Sunday, 22 March 2020

भगत सिंह शहादत दिवस पर


                  भगत सिंह शहादत दिवस पर
        
        इतिहास, आज कुछ बदले रूप में, फिर उसी मोड़ पर पंहुच रहा है, जहां 100 साल पहले था; जब 'आज़ादी' के नारे 'अपराध' थे, जब 'अधिकारों' की बातें करना 'जुर्म' था, ऐसे नारे लगाने वाले 'आतंकी' कहलाते थे; तब गुलामी के ख़िलाफ़ और आजादी के लिए लड़ते हुए आम जनता ने गोलियां खायीं थी, मुकदमे झेले थे, फांसी और कालापानी की सजा पाई थी। तब देश आजाद हुआ।
आज स्थितियां गुजर चुके जमाने की याद दिला रही है। आज फिर से 'आज़ादी' के नारे 'देश विरोधी' हो चुके हैं, 'अधिकारों' के लिए लड़ते छात्र, नौजवान, बेरोजगार, आदिवासी, मज़दूर, आम दलित और मुस्लिम 'टुकड़े-टुकड़े' गैंग कहे जा रहे हैं।'आज़ादी' 'अधिकार' 'समानता' व 'धर्मनिरपेक्षता' जैसे शब्दों के खिलाफ 'नफरत' पैदा कर दी गयी है ताकि आम जनता को 'फासीवादी गुलामी' की ओर आसानी से धकेला जा सके।
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव तीनों ने उस दौर को देखा था, जब जलियावालाबाग हत्याकांड रचा गया था, जब रौलेट एक्ट जैसे काले कानून बने थे। जिसका मकसद जनता के संघर्ष को कुचल देना था। 'न वकील, न दलील, न अपील,' यही रौलेट एक्ट का मतलब था। इसमें किसी को भी केवल शक के आधार पर जेल में ठूंस दिया जाता था।
 अंग्रेज शासकों को भगत सिंह और राजगुरु, सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों से बहुत खतरा था, इसलिए इन्हें 23 मार्च 1931 को फांसी दे दी गई।
 कोई कह सकता है, आज तो देश आजाद है, आज कोई विदेशी शासक नहीं है जो हम पर शासन करे। फिर आज इस सबकी क्या जरूरत? भगत सिंह के शब्दों में इसका जवाब यही है कि आज 'गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेजों का राज है'। आज आम जनता के कंधों पर भारत के शासक पूंजीपतियों का जुआ है। आज भी भारत की यह आम जनता अमेरिका, रूस जैसे ताकतवर साम्राज्यवादी मुल्कों की लूट-खसोट की शिकार है। यह लूट-खसोट सीधे-सीधे नहीं होती बल्कि यह लूट-खसोट हमारे शासकों के दम पर ही होती है। दोनों अपनी औकात के हिसाब से लूट-खसोट करते हैं व हिस्सा-बांट करते हैं।       
        आज आज़ादी के 70 साल बाद आम जनता को क्या हासिल है? कहने को हम 'आजाद' हैं, मगर इतने आजाद हैं कि 'आजादी' के नारे लगते ही 'ठोक कर देंगे-आज़ादी' 'पेल के देंगे- आज़ादी' की धमकियां मिलने लगती हैं। कहने को तो हमें 'सरकार की गलत नीतियों' की आलोचना करने का भी अधिकार है ! सरकार से 'असहमत' होने का भी अधिकार है! हमें 'धरना', 'विरोध प्रदर्शन' करने व संगठन बनाने का भी अधिकार है मगर हकीकत क्या है?
       हकीकत यह है कि आज जो कोई भी 'मोदी सरकार' की आलोचना करे, उसे 'देशविरोधी' कहा जाता है, 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' 'अरबन नक्सल', और भी ना जाने, क्या-क्या कहा जाता है।  स्थिति यह है कि कर्नाटक में 9-10 साल के कुछ बच्चों पर भी राजद्रोह (देशद्रोह) का मुकदमा दर्ज कर दिया जाता है, उन्हें पुलिस द्वारा टॉर्चर किया जाता है। इनका कसूर क्या था? बच्चों ने सी.ए.ए. की आलोचना वाला एक नाटक भर किया था।
