजल गैस आदि पर दी जाने वाली सब्सिडी व कर राहत खत्म कर दी गयी तो दूसरी तरफ प्रति वर्ष 6000रु किसानों की सहायता की घोषणा की गयी। यह राशि बरबाद होते किसानों को झूठा दिलासा देना है। ऐसा ही इस बजट में छोटे व्यापारियों को पेंशन देने की घोषणा के जरिये किया गया है। छोटे व्यापारी बड़ी-बड़ी रिटेल कम्पनियांं (ऑनलाइन सामान बेचने वाली, अमेजन फिलिप कार्ट कम्पनियां) की मार से बरबाद होते जा रहे हैं। बरबादी के शिकारों के लिये एक मामूली सी पेंशन। और उस पेंशन का भविष्य क्या होगा कोई नहीं जानता। ऐसी ही फर्जी पेंशन योजना चुनाव के ठीक पहले मजदूरों के लिए भी घोषित की गयी थी।

भारत को 5 ट्रिलियन डालर (343 लाख करोड़ रुपये) की अर्थव्यवस्था बनाने के लिये इस सरकार की अर्थिक नीतियां वही हैं जो पिछले तीन दशकों से चल रही हैं। निजीकरण के जरिये यह सरकार अपने राजस्व घाटे को पाटना चाहती है। रेलवे, एअर इण्डिया का निजीकरण इसके एजेण्डे पर है। साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का विनिवेशीकरण और उनकी भू सम्पत्ति को रियल स्टेट की लुटेरू कम्पनियों को देकर यह पैसा कमाना चाहती है। रेलवे का निजीकरण पूरी दुनिया में कहीं भी आसान नहीं रहा है। यहां तक कि ब्रिटेन और फ्रांस में भी नहीं। पर मोदी सरकार की ऐसी घोषणायें, इरादे अर्थिक संकट से जूझती अर्थव्यवस्था में जान फूंकने में अब तक नाकाम रहे हैं। 2007-08 के बाद का दुनिया का ही नहीं भारत का इतिहास भी ऐसा ही है।

बाजार के लुटेरे निवेशकों की स्थिति यह है कि वे कोई भी रुकावट अपने मुनाफे में नहीं चाहते। वित्त मंत्री की कम्पनियों पर कुछ मामूली टैक्स की घोषणा का बाजार की भारी गिरावट द्वारा प्रति उत्तर दिया जायेगा, यह अनुमान उस्ताद और शागिर्द दोनों को नहीं था। बाजार की लुढ़कन ने बता दिया कि बजट लुटेरों को रास नहीं आया। लुटेरों की खिदमत करने वाले अब क्या तरीका उन्हें खुश करने का निकालेंगे। यह कोई भी समझ सकता है। जो बात उन्हें पसन्द नहीं हैं उस काम को मत करो। बजट को दुरुस्त करो।

पर सरकार की दिक्कत यह है कि वह अपने राजस्व को कैसे बढ़ाये। मजदूरों, किसानों और अन्य मेहनतकशों को कितना लूटें। भारत के प्राकृतिक संसाधनों की कितनी बोली लगायें। यह काम तो तेजी और तेजी से कर रही है पर बात बन नहीं रही हैं।

असल में पूरी दुनिया की स्थिति यही है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का संकट ऐसा है कि वह उन उन्नत शिखरों को भी छू रहा है जो अब तक महफूज थे। उनको भी अपने लपेटे में ले रहा है जो उसे महफूज करने के धन्धे में लगे थे। कई सरकारें कर्ज जाल में फंस गयी हैं। 

यह बजट भारतीय अर्थव्यवस्था की मूर्छा को तोड़ने की वैसी ही हरकत है जैसे कोई मिर्गी के मरीज को जूता सुंघाता है। और उम्मीद पालता है कि वह इससे ठीक हो जायेगा। खुदा न खास्ता मरीज की मूर्छा जूता सूंघने से टूट भी जाये पर इससे उसका रोग नहीं जाता है।

अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम

  अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम        अंततः अमेरिकी साम्राज्यवादियों को फिलहाल पीछे हटना ...