Saturday, 30 May 2020

दिल्ली हिंसा के नाम पर गिरफ्तार किये गए सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों को रिहा करो !
      
   
      मोदी सरकार बिल्कुल षड्यंत्रकारी तरीके अपने विरोधियों को निशाने पर ले रही है। दो साल पहले भीमा कोरेगांव की तर्ज़ पर ही सीएए, एनआरसी व एनपीआर विरोधी आंदोलनकारियों को गिरफ्तार किया जा रहा है।
       ऐसे वक़्त में जब एक तरफ कोरोना महामारी के खिलाफ 'जंग' का एलान किया गया है समस्त "देशवासियों" को एकजुट होकर इस 'जंग' में साथ होने का "आह्वान" किया गया तब "लॉकडाउन" की आड़ में मोदी सरकार सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों से निपट रही है।
        ऐसा लगने लगा है कि मोदी सरकार की 'जंग' कोरोना महामारी से नहीं बल्कि अपने विरोधियों को फंसाने व गिरफ्तार करके जेल में डालने की है। इस तरह जेल में डालकर पूरे समाज में दहशत व खौफ पैदा कर देना चाहती है ताकि कोई भी अधिकारों की बात ना करे, अन्याय व जुल्म के खिलाफ खड़ा न हो।
      मोदी सरकार ने दूसरे कार्यकाल में हिन्दू फासीवादी एजेंडों को खुलकर आगे बढ़ाया। अन्धराष्ट्रवादी, साम्प्रदायिक मुद्दों के जरिये मोदी सरकार ने गहन होते आर्थिक संकट से ध्यान हटाया तथा राजनीतिक ध्रुवीकरण को चरम की ओर ले बढ़े। कश्मीर मुद्दा, राम मंदिर, नागरिकता संशोधन कानून इसी की कड़ी हैं। एक-एक कार ये एजेंडे फैंके गए क्रमशः।
       नागरिकता संशोधन कानून, एन आर सी तथा एन पी आर ऐसा फासीवादी एजेंडा था और है जो देश के करोड़ों मजदूर मेहनतकशों को गैरनागरिक होने की श्रेणी में डाल देता, इन्हें अपने ही देश में घुसपैठिया या शरणार्थी बना देता। विशेष तौर पर यह मुस्लिमों के खिलाफ लक्षित था।
इसके खिलाफ प्रतिरोध तो होना ही था। देश भर में इसके खिलाफ आवाज उठी। हिंदू फासीवाद के खिलाफ इतना सशक्त प्रतिरोध पहली बार हुआ था। इस आंदोलन ने फासीवादी ताकतों को अपने कदम पीछे खींचने पर मजबूर कर दिया।
        सीएए, एनआरसी व एनपीआर के खिलाफ दिल्ली केंद्र बन गया था। शहीन बाग एक मॉडल बन चुका था। यहीं नहीं दिल्ली में कई जगह ऐसे ही शहीन बाग बन चुके थे। यहीं से फिर मोदी-शाह की सरकार ने साजिश रची। दिल्ली के दंगों का आयोजन किया गया। जिसमें कपिल शर्मा व अनुराग ठाकुर जैसे कुछ अन्य पर्दे के सामने थे जबकि पर्दे के पीछे पूरा संघी फासीवादी गिरोह। अन्ततः दिल्ली के प्रायोजित नरसंहार के आयोजकों ने 'दिल्ली हिंसा' के नाम पर उन्हीं को दंगे  के लिए आरोपी बनाना शुरू कर दिया जो दंगों के शिकार थे, जो सीएए  विरोधी प्रदर्शनों में शामिल थे या उसे लीड कर रहे थे। जे एन यू, जामिया , दिल्ली विश्वविद्यालय व अन्य कॉलेज के छात्रों की गिरफ्तारी की जा रही है। अभी तक 1300 लोगों की गिरफ्तारी की गई है। संगीन मुकदमे लगाए जा रहे हैं। यू ए पी ए, राजद्रोह या फिर कुछ और।
       27 वर्षीय सफूरा जगरर जो कि जामिया की शोध   विद्यार्थी हैं और गर्भवती है उन्हें यू ए पी ए यानी कथित आतंकवाद विरोधी कानून के तहत तिहाड़ जेल में ठूंस दिया गया। इसी प्रकार और भी हैं। कश्मीर से भी महिला पत्रकार समेत कुछ अन्य पर आतंकवाद विरोधी कानून के तहत मुकदमा ठोक दिया गया। दिल्ली में जामिया, जे एन यू व दिल्ली विश्वविद्यालय के उन छात्रों को निशाना बनाया जा रहा है जो सीएए विरोधी प्रदर्शन में शामिल थे। मीरान हैदर, उमर खालिद आदि ऐसे ही कई नाम हैं।  अधिकांश मुस्लिमों को निशाने पर लिया जा रहा है।
      अभी कुछ दिनों पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज की छात्रा नताशा व देवांगना को भी दिल्ली हिंसा के नाम पर गिरफ्तार के लिया गया। बाद में जैसे ही इन्हें कोर्ट से जमानत मिली तत्काल ही दूसरे मुकदमे में पुलिस ने इन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया। नताशा पर अब यू ए पी ए का मुकदमा दर्ज कर देनी की बात सामने आ रही है।
      निश्चित तौर पर ऐसे वक्त में जब एक तरफ कोरोना से जंग के नाम पर लॉकडाउन किया गया हो, देश के नागरिकों से एकजुट होकर इससे लड़ने की अपील की गई हो, सोशल डिस्टेंसिग की बात की जा रही है तब ऐसे वक्त में मोदी सरकार का यह कृत्य घृणित, षड्यंत्रकारी व प्रतिशोधात्मक है यह घोर निंदनीय है। इन सभी को अविलंब रिहा किया जाय।   