       क्या यह सच नहीं है कि जब भी, बेरोजगार नौजवान सड़कों पर रोजगार के लिए आंदोलन करते हैं तो उन पर लाठियां बरसती हैं? कॉलेजों की भारी फीस बढ़ने के खिलाफ जब छात्र आंदोलन करते हैं तो उन पर रात के अंधेरे में संघी नकाबपोश गुंडे हमले करते हैं? क्या कर्मचारी, क्या मज़दूर, क्या किसान और क्या आम महिलाएं, सभी तो सड़कों पर आंदोलन करते वक़्त कूटे-पीटे और मारे जाते हैं।
         कोई कानून 'जनता' को तबाह-बर्बाद करने वाला है तो जनता क्या करे? क्या चुप बैठी रहे? क्या उस काले कानून का विरोध करना 'गुनाह' है? क्या इससे पहले, जनता ने काले कानूनों का विरोध नहीं किया था? क्या खुद भाजपा व संघ ने कांग्रेस सरकार में कानूनों का विरोध नहीं किया था? कांग्रेस सरकार का विरोध नहीं किया था? जो तब सही था, वह आज कैसे गलत है?
       आज समाज में चौतरफा संकट है। अर्थव्यवस्था गहरे संकट में है। बेरोजगारी की हालत बहुत बुरी है। बेरोजगार नौजवान सड़कों पर हैं। उधर फैक्ट्रियों-कारखानों से लाखों मज़दूरों से नौकरी छिन चुकी है। नई नौकरियों का अकाल पड़ा हुआ है। दुकानदारों से पूछिये तो पता लगेगा कि बिक्री बहुत कम हो गई है।
         6 साल पहले के दिन याद कीजिये! भाजपा और मोदी का क्या वायदा था? कहां तो 'अच्छे दिन आने वाले' थे, '15 लाख सबके खाते में' आने वाले थे, '2 करोड़ रोज़गार' हर साल मिलने वाले थे, 'महिलाओं पर अत्याचार' खत्म हो जाना था, मगर हुआ क्या? 1 लाख से ज्यादा सरकारी शिक्षक योगी राज में नौकरी से हटा दिए गए, इन्हें शिक्षा मित्र बना दिया गया। बी.एस.एन.एल के लाखों कर्मचारियों को जबरन रिटायर किया का रहा है। महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा जैसे अपराध और ज्यादा बढ़ ही नहीं गए बल्कि, भाजपा के चिन्मयानन्द, कुलदीप सेंगर, नित्यानंद जैसे अपराधियों को बचाने की हर कोशिश इन्होंने की।
           आज हालात क्या हैं? एक तरफ आम जनता की जीवन भर की जमा पूंजी जो बैंकों में है, उस पर 'बड़े-बड़े पूंजीपति' हाथ साफ कर रहे हैं। सरकार इसे बट्टा खाते में डाल रही है। बैंकों का लगभग 7 लाख करोड़ रुपये का कर्ज जो पूंजीपतियों ने बैंकों से लिया था, वह फंस चुका है। इसके चलते बैंक डूब रहे हैं। यस बैंक का 13 हज़ार करोड़ रुपये तो अनिल अंबानी पर ही फंसा हुआ है, ऐसे ही और भी बड़े खिलाड़ी है।
        संकट इतना गहरा है कि कर्ज, गरीबी व भुखमरी के चलते अब आये दिन आत्महत्या की खबर आने लगी है। आयात-निर्यात, मानव विकास सूचकांक, पूंजी निवेश, खपत हर चीज में लगातार गिरावट है।
 शासक पूंजीपति जानता है कि जब वह आम जनता की खुली लूट-खसोट करेगा, तो आम जनता का आंदोलन सड़कों पर उमड़ना तय है। जनता का संघर्ष शासकों के 'स्वर्ग' को भी खत्म कर सकता है। इस स्थिति में शासक पूंजीपति क्या करे?  ऐसे में वह 'हिन्दू-मुस्लिम' की राजनीति करने वाले को खुलकर आगे न लाते, तो और क्या करते ? पहले ये 'कांग्रेस' के जरिये खेलते थे मगर अब मोदी-शाह, भाजपा व संघ के जरिये यही चीज कर रहे हैं। 'हिंदू फासीवाद' यानी 'हिंन्दू राष्ट्र' शासक पूंजीपति की 'आतंकी तानाशाही' का ही दूसरा नाम है। इस 'हिन्दू फासीवादी' हमले के केंद्र में मुस्लिम है मगर इसके निशाने पर सभी धर्मों की मेहनतकश जनता है यही असल 'शिकार' है।
          यह 'हिन्दू राष्ट्र' एक हद तक कायम हो चुका है। इस 'हिन्दू राष्ट्र' में आम जनता के क्या हाल है? आम महिलाओं की क्या स्थिति हैं? आम दलितों, आम मुस्लिमों, मजदूरों, आम किसानों आदिवासियों, कर्मचारियों, बेरोजगारों व दुकानदारों की क्या स्थिति हैं? सभी की हालत और ज्यादा खराब हुई है। सभी इसमें हैरान हैं, परेशान हैं।
       अब यही चीज सी.ए.ए., एन.आर.सी. तथा एन.पी.आर. के जरिये होनी है। सी.ए.ए अपने मनपसंद मुल्कों से, मनपसंद धर्म के लोगो को ही नागरिकता देने की बात करता है। यह धार्मिक आधार पर बना हुआ है। यह आम मेहनतकश जनता को 'बांटता' है, 'लड़ाता' है और उनकी 'एकता' को खत्म कर देता है शासकों की लूट-बर्बरता को आगे बढ़ाता है। जबकि एन.पी.आर के जरिये ही एन.आर.सी. भी होनी है इसमें आम  नागरिक को 'संदेह' के आधार पर 'संदिग्थ नागरिक' बना देने का प्रावधान है तथा फिर उससे 'नागरिकता' का सबूत मांगने का कानूनी प्रावधान है। देर-सबेर आम नागरिक की व्यक्तिगत जानकारी जुटाकर एक ओर निगरानी का जाल बुना जाएगा तो दूसरी ओर उसे 'संदिग्ध नागरिक' बना देने की ओर बढ़ा जाएगा। यहां से फिर नागरिकता साबित न होने पर वह 'घुसपैठिया' या 'शरणार्थी' हो जाएगा।
       इसके विरोध में केवल मुस्लिम समुदाय के लोग ही नहीं बल्कि हिन्दू, सिक्ख, ईसाई सभी धर्म के मेहनतकश व जनपक्षधर लोग भी अलग-अलग जगहों पर सड़कों पर हैं। सरकार और उसका मीडिया इसे जानबूझकर मुस्लिमों का आंदोलन कहकर प्रचारित कर रहा है ताकि फासीवादी तानाशाही को आसानी से थोपा जा सके। यह संघर्ष असम, मेघालय, पंजाब दिल्ली से लेकर देश के अधिकांश राज्यों में है।
      यही नहीं, इस आंदोलन को कुचलने के लिए 'दंगे' तक करवा दिए गए। आंदोलनकारियों के पोस्टर 'अपराधियों' की तरह होर्डिंग पर लगवा दिए गए। कुलमिलाकर 70-80 लोग इस दौरान मारे गए हैं सैकड़ों घायल हुए है, हज़ारों पर मुकदमे दर्ज हुए हैं। दिल्ली में प्रायोजित दंगों के चलते भी आम जनता ने भयावह पीड़ा व विस्थापन झेला है। मगर जो दंगे के प्रायोजक है उन पर कोर्ट के आदेश के बावजूद 'मुकदमे' दर्ज नहीं होते बल्कि 'सुरक्षा' दी जाती है।   
      कोई ऐसे दौर को 'अंधेरा दौर' न कहे तो क्या कहे? इसे भयावह 'अघोषित आपात काल' न कहे तो क्या कहे? जहां 'नंगे राजा' को 'नंगा कहना' ही जुर्म हो।
     आइये, इस अंधेरे दौर में अंधेरों के ही गीत गाएं। अंधेरो के गीत गाते हुए ही मुक्ति के रास्ते की ओर बढ़ें। भविष्य जनता का है। भविष्य रोशनी का है। बहते पानी की धारा को थामकर, जो सोचते हैं कि वह हमेशा के लिए पानी के बहाव को थाम लेंगे, वे विज्ञान और समाज विकास के नियम के खिलाफ खड़े हैं। याद रखना होगा! जबरन रोक दिए गए इस पानी का बहाव, वक्त गुजरते ही फासीवादी शासकों समेत इनके जुल्म-सितम, शोषण-उत्पीड़न को भी सैलाब की तरह बहा ले जाएगा। आम जनता के संघर्ष 'पानी के बहाव' की ही तरह हैं।
       आज के ये घोर जनविरोधी फासीवादी शासक जनता पर हर तरीके से हमलावर हैं। हमें याद रखना होगा, यह आम जनता ही थी जिसने भारी कुर्बानियां देकर देश आजाद कराया था, जिसने अपने खून-पसीने से देश को सींचा है, देश का निर्माण किया हैं; यह आम जनता ही है जिसने हर अधिकार, हर चीज को संघर्षो से हासिल किया है। अब एक बार फिर आम जनता ही इतिहास का निर्माण करेगी। यह भगत सिंह के विचारों के दम पर संभव है।
         शहीद भगत सिंह के विचार व उनका कुर्बानी भरा जज्बा हमें इस शोषण-उत्पीड़न से मुक्ति की राह दिखाता हैं। 'समाजवादी भारत' ही जनता को पूंजी की फासीवादी गुलामी और जकड़न से मुक्ति दिला सकता है। 'समाजवादी भारत' ही भगत सिंह का मकसद था, सपना था।