Saturday, 23 May 2020

लॉकडाउन की आड़ में घोर निरंकुशता

लॉकडाउन की आड़ में घोर निरंकुशता

        लॉकडाउन की घोषणा के बाद ऐसा लगा जैसा मोदी सरकार को अपनी मन की मुराद मिल गयी हो। एक-एक करके सीएए एनपीआर विरोधी प्रदर्शन में शामिल लोगों को मोदी सरकार निशाने पर लेने लगी। विशेषकर यह खेल दिल्ली में सीधे सीधे गृह मंत्रालय के अधीन पुलिस के माध्यम से किया गया।
        दिल्ली में जिस दंगे के जरिये सीएए विरोधी प्रदर्शन को खत्म कर देने की साजिश रची गई थी, अब उसी की साजिश रचने का आरोप सीएए प्रदर्शनकारियों पर लगाये गए। कुछ लोगों पर गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम यानी यूएपीए के तहत मुकदमा दर्ज कर दिया गया। यह इत्तेफाक नहीं कि इसमें सभी मुस्लिम हैं। अधिकांश नौजवान है। कॉलेज में पढ़ने वाले हैं।
       इन्हीं में एक है सफूरा जगर, जिनकी उम्र है 27 साल। वह अभी गर्भवती है इसके बाबजूद उन्हें तिहाड़ जेल में डाल दिया गया। इसके अलावा और भी है जिन्हें यूएपीए के तहत गिरफ्तार कर लिया गया।
     सफूरा के खिलाफ हिन्दू फासीवादी तथा लम्पट मीडिया चरित्र हनन से लेकर भयानक दुष्प्रचार में लगा हुआ है।
      इसके अलावा आपदा प्रबंधन एक्ट तथा महामारी रोग अधिनियम के तहत लोगों के, जनपक्षधर लोगों के तथा पत्रकारों की आवाज को भी खामोश किया जा रहा है। उन पर राजद्रोह से लेकर संगीन मुकदमे दर्ज किए गए हैं। आम लोगो के दुख तकलीफों का पता पूरे समाज को पता लगे, सरकार का घोर जनविरोधी रुख तथा संवेदनहीनता समाज को पता लगे, यह सरकार नहीं चाहती।
     यहीं से फिर वह जो कोई भी सरकार को बेनकाब कर रहा है उसकी आवाज को बंद कर दिया जा रहा है। द वायर के संपादक, ठेका मजदूर कल्याण एसोसिएशन के अध्यक्ष, पछास के एक कार्यकर्त्ता तथा कई पत्रकार इसी दमन के शिकार हुए। बाकि आम अवाम तो लॉकडाउन के उल्लंघन में पिट रहीं है अपमानित हो रही है तथा मुकदमे झेल रही है।
   साफ तौर पर यह स्थिति दिखाती है कि मोदी सरकार व इनकी राज्य सरकारें लॉकडाउन का इस्तेमाल अपने विरोधियों से निपटने तथा निरंकुशता की ओर बढ़ने के रूप में कर रही है।
   