Friday, 6 March 2020

"घुसपैठिया" व "शरणार्थी" बनाये जाने की साजिश

   "घुसपैठिया" व "शरणार्थी" बनाये जाने की साजिश

     जब से मोदी सरकार ने नागरिकता कानून में संशोधन किया तथा एन आर सी व एन पी आर की ओर कदम बढ़ाए तब से देश भर में इसके खिलाफ संघर्ष हो रहे हैं। इन संघर्षों को खत्म करने के लिए भाजपा सरकार ने हर तरह के घृणित काम किये हैं। दिल्ली की मौजूदा हालत मोदी सरकार की घृणित साजिश का ही नतीजा है।  जहां 45 से ज्यादा हिन्दू-मुस्लिम मार दिए गए हैं, कई घायल हैं।  जबकि इससे पहले सीएए, एनआरसी व एनपीआर विरोधी संघर्ष में असम व फिर यू पी में 25-30 लोग मारे गए हैं। सैकड़ों लोग घायल हुए हैं, हज़ारों लोगों पर संगीन मुकदमे दर्ज कर दिए हैं, हज़ारों लोग गिरफ्तार किए गये हैं।
      क्या सरकार द्वारा बनाये गए किसी कानून का विरोध करना 'देश का विरोध' करना होता है? जैसा कि मोदी सरकार व भाजपा के नेता कह व कर रहे हैं। क्या इन 70 सालों में इससे पहले सरकार के विरोध में सड़कों पर प्रदर्शन नहीं हुए थे ? हुए थे। क्या खुद भाजपा, मोदी-शाह ने कांग्रेस सरकार के खिलाफ प्रदर्शन नहीं किये थे? किये थे। क्या भाजपा, मोदी-शाह के कांग्रेस सरकार के खिलाफ किये गए प्रदर्शन से 'देश का विरोध' होता था? नहीं होता था। तब फिर आज मोदी सरकार के बनाये गए कानून का विरोध करना 'देश का विरोध' करना कैसे हो गया? क्या 'भाजपा, मोदी-शाह व संघ' ही 'देश' हैं?
        कोई कह सकता है कि नागरिकता संशोधन कानून से क्या दिक्कत है? यह तो नागरिकता देने का कानून है दरअसल यही सरकार व उसके मंत्री भी कह रहे हैं। बात यह है कि इसमें आधा सच है आधा झूठ। हकीकत यह है कि यह कानून अपनी 'मनमर्जी के धर्म' के कथित "अवैध प्रवासियों" को नागरिकता के लिए चुनता है, 'मनमर्जी के देश' चुनता है, तीन देशों के छः धर्म के "अवैध प्रवासियों" को नागरिकता के लिए चुनता है। अन्य धर्म के लोगों व अन्य देशों को छोड़ देता है यानी यहां नागरिकता नहीं देता है।  यह कानून कहता है कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान व बांग्लादेश से वे हिंदू, सिख , जैन, पारसी, इसाई व बौद्ध धर्म के लोग (अवैध प्रवासी) जो 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आ चुके हैं उन्हें भारत में नागरिकता दी जाएगी।
       कोई भी देख सकता है कि यह कानून कथित 'अवैध प्रवासियों' को धार्मिक आधार पर नागरिकता देने का प्रावधान करता है। यह देश के पूंजीवादी संविधान की धर्मनिरपेक्षता पर हमला है। यह 'बांटो, ध्यान भटकाओ और राज करो' की नीति के सिवाय और कुछ भी नहीं है। यह विदेशों में नौकरी कर रहे लाखों भारतीयों के जीवन को भी खतरे में डालता है।
      कोई कह सकता है कि इससे हमें क्या फर्क पड़ता है? इस कानून का, देश के भीतर रह रहे नागरिकों, चाहे वे हिन्दू हों या मुस्लिम, या फिर कोई और, उनसे कोई लेना-देना नहीं है। यही तर्क मोदी सरकार के हैं।
      हकीकत इसके उल्टा है। देश में कथित "घुसपैठिये" या "अवैध प्रवासी" है या नहीं, या हैं तो कितने हैं? इसकी पड़ताल कैसे होती है? दरअसल एन आर सी  के जरिये ही यह काम करने का दावा सरकार करती है। एन आर सी क्या है? यह देश के नागरिकों का रजिस्टर है। देश में एन आर सी 1951 में बनी थी। 1951 की जनगणना के जरिये ही एन आर सी बन गयी। तब संविधान के लागू होने के साथ ही आम तौर पर भारत में रह रहे हर व्यक्ति को नागरिक माना गया था।
        पहला नागरिकता कानून 1955 में बना। इसमें 'अवैध प्रवासियों' को नागरिकता देने का प्रावधान नहीं था। 'अवैध प्रवासी' सरकार के हिसाब से वे 'विदेशी' थे जो भारत में बिना दस्तावेज के या फर्जी दस्तावेज या दस्तावेज (वीजा) की अवधि समाप्त होने के बावजूद रह रहे हों। इन 'अवैध प्रवासियों' को 'विदेशी कानून-1948' तथा 'पासपोर्ट कानून-1920' के हिसाब से चिन्हित कर निर्वासित किये जाने का प्रावधान था।
        पड़ोसी मुल्क के वे लोग जो आपदा, युद्ध, हिंसा या उत्पीड़न के शिकार थे, चाहे वह किसी भी धर्म के हों, भारत में उन्हें शरण दी गई, इन्हें 'शरणार्थी' कहा जाता है। यूगांडा, श्रीलंका, पाकिस्तान, तिब्बत, वर्मा व बांग्लादेश आदि के उत्पीड़ित लोगों को भारत में शरण दी गई। इनमें से कुछ को नागरिकता भी दी गई। मगर इसमें धार्मिक आधार पर भेदभाव नहीं था।
       कोई कह सकता है कि एन पी आर का विरोध क्यों, ये तो 'जनसंख्या रजिस्टर' है ? या यह कि जब 2010 में कांग्रेस ने लागू किया, तब विरोध क्यों नहीं किया, आज भाजपा लागू कर रही हैं तो इसका विरोध क्यों?
       यहां भी कुतर्क कर असल बात पर पर्दा डाला जा रहा है। हकीकत यह है कि 2003 में बाजपेयी की अगुवाई वाली भाजपा सरकार ने भी 'नागरिकता कानून' में संशोधन किया था। इसमें राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर( एनपीआर) का प्रावधान किया। इसमें दर्ज है कि एन पी आर, एन आर सी की दिशा में पहला कदम है। एनपीआर के जरिये लगभग 21  निजी जानकारियां लोगों से पूछी जाएंगी, इस आधार पर एनआर सी तैयार होगी , राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी किया जाएगा तथा किसी भी व्यक्ति द्वारा दी गई जानकारी पर संदेह होने पर उससे नागरिकता के दस्तावेज मांगे जाएंगे।
     साफ है कि एनपीआर ही एनआरसी भी है। एनपीआर के जरिये व्यक्ति को 'संदिग्ध नागरिकता' की श्रेणी में डाला जायेगा। फिर उससे नागरिकता के सबूत मांगे जाएंगे।  मामला फिर 'विदेशी ट्रिब्यूनल' में जायेगा। यहां भी नागरिकता साबित नहीं होने पर व्यक्ति "घुसपैठिया" या "शरणार्थी" कहलायेगा। यदि मुस्लिम है तो "घुसपैठिया",  हिन्दू या अन्य धर्म के हैं तो " शरणार्थी" । इस प्रकार अपने ही देश में करोड़ों लोग 'घुसपैठिया' व 'शरणार्थी' बना दिये जायेंगे। कथित 'घुसपैठिये' डिटेंशन केंद्र (एक प्रकार की जेल) में बंद कर दिए जाएंगे। जबकि कथित "शरणार्थी" इस सरकार के रहमों करम पर होंगे।
       याद रखिये! इस कथित "घुसपैठिया" या "शरणार्थी" की सूची में कोई अम्बानी, अडाणी, टाटा, बिड़ला जैसा पूंजीपति नहीं होगा; मोदी, शाह, भागवत, मनमोहन,अखिलेश, केजरीवाल, सोनिया आदि आदि जैसे लोग नहीं होंगे। ये हुक्मरां हैं, शासक हैं। 
     इस कथित "घुसपैठिया" या "शरणार्थी" की सूची में देश के मजदूर-मेहनतकश इंसान होंगे, इस देश के आम नागरिक होंगे। जो हर धर्म के होंगे, हर जाति के होंगे। तब एक नागरिक के रूप में हासिल अधिकार मसलन संपत्ति अर्जित करने, शिक्षा-स्वास्थ्य-रोज़गार के अधिकार, वोट देने, विरोध प्रदर्शन करने, असहमति जताने जैसे सभी अधिकार छिन जाएंगे।
      आज एनपीआर-एनआरसी व सीएए का विरोध इसलिए है कि असम के दुखदायी, यंत्रणादायी व भयानक डरावने अनुभव सामने हैं। तब ये मामले सामने नहीं थे। असम में 'दस्तावेज' होने के बावजूद लोग मामूली गलतियों से नागरिकता सूची से बाहर हो गए। जबकि गरीब मज़दूरों, अनपढ़ लोगों, महिलाओं के पास दस्तावेज ही नहीं थे। कई लोगों ने नाम, जाति, धर्म बदल लिए थे उनके लिए भी नागरिकता का सबूत जुटाना नामुमकिन था। कइयों के पास दस्तावेज जुटाने के लिए पैसे ही नहीं थे। अन्तत: 19 लाख लोग नागरिकता सूची से बाहर हो गए। कई लोगों की सदमे में मौत हो गई जबकि 29 लोग (हिन्दू-मुस्लिम) डिटेंशन केंद्र में मर चुके हैं।
     नागरिकता का मापदंड क्या होगा? आधार, पेन कार्ड, वोटर कार्ड, पासपोर्ट, राशनकार्ड से क्या नागरिकता साबित होती हैं? नहीं। अभी भी यह अस्पष्ट है। असम में एक व्यक्ति द्वारा 16 दस्तावेज नागरिकता साबित करने हेतु जमा किये गए जिसमें 1966 के भी दस्तावेज थे मगर 'विदेशी ट्रिब्यूनल' व असम हाईकोर्ट ने इनको मानने से इंकार कर दिया। सरकार ने इस विषय पर जानबूझकर चुप्पी साधी हुई है।
       एन पी आर का जनगणना से कोई लेना-देना नहीं है। जनगणना 'जनगणना कानून-1948' के तहत हर 10 साल में होती है इसमें आर्थिक-सामाजिक स्थिति से संबंधित सवाल पूछे जाते हैं।
      ऐसे वक्त में जब जनता को भारी राहत की जरूरत थी। बढ़ती महंगाई, लाखों मज़दूरों की छंटनी, कर्मचारियों पर छंटनी की लटकती तलवार, भारी बेरोजगारी, छोटे कारोबारियों-दुकानदारों की खस्ता हालत, महिलाओं के खिलाफ बढ़ती यौन हिंसा! इन सबसे जनता त्रस्त थी। छात्र, किसान,कर्मचारी, मज़दूर, महिलाएं-आदिवासी सभी संघर्ष के मैदान में थे। सब राहत चाह रहे थे। तब यह कानून लाया गया। एनपीआर व एनआरसी के विरोध के बावजूद सरकार पीछे हटने को तैयार नहीं है।
      तब फिर सवाल है कि मोदी सरकार इस "काले कानून व प्रावधान" यानी 'सीएए एनपीआर एनआरसी" को लागू कराने को दृढ़ क्यों है? दरअसल आज बड़ी-बड़ी पूंजी के मालिक जनता पर अपनी मनमर्जी थोप देना चाहते हैं। अपने मुनाफे को किसी भी कीमत बढ़ाते जाना चाहते हैं। इसलिये जनता को पूरी तरह निचोड़ देने को ये बेचैन हैं। मगर ये डरते हैं। जानते हैं कि यह भयानक लूट-खसोट जनता के गुस्से को देशव्यापी संघर्षों में बदल सकता है।  इसलिए एक वक्त बाद इन्होंने कांग्रेस को पीछे कर दिया। मोदी-शाह व भाजपा संघ को आगे कर दिया। अपनी मीडिया व पैसे के चमत्कार से इन्हें सत्ता तक पहुंचा दिया। अब इनकी तैयारी खुल कर खेलने की है। यहां यही "देश" हैं यही "राष्ट्र" है 'राष्ट्रवाद',  'देशभक्ति' भी इन्हीं से है। मोदी-शाह के हिन्दू फासीवादी एजेन्डा इन्हीं के लिए है। इनके जरिये शासक खौफ व दहशत कायम कर देना चाहते हैं। विरोध को कुचल देना चाहते हैं। आतंकी तानाशाही कायम कर देना चाहते हैं। इसके निशाने पर  मज़दूर मेहनतश जनता है आम नागरिक हैं। इस काले कानून के जरिये यह इसी साजिश को आगे बढ़ा रहे हैं।
      इसीलिए जरूरत है कि  मज़दूर मेहनतकश जनता को 'घुसपैठिया' 'शरणार्थी' बनाये जाने की साजिश का विरोध किया जाय। यही नहीं पूंजी के मालिकों व इनकी सरकार के हर फासीवादी एजेन्डे का पुरजोर विरोध किया जाय।