Sunday, 17 May 2020

कोरोना महामारी के दौर में काम के घंटो को 8 से 12 घंटे करने की ओर बढ़ते शासक

कोरोना महामारी के दौर में काम के घंटो को 8 से 12 घंटे करने की ओर बढ़ते शासक


        कोरोना महामारी के दौर ने मजदूर मेहनतकशों के सामने शासकों को नंगा कर दिया है।  लाखों की तादाद में प्रवासी मजदूर सड़कों पर है। वे भूखे प्यासे रोटी और सुरक्षा तथा अपनों की तलाश में अपने गांव की ओर पैदल जा रहे हैं। इसमें महिलाएं हैं, बच्चे हैं, पुरुष हैं तथा साथ में सामान की गठरी है। इन्हें सैकड़ों किमी की यात्रा करनी हैं। बस एक ही मंजिल है किसी भी तरह अपने गांव  पहुंचना है अपने लोगों के बीच पहुंचना है यदि मौत हो भी तो अपने लोगो के बीच। 
       एक तरफ मजदूरों का काफिला है तो दूसरी तरफ मूकदर्शक सरकार है जो इस दौर में भी उन पत्रकारों को जेल में ठूंसने में लगी हुई है जो हकीकत को सामने ला रहे हैं। सरकार को मजदूरों की मौत से , भूखे प्यासे दर दर भटकने से कोई फर्क नही पड़ता है। बस सरकार को बेनकाब होने की, अपनी इमेज की  चिंता है। सरकार को इस बात की चिंता है कि यदि प्रवासी मजदूर अपने घरों को चले गए तो पूंजीपतियों की पूंजी का क्या होगा जो कि उद्योग में लगे हुए है। इसलिए भरपूर कोशिश है कि मजदूरों को किसी भी तरह से अपने घर की ओर पलायन से रोका जाए। मजदूरों को मजबूर होकर सड़कों पर प्रदर्शन करने पड़े। लुधियाना, कठुआ, सूरत, अहमदाबाद समेत कई जगहों पर ऐसे प्रदर्शन हुए। यह हिंसक भी हुआ। संघर्ष अभी भी कहीं के कहीं हो ही रहे हैं।
     इस सबके चलते मोदी सरकार को पीछे हटना पड़ा। ट्रेन 'श्रमिक ट्रेन' के नाम से चलाने पड़े। मगर इसका हश्र वैसा ही होना था जैसा कि मजदूरों गरीब किसानों के संबंध में घोषित होने वाली योजनाओं का होता है। तमाम जटिलताएं पैदा की गई। यह कागजी कार्यवाही के नाम और हुआ। यात्रा का किराया भी भूखे प्यासेमजदूरों से ही वसूला गया।  बहुत कम ट्रेन चलाकर ही दावा किया गया कि लाखों मजदूर को उनके इलाके में पहुंचाया गया।। हकीकत क्या है ? 
       मजदूर आज भी सड़कों पर है। कई मजदूर भूखे प्यासे होने के चलते, सैकड़ों किमी की जानलेवा यात्रा के चलते या फिर बसों, ट्रक, ट्रेन के नीचे आकर जान गंवा चुके हैं। 
       लेकिन सरकार यहीं नहीं रुकी। हिन्दू फासीवादी सरकार ने कोरोना संकट की आड़ में बेशर्मी से मजदूरों और हमला बोल दिया। गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि कई राज्यों में बचे खुचे श्रम कानूनों पर भी जोरदार हमला बोल दिया गया। उत्तर प्रदेश सरकार ने श्रम कानूनों को 3 साल के लिए स्थगित करने का फैसला लिया। ऐतिहासिक तौर पर मजदूर वर्ग ने 8 घंटे काम के नारे को धरातल पर उतारने को जो कुर्बानियां दी थी , उस पर हमला बोला गया। लेकिन इतिहास, समाज व वक़्त कभी ठहरता नहीं है। मजदूर वर्ग व बाकी मेहनतकश जनता के संघर्ष फिर से सैलाब की तरह उमड़ेंगे।
    