8 मार्च: अंतराष्ट्रीय महिला दिवस ज़िंदाबाद

       8 मार्च: अंतराष्ट्रीय महिला दिवस ज़िंदाबाद
 आज से लगभग 110 साल पहले, 1910 से 8 मार्च 'कामगार महिलाओं' के लिए बराबरी के अधिकार व संघर्ष का प्रतीक बन गया। 1917 में रूस में समाजवादी क्रांति हुई तो महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिला। समाजवादी रूस में महिलाओं को शिक्षा, नौकरी  से लेकर हर जगह बराबरी के अधिकार हासिल हुए।
 
    आज हालात क्या हैं? हमारे समाज में आम महिलाओं की क्या स्थिति है? कामकाजी महिलाओं की क्या स्थिति है? आम महिलाओं के खिलाफ अपराधों की क्या स्थिति है?
    कोई भी आसानी से कह सकता है कि आम महिलाओं की, कामकाजी महिलाओं की स्थिति कुछ मायने में पहले से बेहतर हुई है तो कई मायनों में स्थिति खराब भी हुई है। यह आज पूरी दुनिया के लिए सच है।
      आज के दौर में आम महिलाओं के लिए सबसे बड़ा मुद्दा 'असुरक्षा' का है। रातें तो पहले ही महिलाओं के लिए खतरनाक मानी जाती थी, एक अघोषित 'कर्फ्यू' रात में महिलाओं पर लागू हो जाता था। मगर अब दिन भी खतरनाक हो गए हैं। महिलाएं घर की चारदीवारी के भीतर भी असुरक्षित हैं तथा बाहर भी। बात इतनी ही नहीं है, स्त्री चाहे वह बच्ची हो या 70-80 साल की, कोई भी सुरक्षित नहीं है।
यही नहीं, आज समाज में बढ़ती बेरोजगारी की एक वजह 'कामकाजी महिलाओं' को भी बताया जाता है। जबकि महिलाओं की बराबरी, समानता के अधिकार के लिए बेहद जरूरी है कि महिलाओं की 'सामाजिक उत्पादन' में भागीदारी अवश्य बने यानी वह नौकरी करें या रोज़गार करें आत्मनिर्भर बनें ।
      महिलाओं को दोयम दर्जे का मानने वाली सोच, आज भी बनी हुई है। एक तरफ सदियों पुरानी पुरुषप्रधान सोच कि महिला पैर की जूती है, महिलाएं पुरुषों के लिए हैं आज भी बनी हुई है। तो दूसरी तरफ आज इंटरनेट व फ़िल्म इंडस्ट्री ने महिलाओं को 'खाने-पीने व मौज की वस्तु' यानी 'यौन वस्तु' में बदल दिया है। ये दोनों सोच  मिलकर एक ऐसे 'खतरनाक पुरुष' को तैयार कर रही है जो उन्नाव, कठुवा, हैदराबाद, आगरा व पौड़ी जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं।
      लेकिन यही स्थिति शासक वर्ग की महिलाओं की नहीं है यानी सोनिया गांधी, निर्मला सीतारमण, मेनका गांधी, मायावती, ममता बनर्जी आदि की नहीं है। क्योंकि ये शासक हैं। आम महिलाएं, कामकाजी महिलाएं जो मेहनतकश जनता का हिस्सा हैं उन्हीं की यह स्थिति बनती हैं।
      आज देश में जब से नागरिकता संशोधन कानून आया है तथा देश में हर जगह एन पी आर होनी है तब ऐसे में भी सबसे ज्यादा खतरे की तलवार भी महिलाओं पर ही लटकी हुई है। आम तौर पर अधिकांश महिलाओं के पास ही दस्तावेज नहीं मिलेंगे जिससे साबित होता हो कि वह देश की नागरिक हैं। असम में यही स्थिति बनी थी।
      अभी दिल्ली में 'दंगे' प्रायोजित किये गए। इस प्रायोजित दंगे में सबसे ज्यादा किसे झेलना पड़ा? महिलाओं को ही। महिलाओं के साथ यौन हिंसा की गई। ऐसा हर दंगों में होता है, ऐसा हर संघर्षों में होता है कि निशाने पर महिलाएं ही होती हैं। अलग उत्तराखंड के लिए जब संघर्ष हुआ था तब 'रामपुर तिराह कांड' हुआ था जहां दिल्ली प्रदर्शन के लिए जा रही बसों को रोककर उत्तराखंड की महिलाओं के साथ यू.पी. पुलिस ने जमकर यौन हिंसा की थी, बलात्कार किये थे। सब जानते हैं कि यह सब सरकार के इशारे पर ही होता है। चाहे सरकार किसी की पार्टी हो।
      समाज में होने वाला हर अन्याय, हर उत्पीड़न आम तौर पर महिलाओं की स्थिति को कमजोर करता है उन्हें पीछे धकेलता है। इसी की उल्टी बात भी सच है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाला हर अन्याय, हर हिंसा पूरे समाज को भी पीछे धकेल देती है।
     इसीलिये जरूरी है कि बराबरी, भाईचारे तथा अन्याय-उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष में मेहनतकश महिलाएं व मेहनतकश पुरुष मिलजुलकर, एकजुट होकर संघर्ष करें।
      आज देश में स्थिति बेहद गंभीर है। अर्थव्यवस्था भीषण संकट में है, बेरोजगारी 45 सालों में सबसे ज्यादा है। बैंक डूब रहे हैं इसी के साथ इनमें जनता की मेहनत की कमाई भी डूब रही हैं। कारोबारियों-दूकानदारों की स्थिति बहुत खराब है। लाखों की संख्या में मज़दूरों की नौकरियों से छंटनी हो चुकी है। अन्ततः इस सबका बुरा असर भी आम महिलाओं पर ही पड़ना है। दूसरी ओर इस संकट में भी देश के शीर्ष पूंजीपति अम्बानी,अडाणी, टाटा जैसे लोग मालामाल हो रहे हैं वहीं भाजपा सबसे अमीर पार्टी बन चुकी है।
ये शीर्ष पूंजीपति मोदी-शाह की अगुवाई में हिन्दू फासीवादी राजनीति के जरिये जनता के हर संघर्ष को कुचल रहे है। यही नहीं, इनके राज में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा व बलात्कार करने वाले चिन्मयानन्द, कुलदीप सेंगर, नित्यानंद जैसे लोगों को खुलकर बचाने का काम भी हो रहा है।
      सही मायने में इनका 'हिन्दू राष्ट्र' महिलाओं को गुलामी की स्थिति में धकेलने वाला है। आज यह खतरा काफी बढ़ चुका है इसलिए आज आम  जरूरी है कि एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया जाय। यह भी जरूरी है कि जिस पूंजी ने, पूंजीवाद ने पूरे समाज को अपनी जकड़न में ले लिया है और समाज को अब भाजपा की फासीवादी राजनीति के जरिये बर्बरता की तरफ धकेल दिया है उस पूंजी पर काबू पाने के संघर्ष को तेज़ किया जाय, पूंजीवाद को खत्म कर समाजवादी समाज कायम करने की ओर बढ़ा जया।

Friday, 28 February 2020

नागरिकता(संशोधन) कानून, एन.आर.सी. व एन.पी.आर. पर


   नागरिकता(संशोधन) कानून, एन.आर.सी. व एन.पी.आर. पर
    मोदी सरकार ने नागरिकता कानून में संशोधन कर दिया। अब धर्म के आधार पर नागरिकता पड़ोसी मुल्क के पीड़ित अल्पसंख्यकों को दी जाएगी। यह केवल हिंदू, सिख जैन, पारसी, इसाई व बौद्ध धर्म के लोगों के लिए है।
       साफ है! कानून धर्म के आधार पर नागरिकता देने की बात करता है। यही नहीं ! सरकार के मंत्रियों ने बार-बार कहा कि एन आर सी पूरे देश में होगी। इसलिए संशोधित नागरिकता कानून व एन.आर.सी का चौतरफा विरोध हो रहा है। असम से लेकर दिल्ली व यू पी से लेकर पश्चिम बंगाल तक ।
      विरोध देशव्यापी है। सरकार ने जनसंघर्ष का बर्बर दमन किया। हजारों लोग गिरफ्तार हैं। इन पर संगीन मुकदमे दर्ज हुए हैं। 25-30 लोग मारे गए हैं। संघर्ष व दमनचक्र जारी हैं। जो प्रदर्शनकारी पीड़ित हैं। पुलिस की बर्बर हिंसा व जुल्म के शिकार हुए हैं। अब उन्हीं को बदनाम करने का, अपराधी बताने का अभियान शुरू हो चुका है। सरकार की बर्बर हिंसा, लम्पट तत्वों के हमलों व दमन चक्र पर खामोशी है। इसे जायज बताया जा रहा है। वक़्त बर्बर अंग्रेजी राज की याद दिला रहा है तब देश की आज़ादी के लिए लड़ने वालों को 'आतंकवादी' 'अपराधी' कहा जाता था।
         यह ऐसा वक़्त है जब जनता को भारी राहत की जरूरत थी। बढ़ती महंगाई, लाखों मज़दूरों की छंटनी, कर्मचारियों पर छंटनी की लटकती तलवार, भारी बेरोजगारी, छोटे कारोबारियों-दुकानदारों की खस्ता हालत, महिलाओं के खिलाफ बढ़ती यौन हिंसा! इन सबसे जनता त्रस्त थी। छात्र, किसान,कर्मचारी, मज़दूर, महिलाएं-आदिवासी सभी संघर्ष के मैदान में थे। सब राहत चाह रहे थे। मगर हुआ क्या ? राहत नही मिली। हमें मिला- 'नागरिकता कानून' ! विरोध करने पर बर्बर दमन! खौफ-दहशत कायम करने की भरपूर कोशिश !
    हकीकत यह है कि पड़ोसी मुल्क के अल्पसंख्यक पीड़ितों से इन्हें कोई हमदर्दी नहीं है। यह सिर्फ इनके फासीवादी एजेंडे का दांव है। वरना तो कानून सालों पुराना बना ही था कि पड़ोसी मुल्क में हिंसा, युद्ध से पीड़ित लोग भारत आ सकते हैं। शरण पा सकते हैं। कुछ सालों बाद नागरिक बन सकते हैं। यह धर्म के नाम पर लोगों को बांटता नहीं था।
         इन्हें बहुत डर लगता है! ये घबराते हैं!  यह कहने में कि जो हिन्दू हैं वे सबसे पहले इंसान है । वे मज़दूर हैं छात्र हैं कर्मचारी हैं मेहनतकश हैं। जो मुस्लिम है वे भी इंसान हैं वे भी मज़दूर हैं मेहनतकश हैं। ये जो मज़दूर मेहनतकश इंसान हैं। ये करोड़ों करोड़ हैं। ये करोड़ों करोड़ मज़दूर मेहनतकश एक हो गए तो फिर शासक कहां होंगे ? इनका खुद क्या होगा ? ये लोग यह जानते हैं समझते हैं।  इसीलिए ये तीन तलाक़, कश्मीर, राम मंदिर और फिर नागरिकता कानून लाते हैं।
    मोदी सरकार का यह कानून हिटलर की याद दिलाता है। हिटलर ने भी यहूदी विरोधी न्यूनबर्ग कानून बनाया था। फिर वहां जो कुछ भी हुआ। वह इतिहास में दर्ज है। इनका चाल चलन भी ऐसा ही है। पहले दूसरे धर्म के लोगों के खिलाफ सालों साल नफरत फैलाओ, अपने धर्म के लोगों को अपनी हिंसक भीड़ में बदल दो, इतिहास से छेड़छाड़ करो, उन्माद फैलाओ, इन्हें निशाना बनाओ, हमले करो फिर आतंकी तानाशाही कायम कर दो। आज यही देश में हो रहा है।
       यह अजीब है ! कि जिन्हें अपने देश की गरीब मेहनतकश जनता की कोई परवाह नहीं है। जो कर्मचारियों, छात्रों, किसानों, महिलाओं व मज़दूरों के आंदोलन का बर्बर दमन करते रहें हो। जिसमें अधिकांश हिंदू ही हैं। वे ही लोग पड़ोसी मुल्कों के पीड़ित हिन्दूओं से हमदर्दी जता रहे हैं !   
           एक तरफ देश में गहराता आर्थिक संकट है। मज़दूर मेहनतकशों की तबाही बर्बादी है। इसके खिलाफ उमड़ते आंदोलन हैं। दूसरी तरफ है इनका घृणित व घोर दमन ! जनता के जीवन की तबाही बर्बादी की कीमत पर अम्बानी-अदाणी जैसे कॉरपोरेट घरानों का लगातार बढ़ता मुनाफा। इस 'हमदर्दी' की मूल वजह यहीं हैं। इनकी 'चिंता' का असल रहस्य यहीं छुपा है। इन्हें सरेआम झूठ बोलने से भी गुरेज नहीं है।
        देश के मुखिया ने सरेआम तथ्यों से इंकार कर दिया। कहा कि एन.आर.सी की कोई चर्चा ही नहीं हुई। कि देश में कोई डिटेन्सन सेंटर (एक प्रकार की जेल) नहीं हैं। हकीकत क्या है ?  सरकार के मंत्री कई बार कह चुके हैं कि पहले नागरिकता कानून आएगा। फिर एन आर सी लागू होकर रहेगी। कि असम में 6 डिटेंसन सेंटर हैँ जहां हज़ार से ज्यादा लोग हैं जो खुद की नागरिकता साबित नही कर पाए।
       यह बात सही है कि अभी एन.आर.सी. केवल असम में हुआ है। देश में लागू नहीं हुआ है। मगर देर सबेर इसे लागू करने का इनका इरादा है। उमड़ते जनसंघर्षों से अभी इन्होंने कदम पीछे खींच लिए हैं। मगर अब इन्होंने एन.पी.आर. शुरू कर दिया है यह एन.आर.सी की ही दिशा में अगला कदम है।