      
     

















           
      
       
     
     

    
     






Thursday, 14 May 2020

कोरोना संक्रमण, फासीवादी शासक और आम अवाम

                     कोरोना संक्रमण,  फासीवादी शासक और आम अवाम

         दुनिया भर में कोरोना संक्रमण के तेज़ प्रसार ने शासकों को मजदूर मेहनतकश जनता के सामने बेनकाब किया है। अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान से लेकर भारत तक। अमेरिकी साम्राज्यवादी शासकों की स्थिति सांप-छछुंदर सी हो गई है। बड़बोला व लम्पट ट्रम्प बदहवासी में बके जा रहा है। हालत ये है कि आज अमेरिका कोरोना संक्रमितों की संख्या व इससे होने वाली मौतों की संख्या के मामले में शीर्ष पर है। कभी विश्व स्वास्थ्य संगठन के फंड को रोकना कभी चीन को इसके लिए जिम्मेदार ठहराना तो कभी कुछ बोलना ट्रम्प की बदहवासी को दिखाता है। एक तरफ उद्योग में काम करने वाले मज़दूर संक्रमण के खतरे के चलते हड़ताल की ओर बढ़ रहे हैं उद्योग काम को निरंतर किये जाने का दबाव बना रहा है। दूसरी तरफ स्वास्थ्यकर्मी भी निजी सुरक्षा उपकरणों तथा अन्य वजहों से हड़ताल पर जाने को विवश हैं। इसके अलावा भी बेरोजगार होते लोग, भुखमरी के शिकार होते लोग भी आक्रोशित हैं।
     ऐसा नहीं कि यह स्थिति केवल एक मुल्क की ही हो, यह अधिकांश जगह, अधिकांश देशों में किंतु-परंतु के साथ बनी हुई हैं। कुछ जगह तो अवाम लॉकडाउन के खिलाफ सड़कों पर भी उमड़ चुकी है। सड़कों पर उमड़ता यह आक्रोश-प्रदर्शन रोज़ी-रोटी के लिए ही है।
      अब जरा भारत को देखें ! यहां सड़कों पर आधा भारत है। जो गरीब असहाय है। मजदूर, बच्चों व महिलाओं समेत लाखों की तादाद में अपने गांव व घर की ओर लौट रहे हैं। मोदी सरकार ने इन खबरों को शुरुवात में डाइवर्ट करने में सफलता भी हासिल कर ली थी। तब्लीगी जमात को कोरोना प्रसार के लिए जिम्मेदार ठहराने का खेल टीवी चैनलों के माध्यम से रचा गया। मगर यह स्थिति ज्यादा वक्त तक नहीं बनी रह सकती थी। कुछ वक्त बाद फिर से मजदूरों की सड़कों पर अपने घरों की ओर जाने की ख़बर फिर से आम होने लगी। यही नहीं इस बार मज़दूरों का आक्रोश, प्रदर्शन व संघर्ष भी जगह जगह देखने को मिला। मज़दूरों, मजदूर महिलाओं व बच्चों के सैकड़ों किमी चलने की वीडियो भी फेसबुक और व्हाट्सएप पर घूमने लगी।
        विरोध स्वास्थकर्मियों द्वारा भी किया गया। सरकारी क्षेत्र के स्वास्थकर्मी निजी सुरक्षा उपकरणों की मांग को लेकर निरंतर दबाव बना रहे थे। मगर इसे भी सरकार में अनसुना किया। निजी क्षेत्र के कई डाक्टरों ने तो मरीजों को देखना ही बन्द कर दिया, इस डर से की कहीं खुद संक्रमित न हो जाएं।
   
       जबकि दूसरी तरफ मोदी सरकार, इसके स्वास्थ्य मंत्रालय के तमाम दावों के विपरीत कोरोना संक्रमितों की संख्या में बहुत तेज बढ़ोत्तरी होने लगी। पहले 50 प्रतिदिन से संख्या अब 4000 प्रतिदिन से ऊपर तक पहुंच गई है यानी 80 गुणा की वृद्धि हो चुकी है। मौतों का ही आंकड़ा 2 हजार से ऊपर पहुंच चुका है। इस सबके बावजूद अभी भी सरकार 'सामुदायिक संक्रमण' से इंकार करती रही है। 'सामुदायिक संक्रमण' के मापदंड की मनमानी व्याख्या की गई। साफ देखा जा सकता है कि हिन्दू फासीवादी सरकार की सारी योजना व गणना असफल साबित हुई है हालांकि कोई योजना जैसी चीज थी ही नहीं।
वहीं निरंतर व तेज़ रफ़्तार से बढ़ती संख्या के चलते खुद शासक पूंजीपति वर्ग का दूसरा धड़ा भी नाखुश है। अहंकार, तानाशाही व फासीवादी आचरण यहां भी हावी है। कहा जा रहा है कि इस स्थिति के चलते वैज्ञानिकों व प्रशासन में बैठे कई लोगो के बीच भी असन्तोष है, वैज्ञानिकों व महामारी विशेषज्ञों से सलाह मशवरा कतई नहीं होता।
 नरेन्द्र मोदी प्रशासन को सलाह देने के लिए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा एक राष्ट्रीय टास्क फोर्स गठित की गई मगर दूसरी बार लॉकडाउन बढ़ाने के बारे में टास्क फोर्स से परामर्श नहीं किया गया।
     स्थिति बेहद हास्यास्पद, मूर्खतापूर्ण व मनमानी भरी है यहां जरा भी जवाबदेही नहीं है। 24 अप्रैल को प्रेस कोंफ्रेंस केन्द्र सरकार की ओर से की गई। इसमें नीति आयोग के सदस्य द्वारा एक मॉडल प्रस्तुत किया गया और भविष्यवाणी कर दी गई कि 16 मई के बाद देश में कोरोना महामारी खत्म हो जाएगी, कि कोविड-19 के नए मामले आने बंद हो जाएंगे।
      आज स्थिति सबके सामने है। गोमूत्र व गोबर में बीमारियों का इलाज ढूढने वालों का यही हश्र होना था। मगर विडंबना यह है कि इसकी कीमत आम अवाम को ही चुकानी है और वही चुका भी रही है। एक तरफ गरीब, मज़दूर-मेहनतकश लोग हैं जो भूखे-प्यासे यात्रा के दौरान मौत का शिकार हो रहे है। अस्पतालों में भर्ती से इंकार कर देने के चलते सड़कों पर भी गरीब मज़दूर महिलाओं के बच्चे जनने की भी कई खबर आ रही हैं। औरंगाबाद में 16 मजदूरों के ट्रेन से कटने की घटना किसी को भी परेशान, दुखी व उद्वेलित करने वाली थी।
   