     एन पी आर के जरिये व्यक्तिगत जानकारी घर-घर जाकर मांगी जाएगी। इन जानकारी पर संदेह जताकर आम नागरिक को पहले 'संदिग्थ नागरिक' की श्रेणी में डाल दिया जाएगा। फिर 'संदिग्थ' की श्रेणी में डाले गये व्यक्ति से नागरिकता के सबूत मांगे जाएंगे। मामला विदेशी ट्रिब्यूनल में जायेगा। नागरिकता के सबूत जुटाना बहुत मुश्किल हो जाएगा। अभी नागरिकता के मापदंड क्या होंगे? यह भी अस्पष्ट है। असम के कई मामले इस बात के गवाह हैं। यहां जो नागरिकता साबित नहीं कर पाएंगे वे अपने ही देश घुसपैठिया या शरणार्थी हो जाएंगे।
       असम में क्या हुआ था ? 6 साल में एन.आर. सी पूरी हुई। 19 लाख लोग अपने ही देश में घुसपैठिये हो गए, शरणार्थी बना दिये गये। इन 19 लाख में अधिकांश 'हिन्दू बंगाली' हैं। ऐसे में पश्चिम बंगाल के चुनाव भी एक वजह है कि तुरंत यह धर्म के नाम पर नागरिकता कानून लाया गया। ताकि चुनाव जीता जा सके। यदि यह देश भर में लागू होता है तो करोड़ो लोग नागरिकता से बाहर हो जाएंगे। क्योंकि आधार, वोटर कार्ड नागरिकता होने का सबूत नहीं है। सरकार कहती है कि ये तो कथित घुसपैठियों ने भी बनवा लिए हैं। 2-3 पीढी पुराने दस्तावेज खंगालने होंगे। तब तय मानिये ! करोड़ों लोग हिन्दू-मुस्लिम या अन्य खुद को नागरिक साबित नहीं कर पाएंगे। यह सब मज़दूर मेहनतकश जनता ही होगी। इस तरह अपने ही देश में लोग घुसपैठिये हो जायेंगे, शरणार्थी बना दिये जायेंगे। आज के शासकों की यही मंशा हैं यही इनका इरादा है।
          जिस जनता ने देश का निर्माण किया है। अपने खून पसीने से इसे सींचा है। आज़ादी के संघर्षों में अकूत कुर्बानियां दी हैं। संविधान में नागरिक होने के अधिकार को खून बहाकर हासिल किया है। उसी जनता पर 'घुसपैठिया' होने का संदेह किया जाता है। उसे बिना कहे 'अपराधी' मान लिया जाता है। फिर उनसे नागरिकता का 'सबूत' मांगा जाता है।
         दूसरी ओर पूंजी के मालिकों के लिए लाल कालीन बिछाई जाती हैं। पूंजी व पूंजी के मालिकों को देश के कोने-कोने में घुसपैठ करने की आज़ादी होती है। लूट खसोट मचाकर भाग जाने की खुली छूट होती है। कौन है जो अब भी भोपाल गैस कांड (1984) को नहीं जानता ! कि जब हज़ारों लोगों के हत्यारे अमेरिकी पूंजीपति एंडरसन को हमारे शासकों ने बाहर भगाने में पूरी मदद की थी।
       यदि देश में 'घुसपैठिये' हैं तो यह किसका दोष है? क्या जनता का ! क्या इसके लिए रोज़ी-रोटी-महंगाई-बीमारी से त्रस्त जनता को हैरान परेशान किया जायेगा ?  इस सबके लिए देश के शासक जिम्मेदार हैं। इनका शासन प्रशासन जिम्मेदार है।       
       आखिर ऐसा क्यों है ? कि रोज़ी- रोटी की तलाश में देश के एक कोने से दूसरे कोने जाने वाले मज़दूर मेहनतकशों को 'दुश्मन' बताया जाता है। 'घुसपैठिया' 'दीमक' कहा जाता है।  जरा याद कीजिये! भारत के लाखों मज़दूर मेहनकश दुबई, कुवैत से लेकर अमेरिका जैसे देशों में हैं ! क्या ये 'घुसपैठिये' हैं ? क्या ये 'दीमक' हैं ? नहीं ! इन्हें 'दीमक' 'घुसपैठिया' वही कह सकते हैं जिनकी आत्मा पूंजी की एजेंट हैं। जो बड़ी-बड़ी पूंजी के मालिकों के चरणों में लोट-पोट हैं। जिनकी ज़िंदगी लूट, शोषण, अन्याय पर ही टिकी है और इसे किसी भी कीमत पर बरकरार रखना चाहते हैं।
      आज बड़ी-बड़ी पूंजी के मालिक जनता पर अपनी मनमर्जी थोप देना चाहते हैं। अपने मुनाफे को किसी भी कीमत बढ़ाते जाना चाहते हैं। इसलिये जनता को पूरी तरह निचोड़ देने को ये बेचैन हैं। मगर ये डरते हैं। जानते हैं कि यह भयानक लूट-खसोट जनता के गुस्से को देशव्यापी संघर्षों में बदल सकता है।  इसलिए एक वक्त बाद इन्होंने कांग्रेस को पीछे कर दिया। मोदी-शाह व भाजपा संघ को आगे कर दिया। अपनी मीडिया व पैसे के चमत्कार से इन्हें सत्ता तक पहुंचा दिया। अब इनकी तैयारी खुल कर खेलने की है। यहां यही "देश" हैं यही "राष्ट्र" है 'राष्ट्रवाद',  'देशभक्ति' भी इन्हीं से है। मोदी-शाह के हिन्दू फासीवादी एजेन्डा इन्हीं के लिए है। इनके जरिये शासक खौफ व दहशत कायम कर देना चाहते हैं। विरोध को कुचल देना चाहते हैं। आतंकी तानाशाही कायम कर देना चाहते हैं। इसके निशाने पर पूरी मज़दूर मेहनतश जनता है।
जहां तक अन्य पूंजीपरस्त पार्टियों का सवाल है। कांग्रेस, सपा, बसपा ,आप जैसी पार्टियां भी भ्रष्ट हैं। जनविरोधी हैं। ये हमारी मददगार नहीं हो सकती। इनका विरोध प्रदर्शन अपना वोट बचाने के लिए है। वैसे भी कांग्रेस व भाजपा दोनों बड़े पूंजीवादी घरानों की हैं। 
      जरूरत है कि  मज़दूर मेहनतकश जनता को 'घुसपैठिया' 'शरणार्थी' बनाये जाने की साजिश का विरोध किया जाय। यही नहीं पूंजी के मालिकों व इनकी सरकार के हर फासीवादी एजेन्डे का पुरजोर विरोध किया जाय।

अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम

  अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम        अंततः अमेरिकी साम्राज्यवादियों को फिलहाल पीछे हटना ...