       मजदूरों के विरोध प्रदर्शन व अन्य वजहों से मज़दूरों को ट्रेन के जरिये उनके राज्य तक पहुचाने का फैसला केंद्रीय गृह मन्त्रालय द्वारा लिया गया। मगर इसका हश्र "सबका साथ-सबका विकास" की ही तरह होना था। न्यायालय से लेकर कई पूंजीवादी अखबारों व चैनलों की घोर व घृणित मज़दूर विरोधी सोच सामने आ गयी। इनके लिए मज़दूर सिर्फ मशीन के पुर्जे की तरह थे जिनका इंसान के रूप में कोई वज़ूद नहीं। ट्रेनें चली। मज़दूरों के एक हिस्से को ले भी गयी। किराया मज़दूरों से ही वसूला गया। लेकिन मज़दूर के एक छोटे हिस्से को ही उनके गृह राज्य तक पहुंचाया गया है। घोर क्रूरता, असंवेदनशीलता, अपमान व दमन को मजदूर वर्ग ने साफ साफ महसूस किया। सवाल सभी के लिए यहां भी बना कि किराए का पैंसा केंद्र सरकार खर्च क्यों नहीं कर रही है।
      सवाल बनता ही है कि पीएम केयर्स फंड, कर्मचारियों की तनख्वाह से कटौती तथा 1.6 अरब डॉलर विदेश से लेने के बावजूद यह भारी भरकम राशि कहां खर्च हो रही है इसका कोई हिसाब क्यो नहीं?
      आज खुद आम लोग सवाल कर रहे हैं कि जब कोरोना केस की संख्या बहुत कम थी तब अचानक लॉकडाउन कर दिया गया और जब अब संक्रमण रोज़ 4 हजार से ज्यादा बढ़ रहे हैं तब लॉकडाउन को खत्म करने की मनोदशा बनायी जा रही है। इसी ढंग की प्लानिंग की जा रही हैं ऐसा क्यों? अचानक से सीधे शराब की दुकानें खोलने का नतीजा सभी ने देखा।
      एक तरफ तो कई हज़ार लोगों को लॉकडाउन के उल्लंघन में लाठियां खानी पड़ी व मुकदमे झेलने पड़े, दूसरी तरफ शराब की दुकानों के बाहर इतनी लंबी कतारें लगी। यहां संक्रमण की चिंता सरकार के लिए नहीं थी। यहां तो राजस्व सामने था।
      मजदूरों की स्थिति हर संवेदनशील इंसान को झकझोरने वाली है इस वक़्त मज़दूर वर्ग व मेहनत कश जनता को राहत, इलाज, सहयोग व संवेदनशीलता की सख्त जरूरत थी व है मगर सब कुछ इसके विपरीत हो रहा है। अब हिंदू फासीवादी कार्यदिवस को 8 से 12 घंटे करने की ओर बढ़ चुके हैं। योगी सरकार तो श्रम कानूनों को 3 साल तक स्थगित कर देने के संबंध में अध्यादेश लाने पर विचार कर रही है।
      कुलमिलाकर आज इतिहास फिर उस बिंदु की ओर बढ़ रहा है जहां एक सदी पहले था। कोरोना संक्रमण ने पूंजीवादी अर्थव्यवस्था व समाज के अंतर्विरोधों को और ज्यादा तीखा कर दिया है। इन अंतर्विरोधों का समाधन पिछली सदी की ही तरह समाजवादी क्रांति से ही संभव है।
    
    
    






      
 

अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम

  अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम        अंततः अमेरिकी साम्राज्यवादियों को फिलहाल पीछे हटना ...